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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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स्वदेश-प्रेम 31
सदस्यों से मालूम हुआ कि लोकमान्य का स्वागत केवल स्टेशन पर ही किया
जाएगा और शहर में सवारी नहीं निकाली जाएगी जिसका कारण यह था कि
स्वागतकारिणी समिति के प्रधान पं. जगतनारायणजी थे। अन्य गण्यमान सदस्यों में
पं. गोकरणनाथजी तथा अन्य उदार दल वालों (माडरेटों) की संख्या अधिक थी।
माडरेटों को भय था कि यदि लोकमान्य की सवारी शहर में निकाली गई तो
कांग्रेस के प्रधान से भी अधिक सम्मान होगा, जिसे वे उचित न समझते थे।
अतः उन सबने प्रबंध किया कि जैसे ही लोकमान्य तिलक पधारें, उन्हें मोटर में
बिठाकर शहर के बाहर-बाहर निकाल ले जाएँ। इन सब बातों को सुनकर
नवयुवकों को बड़ा खेद हुआ। कालेज के एक एम.ए. के विद्यार्थी ने इस प्रबंध
का विरोध करते हुए कहा कि लोकमान्य का स्वागत अवश्य होना चाहिए। मैंने
भी इस विद्यार्थी के कथन में सहयोग दिया। इसी प्रकार कई नवयुवकों ने निश्चय
किया कि जैसे ही लोकमान्य, स्पेशल रेलगाड़ी से उतरें उन्हें घेरकर गाड़ी में बिठा
लिया जाए और सवारी निकाली जाए। स्पेशल रेलगाड़ी आने पर लोकमान्य सबसे
पहले उतरे। स्वागतकारिणी के सदस्यों ने कांग्रेस के स्वयं-सेवकों का घेरा बनाकर
लोकमान्य को मोटर में जां बिठाया। मैं तथा एक एम.ए. का विद्यार्थी मोटर के
आगे लेट गए। सब कुछ समझाया गया, मगर किसी की एक न सुनी। हम लोगों
की देखा-देखी और कई नवयुवक भी मोटर के सामने आकर बैठ गए। उस समय
मेरे उत्साह का यह हाल था कि मुँह से बात न निकलती थी, केवल रोता था
और कहता था, “मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ।” स्वागतकारिणी के
सदस्यों से कांग्रेस के प्रधान को ले जाने वाली गाड़ी माँगी, उन्होंने देना स्वीकार
न किया। एक नवयुवक ने मोटर का टायर काट दिया। लोकमान्य जी बहुत कुछ
समझाते किन्तु वहाँ सुनता कौन ? एक किराए की गाड़ी से घोड़े खोलकर
लोकमान्य के पैरों पर सिर रख उन्हें उसमें बिठाया और सबने मिलकर हाथों से
गाड़ी खींचनी शुरु की। इस प्रकार लोकमान्य का इस धूमधाम से स्वागत हुआ
कि किसी नेता की उतने जोरों से सवारी न निकाली गई। लोगों के उत्साह का