रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंUploaded By Rajesh Tanti.
बृहत् संगठन 81
इसका कोई विशेषज्ञ भी होता है, जो लेखन शैली को देखकर लेखकों का निर्णय
कर सकता है। यह भी पता नहीं था कि लेख किस प्रकार मिलाए जाते हैं, एक
मनुष्य के लेख में क्या भेद होता है, क्यों भेद होता है, लेखन-कला विशेषज्ञ
हस्ताक्षर को प्रमाणित कर सकता है, तथा लेखक के वास्तविक लेख में तथा
बनावटी लेख में भेद कर सकता है, इस प्रकार का कोई भी अनुभव तथा ज्ञान
न रखते हुए भी एक प्रांत की क्रांतिकारी समिति का संपूर्ण भार लेकर उसका
संचालन कर रहा था। बात यह है कि क्रांतिकारी कार्य की शिक्षा देने के लिए
कोई पाठशाला तो है ही नहीं। यही हो सकता था कि पुराने अनुभवी क्रांतिकारियों
से कुछ सीखा जाए। न जाने कितने व्यक्ति बंगाल तथा पंजाब के षड्यंत्रों में
गिरफ्तार हुए, पर किसी ने भी यह प्रयास न किया कि एक इस प्रकार की
पुस्तक लिखी जाए, जिससे नवागंतुकों को कुछ अनुभव की बातें मालूम होतीं।
लोगों को इस बात की बड़ी उत्कण्ठा होगी कि क्या यह पुलिस का भाग्य
ही था, जो सब बना बनाया मामला हाथ आ गया। क्या पुलिस वाले परोक्ष ज्ञानी
होते हैं? कैसे गुप्त बातों का पता चला लेते हैं? कहना पड़ता है कि यह देश
का दुर्भाग्य ! सरकार का सौभाग्य ! ! बंगाल पुलिस के संबंध में तो अधिक कहा
नहीं जा सकता, क्योंकि मेरा कुछ विशेषानुभव नहीं। इस प्रांत की खुफिया पुलिस
वाले तो महान भोंदू होते हैं। जिन्हें साधारण ज्ञान भी नहीं होता। साधारण पुलिस
से खुफिया में आते हैं। साधारण पुलिस की दरोगाई करते हैं, मजे में लंबी-लंबी
घूस खाकर बड़े-बड़े पेट बढ़ा आराम करते हैं। उनकी बला तकलीफ उठाए। यदि
कोई एक-दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम
दिखाया, दौड़-धूप की, कुछ पद-वृद्धि हो गई और सब काम बंद। इस प्रांत में
कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं, जिसको नियमित रूप से शिक्षा दी
जाती हो। फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है। मैनपुरी षड्यंत्र तथा
इस षड्यंत्र से इसका पूरा पता लग गया, कि थोड़ी-सी कुशलता से कार्य करने
पर पुलिस के लिए पता पाना बड़ा कठिन है। वास्तव में उनके कुछ भाग्य ही