रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता। इंडियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा
की। यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और जो कुछ अदालत की कार्यवाही
ठीक-ठीक प्रकाशित हुई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिलकर तुरंत उस
रिपोर्टर को निकलवा दिया। जनता की कोई सहानुभूति न थी। जो पुलिस के जी
में आया, करती रही। इन सारी बातों को देखकर जज का साहस बढ़ गया।
उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया। अभियुक्त चिल्लाए- “हाय ! हाय !” पर
कुछ भी सुनवाई न हुई। और बातें तो दूर श्री दामोदर स्वरूप सेठ को पुलिस ने
जेल में सड़ा डाला। लगभग एक वर्ष तक वे तड़पते रहे। सौ पौंड से केवल
छियासठ पौंड वजन रह गया। कई बार जेल में मरणासन्न हो गए। नित्य बेहोशी
आ जाती थी। लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके। जो कुछ
छटाँक-दो-छटाँक दूध किसी प्रकार पेट में पहुँच जाता था, उससे इस प्रकार की
विकट वेदना (पीड़ा) होती थी कि कोई उनके पास खड़ा होकर उस छटपटाने के दृश्य को
देख न सकता था। एक मैडिकल बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन डाक्टर थे उनकी कुछ
समझ में न आया, तो कह दिया कि सेठजी को बीमारी ही नहीं है।
जब से काकोरी षड्यंत्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से
उनमें एक अद्भुत परिवर्तन हुआ, जिसे देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही।
जेल में सबसे बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी नेतागिरी की दुहाई
देता था। कोई भी बड़े-छोटे का भेद न रहा। बड़े तथा अनुभवी पुरुषों की बातों
की अवहेलना होने लगी। अनुशासन का नाम भी न रहा। बहुधा उलटे जवाब
मिलने लगे। छोटी-छोटी बातों पर मतभेद हो जाता। इस प्रकार का मतभेद कभी-
कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता। आपस में झगड़ा भी हो जाता। खैर !
जहाँ चार बर्तन रहते हैं, वहाँ खटकते ही हैं। ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे।
एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जाए। बैरिस्टर
साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरंभ किया। किंतु यह सोचकर
कि इससे क्रांतिकारी दल की निष्ठा न मिट जाए, यह विचार छोड़ दिया गया।