रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें34 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
होगी, सीधे जाकर दाम देंगे और रिवाल्वर लेकर चले आएँगे। प्रत्येक दूकान देखी,
कहीं किसी पर बंदूक आदि का विज्ञापन या कोई दूसरा निशान न पाया। फिर
एक ताँगे पर सवार होकर सब शहर घूमा। ताँगे वाले ने पूछा कि क्या चाहिए।
मैंने उससे डरते-डरते अपना उद्देश्य कहा। उसी ने दो-तीन दिन घूम-फिरकर
एक टोपीदार रिवाल्वर खरीदवा दिया और देशी बनी हुई बारूद एक दूकान से
दिला दी। मैं कुछ जानता तो था नहीं, एकदम दो सेर बारूद खरीदी, जो घर पर
संदूक में रखे-रखे बरसात में सील खाकर पानी हो गई। मुझे बड़ा दुख हुआ।
दूसरी बार जब मैं क्रांतिकारी समिति का सदस्य हो चुका था, तब दूसरे सहयोगियों
की राय से दो सौ रुपये लेकर हथियार खरीदने गया। इस बार मैंने बहुत प्रयत्न
किया तो एक कबाड़ी की-सी दूकान पर कुछ तलवारें, खंजर, कटार तथा दो-चार
टोपीदार बंदूकें रखी देखीं। मैंने बड़ा साहस करके उससे पूछा कि क्या आप ये
चीजें बेचते हैं, उसने जब हाँ में उत्तर दिया तो मैंने दो-चार चीजें देखीं। दाम
पूछे। इसी प्रकार वार्तालाप करके पूछा कि क्या आप कारतूसी हथियार नहीं बेचते
या और कहीं नहीं बिकते। तब उसने सब विवरण सुनाया। उस समय उसके पास
टोपीदार एक नली के छोटे-छोटे दो पिस्तौल थे। मैंने वे दोनों खरीद लिए। एक
कटार भी खरीदी। उसने वादा किया कि यदि आप फिर आएँ तो कुछ कारतूसी
हथियार जुटाने का प्रयत्न किया जाए। लालच बुरी बला है, इस कहावत के
अनुसार तथा इसलिए भी कि हम लोगों को कोई दूसरा ऐसा जरिया भी न था,
जहाँ से हथियार मिल सकते, मैं कुछ दिनों बाद फिर गया। इस समय उसी ने
एक बड़ा सुंदर कारतूसी रिवाल्वर दिया। कुछ पुराने कारतूस दिए। रिवाल्वर था तो
पुराना, किन्तु बड़ा ही उत्तम था। दाम उसके नए के बराबर देने पड़े। अब उसे
विश्वास हो गया कि यह हथियारों के खरीदार हैं। उसने प्राणपण-से चेष्टा की
और कई रिवाल्वर तथा दो-तीन राइफलें जुटाईं। उसे भी अच्छा लाभ हो जाता
था। प्रत्येक वस्तु पर वह बीस-तीस रुपये मुनाफा ले लेता था। किसी-किसी चीज़
पर दूना नफा खा लेता था।