रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृहत् संगठन 89
को डाकू बताकर फाँसी और काले पानी की सज़ाएँ दी गई हैं। किन्तु हम
समझते हैं कि वकील और डाक्टर हमसे कहीं बड़े डाकू हैं। वकील-डॉक्टर दिन
दहाड़े बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों की जायदादें लूटकर खा गए। वकीलों के चाटे हुए
अवध के ताल्लुकेदारों को ढूँढे रास्ता भी दिखाई नहीं देता और वकीलों की ऊँची
अट्टालिकाएँ (भवन) उन पर खिलखिला कर हँस रही हैं। इसी प्रकार लखनऊ में
डॉक्टरों के भी ऊँचे-ऊँचे महल बन गए। किंतु राज्य में दिन के डाकुओं की
प्रतिष्ठा है। अन्यथा रात के साधारण डाकुओं और दिन के इन डाकुओं (वकीलों
तथा डॉक्टरों) में कोई भेद नहीं, दोनों अपने-अपने मतलब के लिए बुद्धि की
कुशलता से प्रजा का धन लूटते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है। जिस प्रकार
भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा कि गिरी हुई अवस्था (दशा) में भी, भारतवासी
युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं। वे स्वतंत्र होने की
यथाशक्ति चेष्टा भी करते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होतीं तो यही इने-गिने
नवयुवक अपने प्रयत्नों से संसार को चकित कर देते। उस समय भारतवासियों को
भी फ्रांसीसियों की भाँति कहने का सौभाग्य प्राप्त होता जोकि उस जाति के
नवयुवकों ने फ्रांसीसी प्रजातंत्र की स्थापना करते हुए कहा था: The monument
so raised, may serve as a lesson to the oppressors and an instance
to the oppressed. '
अर्थात स्वाधीनता का जो स्मारक निर्माण किया गया है वह अत्याचारियों के
लिए सबक का कार्य करे और अत्याचार-पीड़ितों के लिए उदाहरण बने।
भारत के इतिहास में हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा, किन्तु इसमें भी
कोई संदेह नहीं है कि भारत की राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक किसी प्रकार
की परिस्थिति इस क्रांतिकारी आंदोलन के पक्ष में नहीं है। इसका कारण यही है कि
भारतवासियों में शिक्षा का अभाव है। वे साधारण से साधारण सामाजिक उन्नति
करने में भी असमर्थ हैं। फिर राजनैतिक क्रांति की बात कौन कहे? राजनैतिक क्रांति