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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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स्वदेश-प्रेम 35
इसके बाद हमारी संस्था के दो-तीन सदस्य मिलकर गए। दूकानदार ने भी
हमारी उत्कट इच्छा को देखकर इधर-उधर से पुराने हथियारों को खरीदकर उनकी
मरम्मत की, और नया-सा करके हमारे हाथ बेचना शुरू किया। खूब ठगा। हम
लोग कुछ जानते नहीं थे। इस प्रकार अभ्यास करने से कुछ नया पुराना समझने
लगे। एक दूसरे सिक्लीगर से भेंट हुई। वह स्वयं कुछ नहीं जानता था, किन्तु
उसने वचन दिया कि वह कुछ रईसों से हमारी भेंट करा देगा। उसने एक रईस
से मुलाकात कराई जिसके पास एक रिवाल्वर था। रिवाल्वर खरीदने की हमने
इच्छा प्रकट की। उन महाशय ने उस रिवाल्वर के डेढ़ सौ रुपये माँगे। रिवाल्वर
नया था। बड़े कहने-सुनने पर सौ कारतूस उन्होंने दिए और 155 रुपये लिए।
150 रुपये उन्होंने स्वयं लिए और 5 रुपये सिक्लीगर को कमीशन के तौर पर
देने पड़े। रिवाल्वर चमकता हुआ नया था, समझे अधिक दामों का होगा। खरीद
लिया। विचार हुआ कि इस प्रकार ठगे जाने से काम न चलेगा। किसी प्रकार
कुछ जानने का प्रयत्न किया जाए। बड़ी कोशिश के , बाद कलकत्ता, बंबई से
बंदूक-विक्रेताओं की लिस्टें मँगाकर देखीं, देखकर आँखें खुल गईं। जितने रिवाल्वर
या बंदूकें हमने खरीदे थे, एक को छोड़ सबके दुगने दाम दिए थे। 155 रुपये के
रिवाल्वर के दाम केवल 30 रुपये ही थे और 10 रुपये के सौ कारतूस, इस
प्रकार कुल सामान 40 रुपये का था, जिसके बदले 155 रुपये देने पड़े। बड़ा खेद
हुआ। करें तो क्या करें। और कोई दूसरा जरिया भी तो न था।
कुछ समय पश्चात कारखानों की लिस्टें लेकर तीन-चार सदस्य मिलकर गए।
खूब जाँच-खोज की। किसी प्रकार रियासत की पुलिस को पता चल गया। एक
खुफिया पुलिस वाला मुझे मिला, उसने कई हथियार दिलाने का वादा किया, और
वह मुझे पुलिस इंस्पेक्टर के घर ले गया। दैवात् उस समय पुलिस इंस्पेक्टर घर
पर मौजूद न थे। उनके द्वार पर एक पुलिस का सिपाही बैठा था, जिसे मैं
भली-भाँति जानता था। मुहल्ले में खुफिया पुलिस वाले की आँख बचाकर पूछा कि
अमुक घर किसका है ? मालूम हुआ पुलिस इंस्पेक्टर का। मैं जैसे-तैसे निकल