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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 128 में से

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पृष्ठ 83

वृहत् संगठन 71.

छोड़कर सीधे रायबरेली जाएँ और बनारसीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों
पर कुछ भी ध्यान न दिया। मुझे बनारसीलाल पर पहले ही संदेह था, क्योंकि
उसका रहन-सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था। जब दूसरे सदस्यों के
साथ रहता तब उनसे कहा करता कि मैं जिला संगठनकर्त्ता हूँ। मेरी गणना
अधिकारियों में है। मेरी आज्ञा का पालन किया करो। मेरे जूठे बर्तन मला करो। कुछ
विलासिता-प्रिय भी था। प्रत्येक समय शीशा, कंघा तथा साबुन साथ रखता था।
मुझे इससे भय था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्वासपात्र
रह चुका था। उन्होंने सैकड़ों रुपये देकर उसकी सहायता की थी। इसी कारण
हम लोग भी अंत तक उसे मासिक सहायता देते रहे। मैंने बहुत कुछ हाथ-पैर
मारे पर कुछ भी न चली और जिसका मुझे भय था, वही हुआ। भाड़े का टट्टू
अधिक बोझ न सँभाल सका, उसने बयान दे दिए। जब तक यह गिरफ्तार न
हुआ था कुछ सदस्यों ने इसके पास जो अस्त्र थे वे माँगे, पर उसने न दिए।
जिला अफसर की शान में रहा। गिरफ्तार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई।
बनवारीलाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकदमा मजबूती पकड़ गया। यदि
वह अपना बयान न देता तो मुकदमा बहुत कमजोर था। सब लोग चारों ओर से
एकत्रित करके लखनऊ जिला जेल में रखे गए। थोड़े समय तक अलग-अलग रहे,
किन्तु अदालत में मुकदमा आने से पहले ही एकत्रित कर दिए गए।
मुकदमे में रुपये की जरूरत थी। अभियुक्तों के पास क्या था? उनके लिए
धन-संग्रह करना कितना कठिन था। न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे।
अधिकतर अभियुक्तों का कोई संबंधी पैरवी भी न कर सकता था। जिस किसी
के कोई था भी, वह बाल-बच्चों तथा घर को सँभालता या इतने समय तक घर-बार
छोड़कर मुकदमा करता? यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते तो पुलिस का
तीन-चौथाई मुकदमा टूट जाता। लखनऊ जैसे शहर में मुकदमा हुआ, जहाँ
अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था। इतना भी तो न हुआ कि
एक अच्छा प्रेस-रिपोर्टर ही रहता, जो मुकदमे की सारी कार्यवाही को, जो कुछ