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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 128 में से

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32 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
यह हाल था कि कहते थे कि एक बार गाड़ी में हाथ लगा लेने दो, जीवन सफल
हो जाए। लोकमान्य पर फूलों की जो वर्षा की जाती थी, उसमें से जो फूल नीचे
गिर जाते थे उन्हें उठाकर लोग पल्ले में बाँध लेते थे। जिस स्थान पर लोकमान्य
के पैर पड़ते, वहाँ की धूल सबके माथों पर दिखाई देती। कुछ उस धूल को भी
अपने रुमाल में बाँध लेते थे। इस स्वागत से माडरेटों की बड़ी भद्द हुई।
क्रांतिकारी आंदोलन
कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर लखनऊ में ही मालूम हुआ कि एक
गुप्त समिति है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना है। यहीं
से क्रांतिकारी समिति की चर्चा सुनकर कुछ समय बाद मैं भी क्रांतिकारी समिति
के कार्य में योग देने लगा। अपने एक मित्र द्वारा क्रांतिकारी समिति का सदस्य
हो गया। थोड़े ही दिनों में मैं कार्यकारिणी का सदस्य बना लिया गया। समिति
में धन की बहुत कमी थी, उधर हथियारों की भी जरूरत थी। जब घर वापस
आया, तब विचार हुआ कि एक पुस्तक प्रकाशित की जाए और उसमें जो लाभ
हो उससे हथियार खरीदे जाएँ। पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए धन कहाँ से
आए? विचार करते-करते मुझे एक चाल सूझी। मैंने अपनी माताजी से कहा कि
मैं कुछ रोजगार करना चाहता हूँ, उसमें अच्छा लाभ होगा। यदि रुपये दे सकें तो
बड़ा अच्छा हो। उन्होंने 200 रुपये दिए। “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”
नामक पुस्तक लिखी जा चुकी थी। प्रकाशित होने का प्रबंध हो गया। थोड़े रुपये
की जरूरत और पड़ी, मैंने माताजी से 200 रुपये और लिए। पुस्तक की बिक्री
हो जाने पर माताजी के रुपये पहले चुका दिए। लगभग 200 रुपये और बचे।
पुस्तकें अभी बिकने के लिए बहुत बाकी थीं। उसी समय “देशवासियों से
निवेदन” नामक एक पर्चा छपवाया गया, क्योंकि पं. गेंदालालजी, ब्रह्मचारीजी के
दल सहित ग्वालियर में गिरफ्तार हो गए थे। अब सब विद्यार्थियों ने अधिक
उत्साह के साथ काम करने की प्रतिज्ञा की। पर्चे कई जिलों में लगाए गए और