रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें88 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
वफा-32 पर दिल को सदके-33 जान को नजरे जफा-34 कर दे।
मुहब्बत में यह लाजिम-35 है कि जो कुछ हो फिदा-36 कर दे।।
अब तो यही इच्छा है कि-
बहे बहरे-37 फ़ना-38 में जल्द या रब-39 लाश "बिस्मिल"-40 की।
कि भूखी मछलियाँ हैं जौहरे शमशीर-41 कातिल-42 की।।
समझकर फूँकना इसको ज़रा ऐ दागे नाकामी-43 ।
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुए दिल से।।
परिणाम
ग्यारह वर्ष पर्यंत यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने
उद्देश्य में कहाँ तक सफल हुए ? क्या लाभ हुआ ? इसका विचार करने से कुछ
अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हमने लाभ-हानि अथवा जय-पराजय के
विचार से क्रांतिकारी दल में योग नहीं दिया था। हमने जो कुछ किया वह अपना
कर्त्तव्य समझकर किया। कर्त्तव्य-निर्णय में हमने कहाँ तक बुद्धिमत्ता से काम
लिया, इसका विवेचन करना उचित जान पड़ता है। राजनैतिक दृष्टि से हमारे
कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय
बनाकर नीरस कर दिया, और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जान गँवाई। कुछ धन
भी खर्च किया। हिन्दू-शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती,
जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि से समय पर ही प्राण
त्याग करता है। केवल निमित्त-मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं। लाखों भारतवासी
महामारी, हैज़ा, ताऊन आदि अनेक प्रकार के रोगों से मर जाते हैं। करोड़ों दुर्भिक्ष
में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं, तो उसका उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया
धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता
है। गण्यमान व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री का मासिक व्यय
इतना होगा, जितना कि हमने एक षड्यंत्र के निर्माण में व्यय किया। हम लोगों