रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें84 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे। वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन गए।
सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का मेल कैसा ?
मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में मेरा निवास था, किंतु
तुम इन बातों की थोड़ी भी चिंता न करते थे। मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान
होने के कारण घृणा की दृष्टि से देखते थे, किंतु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे।
मेरे पास आर्य समाज मंदिर में आते-जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर,
तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लमखुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से
पुकारते थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश-भक्त थे। तुम्हें
यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को खुदा अक्ल देता, कि
वे हिन्दुओं के साथ मिलकर हिन्दुस्तान की भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई
लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं
लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ? तुमने स्वदेशभक्ति के भावों को भली-भाँति
समझने के लिए ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माताजी
तथा भ्राताजी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुँह से हिन्दी शब्द निकलते थे,
जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था।
तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति को देखकर बहुतों को संदेह होता था कि कहीं
इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा लो। पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार
अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की
प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। प्रायः मित्र मंडली में बात छिड़ती कि
कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना। तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें
भेद न था। प्रायः मैंने तुमने एक थाली में भोजन किए। मेरे हृदय से वह विचार
ही जाता रहा कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास
तथा अगाध प्रीति रखते थे। हाँ ! तुम मेरा नाम लेकर पुकार नहीं सकते थे। तुम
तो सदैव "राम" कहा करते थे। एक समय जब तुम्हारे हृदय-कंप का दौरा .