रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें80 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
किया। मेरे माता-पिता कचहरी जाकर खुले रूप से पैरवी करने को मना करते रहे
कि पुलिस खिलाफ है, रिपोर्ट हो जाएगी, पर मैंने एक न सुनी। कचहरी जाकर,
कोशिश करके जमानत दाखिल कराई। जेल से उन्हें स्वयं जाकर छुड़ाया। पर जब
मैंने उक्त महाशय का नाम उक्त घटना की गवाही देने के लिए सूचित किया,
तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और उन्होंने पुलिस को तीन बार लिखकर दे दिया
कि हम रामप्रसाद को जानते भी नहीं। हिन्दू-मुस्लिम झगड़े में जिनके घरों की
रक्षा की थी, जिनके बाल-बच्चे मेरे सहारे मुहल्ले में निर्भयता से निवास करते रहे,
उन्होंने ही मेरे खिलाफ झूठी गवाहियाँ बनवाकर भेजीं। कुछ मित्रों के भरोसे पर
उनका नाम गवाही में दिया कि जरूर गवाही देंगे। संसार लौट जाए पर वे डिग
नहीं सकते। पर वचन दे चुकने पर भी जब पुलिस का दबाव पड़ा, वे ही गवाही
देने से इनकार कर गए। जिनको अपना हृदय, सहोदर तथा मित्र समझ कर हर
तरह की सेवा करने को तैयार रहता था, जिस प्रकार की आवश्यकता होती
यथाशक्ति उनको पूर्ण करने की कोशिश करता था, उनसे इतना भी न हुआ कि
कभी जेल पर आकर दर्शन दे जाते, फाँसी की कोठरी में ही आकर संतोषदायक दो
बातें कर जाते। एक-दो सज्जनों ने इतनी कृपा तथा साहस किया कि दस मिनट के
लिए अदालत में दूर खड़े होकर दर्शन दे गए। यह सब इसलिए कि पुलिस का
आतंक छाया हुआ था कि गिरफ्तार न कर लिए जाएँ। इस पर भी जिसने भी जो
कुछ किया मैं उसी को अपना सौभाग्य समझता हूँ और उनका आभारी हूँ-
वह फूल चढ़ाते हैं, तुर्बत-9 भी दबी जाती।
माशूक-10 के थोड़े से भी अहसान-11 बहुत हैं।।
परमात्मा से यही प्रार्थना है कि सब प्रसन्न तथा सुखी रहें। मैंने तो सब
बातों को जानकर ही इस मार्ग पर पैर रखा था। मुकदमे के पहले संसार का कोई
अनुभव ही न था। न कभी जेल देखी, न किसी अदालत का कोई तजुर्बा
(अनुभव) था। जेल में जाकर मालूम हुआ कि किसी नई दुनिया में पहुँच गया।
मुकदमे से पहले मैं यह भी नहीं जानता था कि कोई लेखन-कला-विज्ञान भी है,