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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 128 में से

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86 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
भिखारी बना दिया, जिसने अपना तन-मन-धन सर्वस्व मातृ-सेवा में अर्पण करके
अपना अंतिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी
उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
"असगर"-18 हरीम-19 इश्क-20 में हस्ती-21 ही जुर्म-22 है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर लिए हुए।।
फाँसी की कोठरी
अंतिम समय निकट है। दो फाँसी की सज़ाएँ सिर पर झूल रही हैं। पुलिस
को साधारण जीवन में और समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी-भर के कोसा
है। खुली अदालत में जज साहब, खुफिया पुलिस के अफसर, मजिस्ट्रेट, सरकारी
वकील तथा सरकार को खूब आड़े हाथों लिया है। हरेक के दिल में मेरी बातें
चुभ रही हैं। कोई दोस्त आशना, अथवा यार मददगार नहीं, जिसका सहारा हो।
एक परम पिता परमात्मा की याद है। गीता पाठ करते हुए संतोष है कि-
जो कुछ किया सो तैं किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं।
जहाँ कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ माहिं।।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेभ्योः पद्मपत्रमिवाम्भसः।।
--भगवद्गीता/5/10
"जो फल की इच्छा को त्याग करके कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म
करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार जल में रहकर भी कमल-पत्र
जल में नहीं होता।" जीवनपर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझकर
किया। यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सुदृढ़ शरीर से भली
प्रकार स्वदेशी सेवा हो सके। बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ। संयुक्त
प्रांत में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा जो सन् 1857 ई. के गदर की
घटनाओं के पश्चात् क्रांतिकारी आंदोलन के संबंध में इस प्रांत के निवासी का
पहला बलिदान मातृ-वेदी पर होगा।