रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें70 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्वास करते ? अंत में उन्होंने अपनी
यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का संबंध बताकर कुछ बोलशेविक संबंध
के विषय में अपना बयान दे दूँ, तो वे मुझे थोड़ी-सी सज़ा करा देंगे, और सज़ा
के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकालकर इंग्लैंड भेज देंगे और पंद्रह हज़ार रुपये
पारितोषिक (इनाम) भी सरकार से दिला देंगे। मैं मन-ही-मन में बहुत हँसता था।
अंत में एक दिन फिर मुझसे जेल में मिलने को गुप्तचर विभाग के कप्तान साहब
आए। मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इनकार कर दिया। वह कोठरी पर
आकर बहुत-सी बातें करते रहे, अंत में परेशान होकर चले गए।
शिनाख्त (पहचान) कराई गई। पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने
आदमी लेकर शिनाख्त कराई। भाग्यवश श्री अईनुद्दीन साहब मुकदमे के मजिस्ट्रेट
मुकर्रर हुए, उन्होंने जी भर कर पुलिस की मदद की। शिनाख्तों में अभियुक्तों को
साधारण मजिस्ट्रेटों की भाँति भी सुविधाएँ न दीं। दिखाने के लिए कागजी
कार्यवाही खूब साफ रखी। जबान के बड़े मीठे थे। प्रत्येक अभियुक्त से बड़े
तपाक से मिलते थे। बड़ी मीठी-मीठी बातें करते थे। सब समझते थे कि हमसे
सहानुभूति रखते हैं। कोई न समझ सका कि अंदर-ही-अंदर घाव कर रहे हैं।
इतना चालाक अफसर शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक मुकदमा उनकी
अदालत में रहा, किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया। यदि कभी कोई
बात भी हो जाती तो ऐसे ढंग से उसे टालने की कोशिश करते कि किसी को
बुरा ही न लगता। बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्तों से क्षमा
तक माँगने में संकोच न किया। किंतु कागजी कार्यवाही में इतने होशियार थे कि
जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्तों के विरुद्ध। जब मामला सैशन के सुपुर्द किया
और आज्ञापत्र में युक्तियाँ दीं, तब सब की आँखें खुलीं कि कितना गहरा घाव
मार दिया।
मुकदमा अदालत में न आया था, उसी समय रायबरेली में बनवारीलाल की
गिरफ्तारी हुई। मुझे हाल मालूम हुआ। मैंने पं. हरकरननाथ से कहा कि सब काम