रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंबृहत् संगठन 83
अपनी कलम से उनके लिए भी अंतिम समय में दो शब्द लिख देना अपना
कर्त्तव्य समझता हूँ।
मुझे भली-भाँति याद है कि जब मैं
बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया
था, तो तुमसे स्कूल में भेंट हुई थी। तुम्हारी
मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी।
तुमने मुझसे मैनपुरी षड्यंत्र के संबंध में
कुछ बातचीत करनी चाही थी। मैंने यह
समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान
विद्यार्थी मुझसे इस प्रकार की बातचीत क्यों
करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की
दृष्टि से दे दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा
खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों
का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे
को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने निश्चय
पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका कांग्रेस
में बातचीत की। अपने इष्ट-मित्रों द्वारा इस
अशफाक उल्ला खाँ
बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे
दिल में मुल्क की खिदमत (देश की सेवा) करने की ख्वाहिश (इच्छा) थी। अंत
में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली।
तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे, यह जानकर मुझे बड़ी
प्रसन्नता हुई। थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गए थे, किन्तु
छोटे भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता का अधिकार चाहते थे। तुम