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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

बृहत् संगठन 73
युवकों की राय हुई कि अनशन व्रत करके सरकार से हवालाती की हालत में ही
माँगें पूरी करा ली जाएँ क्योंकि लंबी-लंबी सजाएँ होंगी। संयुक्त प्रांत की जेलों में
साधारण कैदियों का भोजन खाते हुए सजा काटकर जेल से जिंदा निकलना कोई
सरल कार्य नहीं। जितने राजनैतिक कैदी षड्यंत्रों के संबंध में सजा पाकर इस
प्रांत की जेलों में रखे गए, उनमें से पाँच-छः महात्माओं ने इस प्रांत की जेलों के
व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग दिए।
इस विचार के अनुसार काकोरी के
लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत
आरंभ कर दिया। दूसरे ही दिन सब पृथक
कर दिए गए। कुछ व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट जेल
में रखे गए। कुछ सेंट्रल जेल भेजे गए।
अनशन करते पंद्रह दिन व्यतीत हो गए,
तब सरकार के कान पर भी जूँ रेंगी। उधर
सरकार का काफी नुकसान हो रहा था।
जज साहब तथा दूसरे कचहरी के
कार्यकर्त्ताओं को घर बैठे वेतन देना पड़ता
था। सरकार को स्वयं चिंता थी कि किसी
प्रकार अनशन छूटे। जेल अधिकारियों ने
पहले आठ आने रोज तय किए। मैंने उस [चित्र-परिचय: ठाकुर रोशनसिंह]
समझौते को अस्वीकार कर दिया और बड़ी कठिनाई से दस आने रोज पर ले
आया। उस अनशन व्रत में पंद्रह दिन तक मैंने जल पीकर निर्वाह किया था।
सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था। श्री रोशनसिंहजी ने भी इसी प्रकार मेरा
साथ दिया था। वे पंद्रह दिन तक बराबर चलते-फिरते रहे थे। स्नानादि करके अपने
दैनिक कर्म भी कर लिया करते थे। दस दिन तक तो मेरे मुख को देखकर अनजान
पुरुष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता।