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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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82 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
अच्छे होते हैं। जब से इस मुकदमे की जाँच शुरू हुई, पुलिस ने इस प्रांत के
संदिग्ध क्रांतिकारी व्यक्तियों पर दृष्टि डाली। उनसे मिली, बातचीत की। एक-दो
को कुछ धमकी दी। "चोर की दाढ़ी में तिनका", वाली जनश्रुति (कहावत) के
अनुसार एक महाशय से पुलिस को सारा भेद मालूम हो गया। हम सबके सब
चक्कर में थे कि इतनी जल्दी पुलिस ने मामले का पता कैसे लगा लिया। उक्त
महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था। पर गिरफ्तारी के समय मुझसे
तथा पुलिस के अफसर से जो बातें हुईं, उनमें पुलिस अफसर ने वे सब बातें
मुझसे कहीं जिनको मेरे तथा उक्त महाशय के अतिरिक्त कोई भी दूसरा नहीं
जान सकता था। और भी बड़े पक्के तथा बुद्धिगम्य (समझ में आने लायक) प्रमाण
मिल गए कि जिन बातों को उक्त महाशय जान सके थे, वे ही पुलिस जान सकी।
जो बातें आपको मालूम न थीं, वे पुलिस को किसी प्रकार न मालूम हो सकीं। उन
बातों से यह निश्चय हो गया कि यह काम उन्हीं महाशय का है। यदि ये महाशय
पुलिस के हाथ न आते और भेद न खोल देते तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती,
कुछ भी पता न चलता। बिना दृढ़ प्रमाणों के भयंकर-से-भयंकर व्यक्ति पर हाथ
रखने का साहस नहीं होता, क्योंकि जनता में आंदोलन फैलने से बदनामी हो जाती
है। सरकार पर जवाबदेही आती है। अधिक-से-अधिक दो-चार मनुष्य पकड़े जाते
और अंत में उन्हें भी छोड़ना पड़ता। परन्तु जब पुलिस को वास्तविक सूत्र हाथ आ
गया, उसने अपनी सत्यता को प्रमाणित करने के लिए लिखा हुआ प्रमाण पुलिस को
दे दिया। उस अवस्था में यदि पुलिस गिरफ्तारियाँ न करती तो फिर कब करती ?
जो भी हुआ, परमात्मा उनका भी भला करे। अपना तो जीवनभर यही उसूल रहा-
सताए तुझको जो कोई बेवफा-12 "बिस्मिल"।
तो मुँह से कुछ न कहना आह ! कर लेना ।।
हम शहीदाने-13 वफा-14 का दीनो ईमां-15 और है।
सिजदे-16 करते हैं हमेशा पाँव पर जल्लाद-17 के।।
मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनकी जिंदगी की जिम्मेदारी
मेरे सिर पर थी, उनमें से ज्यादा हिस्सा श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी का है। मैं