रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वदेश-प्रेम 33
बाँटे गए। पर्चे तथा “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली” पुस्तक दोनों संयुक्त
प्रांत की सरकार ने जब्त कर लिए।
हथियारों की खरीद
अधिकतर लोगों का विचार है कि देशी राज्यों में हथियार (रिवाल्वर,
पिस्तौल तथा राइफलें इत्यादि) सब कोई रखता है, और बंदूक आदि पर लाइसेंस
नहीं होता। अतएव इस प्रकार के अस्त्र बड़ी सुगमता से प्राप्त हो सकते हैं। देशी
राज्यों में हथियारों पर कोई लाइसेंस नहीं, यह बात बिल्कुल ठीक है और हर एक
को बंदूक आदि रखने की आज़ादी भी है। किंतु कारतूसी हथियार बहुत कम
लोगों के पास रहते हैं, जिसका कारण यह है कि कारतूस या विलायती बारूद
खरीदने पर पुलिस में सूचना देनी होती है। राज्य में तो कोई ऐसी दुकान नहीं
होती, जिस पर कारतूस या कारतूसी हथियार मिल सकें। यहाँ तक कि विलायती
बारूद और बंदूक की टोपी भी नहीं मिलती, क्योंकि ये सब चीजें बाहर से मँगानी
पड़ती हैं। जितनी चीजें इस प्रकार की बाहर से मँगाई जाती हैं, उनके लिए
रेजिडेंट (गवर्नमेंट का प्रतिनिधि, जो रियासतों में रहता है) की आज्ञा लेनी पड़ती
है। बिना रेजिडेंट की मंजूरी के हथियारों संबंधी कोई चीज बाहर से रियासत में
नहीं आ सकती। इस कारण इस खटखट से बचने के लिए रियासत में ही
टोपीदार बंदूकें बनती हैं और देशी बारूद भी वहीं के लोग शोरा, गंधक तथा
कोयला मिलाकर बना लेते हैं। बंदूक की टोपी चुरा-छिपाकर मँगा लेते हैं। नहीं
तो टोपी के स्थान पर भी मनसल और पुटाश अलग-अलग पीसकर दोनों को
मिलाकर उसी से काम चलाते हैं। हथियार रखने की आज़ादी होने पर भी गाँवों
में किसी एक-दो धनी या जमींदार के यहाँ टोपीदार बंदूक या टोपीदार छोटे
पिस्तौल होते हैं, जिसमें ये लोग रियासत की बनी हुई बारूद काम में लाते हैं।
यह बारूद बरसात में सील खा जाती है और काम नहीं देती। एक बार मैं
अकेला रिवाल्वर खरीदने गया। उस समय मैं समझता था कि हथियारों की दूकान