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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 128 में से

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पृष्ठ 86

74 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

जिस दिन सफाई की बहस मैंने समाप्त की; सरकारी वकील ने उठकर मुक्त
कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की। मैंने
नमस्कार कर उत्तर दिया कि आपके चरणों की कृपा है, क्योंकि इस मुकदमे के
पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के
वकीलों की जिरह को सुनकर मैंने भी साहस किया था।
अभियोग
काकोरी में रेलवे ट्रेन लुट जाने के बाद ही पुलिस का विशेष विभाग उक्त
घटना का पता लगाने के लिए तैनात किया गया। एक विशेष व्यक्ति मि. हार्टन
इस विभाग के निरीक्षक थे। उन्होंने घटनास्थल तथा रेलवे पुलिस की रिपोर्टों को
देखकर अनुमान किया कि संभव है कि यह कार्य क्रांतिकारियों का हो। प्रांत के
क्रांतिकारियों की जाँच शुरू हुई। उसी समय शाहजहाँपुर में रेलवे डकैती के तीन
नोट मिले। चोरी गए नोटों की संख्या सौ से अधिक थी, जिनका मूल्य लगभग
एक हजार रुपये होगा। इनमें से लगभग सात सौ या आठ सौ रुपये के मूल्य के
नोट सीधे सरकार के खजाने में पहुँच गए। अतः सरकार नोटों के मामले को
चुपचाप पी गई। ये नोट लिस्ट प्रकाशित होने से पूर्व ही सरकारी खजाने में पहुँच
चुके थे। पुलिस का लिस्ट प्रकाशित करना व्यर्थ हुआ। सरकारी खजाने में से ही
जनता के पास कुछ नोट लिस्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही पहुँच गए थे, इस
कारण वे जनता के पास निकल आए।
उन्हीं दिनों में ज़िला खुफिया पुलिस को मालूम हुआ कि मैं 8, 9 तथा 10
अगस्त सन् 1925 ई. को शाहजहाँपुर नहीं था। अधिक जाँच होने लगी। इसी
जाँच-पड़ताल में पुलिस को मालूम हुआ कि गवर्नमेंट स्कूल शाहजहाँपुर के इंदुभूषण
मित्र नामक एक विद्यार्थी के पास मेरे क्रांतिकारी दल से संबंधित पत्र आते हैं,
जो वह मुझे दे आता है। स्कूल के हैडमास्टर द्वारा इंदुभूषण के पास आए हुए
पत्रों की नकल करा कर हार्टन साहब के पास भेजी जाती रही। इन्हीं पत्रों से