रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुँह से बारंबार “राम”, “हाय राम” शब्द निकल
रहे थे। पास खड़े हुए भाई-बांधवों को आश्चर्य था कि “राम”, “राम” कहता
है। कहते कि अल्लाह अल्लाह कहो, पर तुम्हारी “राम-राम” की रट थी। उसी
समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो “राम” के भेद को जानते थे। तुरंत
मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शांति हुई, तब सब लोग “राम-राम”
के भेद को समझे।
अंत में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ? मेरे विचारों के
रंग में तुम भी रँग गए। तुम भी कट्टर क्रांतिकारी बन गए। अब तो तुम्हारा दिन-रात
प्रयत्न यही था कि किस प्रकार ही मुसलमान नवयुवकों में भी क्रांतिकारी भावों का
प्रवेश हो। वे भी क्रांतिकारी आंदोलन में योगदान दें। जितने तुम्हारे बंधु तथा मित्र
थे सब पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। प्रायः क्रांतिकारी
सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता है कि मैंने कैसे एक मुसलमान को क्रांतिकारी दल का
प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो कार्य किए, वे सराहनीय हैं। तुमने
कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना (अनादर) न की। एक आज्ञाकारी भक्त के
समान मेरी आज्ञा के पालन में तत्पर रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे
भाव बड़े उच्च थे।
मुझे यदि शांति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्ज्वल कर
दिया। भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई कि अशफाकउल्ला
ने क्रांतिकारी आंदोलन में योग दिया। अपने भाई-बंधु तथा संबंधियों के समझाने
पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहे
जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध
हुए। इन सबके परिणामस्वरूप अदालत में तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टिनेंट) ठहराया
गया, और जज ने मुकदमे का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाला
(फाँसी की रस्सी) पहना दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझकर संतोष होगा कि
जिसने अपने माता-पिता की धन-संपत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें