रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४१ )
औ जो जीवके संगही संगमें बालकहीसे खेली है सो गति गमन जीवकी,
सहाय छांडि जराके भयसों थकि रहाति है औ देहकी जो दशा कहे शुभदशा
है सुंदरतादि सो सब भागति है जियके साथमें दुरिकै केवल दुराशा कहे दुष्ट
आशा रहिजाति है वृद्धतामें इनकी सबको सुभावहीसों यह होति है तामें जराके
भयको तर्क है तासों असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा है यह वस्तु हमको इते दिनमें मिलि
है ऐसी जो बुद्धि है सो दुराशा कहावति है ॥ १२ ॥
मू०-बिलोकिशिरोरुहश्वेतसमेततनोरुहकेसबकोगुणगायो।
उठेकधौँआयुकेऔधिकेअंकुरशूलकीशुष्कसमूलनशायो ॥
जरैं किधौँकेशवव्याधिनकीकिधौंआधिकेआखरअंतनपायो ।
जराशरपंजरजीवजरेउकिजराजरकंबरसोंपहिरायो ॥ १३ ॥
मनोहरबिजयाछंद ॥ दिनहींदिनबाढतजाइहियेजरिजाइस-
मूलसोऔषधिखैहै । किधौँयाहिकेसाथअनाथज्यों केशव
आवतजातसदादुखसैहै ॥ जगजाकीतूज्योतिजगैजडजीवन-
पायेतुतापहँजाननपैहै । सुनिबालदशागईज्वानीगईजरि-
जैहैजराउदुराशानजैहै ॥ १४ ॥
टी०-यामें प्रसंगवश वृद्धताको वर्णन है तनोरुह कहे तनके रोम तिन सहित
शिरोरुह ( शिरके बारनको ) श्वेत विलोकिकै या प्रकारसों गुण गायो है कि
आयुर्बलकी अवधि ( मर्यादा ) जो आईहै ताके अंकुर उठे हैं औ कि शूलनामा
आयुध विशेष है शूलहू लगे शुष्क समूल कहे पूर्ण नाशको प्राप्त होत है वृद्धता-
हूमैं तासों जानो औ कि अनेक जे व्याधी शरीरव्यथा हैं तिनकी तिनकी
अनेक जरैं हैं औ कि अनेक आधी जे मानसी व्यथा लिखी हैं तिनके आखर
( अक्षर ) हैं जिनको अंत नहीं पाइयत अर्थ बात हैं वृद्धतामें अनेक आधि,
व्याधि होती हैं इतिभावार्थः औ कि जरा जो बुढाई है ताने शर ( बाण ) तिनके
पंजरमें जीवको जरयो कहे डारचो है औ कि जराजर कहे जरवाफी कंबर सो
जीवको पहिरायो है ॥ १३ ॥ यामें जीवप्रति काहूको उपदेश है सो उपदेश कहि
रामचन्द्र दुराशाकृत पोडा देखावत हैं जाकी कहे जा ब्रह्मकी ॥ १४ ॥
१६
( २४२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ जहांभामिनीभोगतहँ, बिनभामिनिकहँभो-
ग ॥ भामिनिछूटेजगछुटै, जगछूटेसुखयोग ॥ १५ ॥ जोई
जोईजोकरै, अहंकारकेसाथ ॥ स्नानदानतपहोमजप, निष्फ-
लजानौनाथ ॥ १६ ॥ तोटकछंद ॥-जियमांझअहंपदजोद-
मिये । जिनहींजिनहींगुणश्रीरमिये ॥ तिनहींतिनहींलखिलो-
भडसै । पटतंतुनिउंदुरज्यौंतरसै ॥ १७ ॥
टी०-यामें स्त्री व्यवहार कृत पीड़ा कहत हैं तहां भामिनी ( स्त्री ) है तहांई
दुःखरूपी संसारभोग हैं सो भामिनी जब छूटै जब संसार छूटै तब सुखको
योग है अर्थ दुःखमय संसारको बंधन दुराशादि सम स्त्रीहू है ॥ १५ ॥
यामें अहंकारको व्यवहार कहत हैं अहंकारके साथ जो करिये सो निष्फल
होत है॥ १६ ॥ ताही अहंकारको जो काहू प्रकारसों दमिये (दूरिये) तो
जिन जिन मिथ्याभावनादि गुणसों श्री जो द्रव्य है तासों रमिये अर्थ
द्रव्यको प्राप्त हूजियत है तिन गुणनको देखिकै लोभ जो है सो जीवको डसत
है ( काटत है ) अर्थ काहूको अनुत्तमकर्मसों पावत देखि लोभ जीवको प्रे रत
है कि यहै कर्म करौ जामें द्रव्य लाभ होइ अहंकारहीन प्राणी योग्यायोग्यको
विचार नहीं करत जा प्रकार द्रव्य मिलै सोई ऊंच नीच कर्म करत है इति
भावार्थः लोभ कैसे डसत है जैसे पट (वस्त्र) के तंतु कहे सूत्रनको उंदुर कहे
मूषक तरसै कहे काटत है आशय कि जैसे मूषक पटतंतुनको वृथा काटत है
कछु ताको काम नहीं है तैसे लोभ वृथा जीवको सतावत है ॥ १७ ॥
मू०-बिजयछंद ॥ दानसयाननिकेकलपद्रुमटूटतज्यौँऋण
ईशकेमांगे । सूखतसागरसेसुखकेशवज्यौंदुखश्रीहरिकेअनुरा-
गे ॥ पुण्यबिलातपहारनसेपलज्यौँअघराघवकी निशिजागे ।
ज्यौंद्विजदोषतेसंततिनाशितित्योंगुणभाजतलोभकेआगे ॥ १८॥
टी०-सो लोभ कैसो है ताको ब्यवहार कहत हैं जैसे ईश ( महादेव ) हैं
तिनके मांगेते ऋण टूटि जात है अर्थ जब महादेव एते द्रव्य देते हैं जामें केतेऊ
बड़ो ऋण होइ सो दूरि होतहै तैसे ता लोभके आगे दान औ सयाननके डे
चतुरावशप्रकाशः २४. (२४३)
कल्पद्रुमहैं ते टूटि जातहैं अर्थ लोभसों दानको अभिलाष नशि जातहै औ उचिता-
नुचितकारिबेमें जो सयानप (चातुरी) है सो नहीं रहति औ जैसे श्रीहरि जे
विष्णुहैं तिनके अनुरागसों भक्ति कियेसों सो सागरसो संसारदुःख सूखत
है तैसे ता लोभके आगे जो जीवके सागरसे सुख सूखि जात हैं अर्थ
लोभवश इत उत प्राणी धायो धायो फिरत है धन, पुत्र, कलत्रादिको सुख नहीं
करन पावत औ जैसे राघवकी निशि कहे राघव संबंधी व्रत दिन रामनौमी
आदिकी निशिमें पलहू भरि जागते अघ (पाप) बिलात हैं तैसे लोभके आगे
पहारसे बड़े बड़े पुण्य बिलात हैं अर्थ लोभसों ऐसे ब्रह्मद्रव्यहरणादि पातक
प्राणी करत हैं जासों केतेऊ बड़े पुण्य होईं तौ नशि जात हैं यामें केशवको
रामोक्तिमें अपनी उक्तिको भ्रम है औ जैसे ब्रह्मदोषते संतति जो वंश है सो
नशि जात है तैसे लोभके आगे अनेकगुण भागत हैं अर्थ अनेकगुणको त्याग
( २४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
विड़ेंगे कहे भागि जात है तैसे अघ वाघनको देखि धर्मादि भागतहैं पापके संयोगते
जीवके हितसाधक जे दान दयादि हैं ते सब नशि जात हैं इतिभावार्थः ॥ १९ ॥
मू०-दोहा ॥ आंखिनआछतआंधरो, जीवकरैबहुभांति ॥
धीरनवीरजबिनकरै, तृष्णाकृष्णाराति ॥ २० ॥ तृष्णाकृष्णा
षट्पदी, हृदयकमलमेंबास ॥ मत्तदंतिगलगंडयुग, नर्क-
अनर्कविलास ॥ २१ ॥
टी०-तानि छंदनमों तृष्णाको व्यवहार कहत हैं तृष्णारूपी जो कृष्णाराति
कहे कृष्णपक्षकी राति है सो आंखिन अक्षत कहे रहने पर जीवको आँधरो
करति है अर्थ तृष्णायुक्त प्राणीको आंखिनसों आपनो अपमानादि नहीं देखि-
परत औ कृष्णा रातिहूमों अंधकारमें घटपटादि वस्तु आँखिनसों नहीं देखि परत
औ धीरनको धैर्य्य बिना कारदेति है अर्थ कहूं कछु पाइबो होइ तौ तृष्णायुक्त
प्राणी कैसोऊ धीर होइ तौ धीरता छोड़ि धावतहै औ रातिमें अंधकारमें चौरादि
भयसों बड़े धीरउ धैर्य्य बिन है जात हैं ॥ २०॥ कृष्णा कहे श्याम जो तृष्णा-
रूपी षट्पदी (भ्रमरी) है ताको हृदयरूपी कमलमें वासहै ता तृष्णाको नर्क
औ अनर्क कहे स्वर्गकी विलास दुवौ मत्तदंतीके गल कहे गलत अर्थ मदसों
चुवत दुवौ गंडस्थल हैं अर्थ जैसे भ्रमरी कमलमें वसति है औ गजनके गंड-
स्थलन प्रति धायो करतिहै तैसे तृष्णा नरक भोग स्वर्गभोग प्रति धायो करति
है सो उपाउ जीवको नहीं करन देति जासों जीव मुक्त होइ ॥ २१ ॥
मू०-विजयछंद ॥ कौनगनेयहि लोकतरीनबिलोकिबिलो-
किजहाजनबोरै । लाजविशाललता लपटीतनधीर जसत्यतमा
लनितोरै ॥ वंचकताअपमानअयानअलाभभुजंगभयानक-
कृष्णा ॥ पाटुबडो कहूंघाडुनकेशव क्योंतरिजाइतरंगि-
नितृष्णा ॥ २२ ॥
टी०-फेरि कैसी है तृष्णा सो कहत हैं कि ऐसी तृष्णारूपी जो तरंगिणी
नदी है सो कौनी तरहसे जीवसों तरि कहे उतरि जाइ कैसी है तृष्णा नदी
कि यही लोक कहे मृत्युलोककी जे तरी कहे नौका हैं तिन्हें कौन गनै
अर्थ तिनको तो बोरिही देति है ॥ “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः इत्यमरः ॥”
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४५ )
इहां तरी पदने मनुष्यदेह जानो अर्थ मनुष्य देहको प्राप्त ह्वै के तो जीव तृष्णाको
पार पावतही नहीं है मनुष्यदेहमें तृष्णा कैसेहू नहीं मिटति इत्यर्थः ॥ बिलोकि
विलोकि कहे ढूंढि ढूंढि जहाजको बोरति है यहां जहाज पदने देवशरीर जानो
अर्थ देवताहू तृष्णाको पार नहीं पावत अथवा लोकनदी पदते लोकव्यवहार युक्त
मनुष्य देह जानो औ जहाज पदते संसारको त्यागकिये जे योगीजन हैं तिनके
शरीर जानो अर्थ योगीजन तृष्णाको पार नहीं पावने संसारविशिष्ट प्राणिनकी
कहा गिनती है औ लाजरूपी जो विशाल लता है सो लपटी हैं तनमें जिनके
ऐसे धैर्य्य औ सत्यरूपी तमाल वृक्ष हैं तिन्हें अति वेगसों तीरै कहे उखारि
डारति है नदीहू कूलके वृक्ष उखारि डारति है इहां तमालपद उपलक्षण है
तासों वृक्षमात्र जानो अर्थ तृष्णासों लाज औ सत्य प्राणीको दूर ह्वै जात है औ
वंचकता कहे छल औ अपमान औ अयान ( अज्ञानता ) औ अलम्भ कहे या-
चितवस्तुकी अप्राप्तिरूपी जे भुजंग ( सर्प ) हैं तिन करिकै अति भयानक है
नदीहूमैं सर्प रहतहैं अर्थ वंचकतादि जे चारों हैं तिनसों युक्त सदा तृष्णा रहति
है औ कृष्णा कहे श्यामरूपाहै औ जाको पाटु बडो है अन्त नहीं पाइयत औ
दुहूँ कूलमें कहूं घाट नहीं है जहां विश्रामहू पावै ॥ २२ ॥
मू०-पैरतपापपयोनिधिमैंमनमूढ़मनोजजहाजचढ़ोई। पेल-
तऊनतजैजड़जीवजऊबड़वानलक्रोधदढ़ोई ॥ झूठतरंगिनिमैं
उरझैसुइतेपरलोभप्रबाहबढ़ोई ॥ बूड़तहैतेहितेउबरैकहिकेशव
काहेनपाठपढोई ॥ २३ ॥
टी०-यामें जीवप्रति काहूकी शिक्षा है सो प्रसंग पाइ रामचन्द्र कहत हैं हे
मन ! मूढ ! जड ! जीव ! तू मनोज-( कन्दर्प ) रूपी जो जहाज है तामें चढ्यो
पापरूपी पयोनिधि समुद्रमें पैरत है अर्थ कामवश परस्त्री गमनादि पाप करत
फिरत है तहां अनेक अपमानादिते उत्पन्न जो क्रोधरूपी वडवानल है तामें जऊ
कहे यद्यपि दढोई कहे जरिहू गयो है तऊ कहे ताहूपर मनोज जहाजमें चढि
कामसमुद्रमें परिवो यह जो खेल है ताको तू नहीं तजतो एतेहूपर लोभ रूप
प्रवाह बढ्यो है जामें ऐसी जो झूठरूपी तरंगिणी नदी पापसमुद्रमें मिली है तामें
उरझत है अडिजात है अर्थ लोभवश अनेक झुठाई करत फिरत सो या प्रकार है या
समुद्रमें तुम बूडत हौ सो जासों उबरै कहे निकरै सो केशव यह जो पाठ है
ताको आजुतक काहे न पढ्यौ अर्थ भगवानको ना कहे न जप्यो अबहूं भगवा-
नको नाम जपिवो तोंको उचित है इति भावार्थः ॥ केशव पदके कहिबेको
आशय यह कि “के जले शेते इति केशवः” अर्थ वे समुद्रके जलहीमें सोयो
करत हैं तासों समुद्रसों उबारिबो उनको सहज है और नामके जपदूसों या समु-
द्रसों ना कढि है इतिभावार्थः ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ जोकेहूसुखभावना, काहूकोजगहोति ॥ काल
आखुपटतंतुज्यों, तबहींकाढतज्योति ॥ २४ ॥ ब्रह्मविष्णु-
शिवआदिदै, जेतनेदृश्यशरीर ॥ नाशहेतुधावतसबै, ज्योंबड-
वानलनीर ॥ २५ ॥
टी०-यामें समयके व्यवहार कहत हैं जो केहु कहे कौनेहू प्रकारसों सुख-
भावना कहे मोक्षकी वासना जगमें काहू प्राणीके होति है तो काल कहे समय-
रूपी जो आखु ( मूषक ) है सो
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४७ )
औभिक्षुकभूतकहैअमिजासहजैसो । हौंणूकहौंअपनोघरतैस्य-
हिताघरसों अपनोधर कैसो ॥ २७ ॥
टी०-हे मुनिनागर ! या संसारमें दोषमयी कहे दूषण (अपवाद) इति तत्
स्वरूप जो दवारि डाढा है अथवा दोषमयी कहे दूषणाधिक्यरूपी जो दवारि है
सो अति लगी है अति कहि या जनायो कि सब संसारभरमें लगी है ऐसो
स्थान या संसारमें कोऊ नहीं है कि जहां प्राणीको दोष न लगै अथवा जहां
कोहूको दोष न लगावै अर्थ या संसारमें वृथा सब सबको दोष लगावत है
अथवा दोष कहे परस्पर विरोधमयी जो दवारि लगी है ताको देखतही तासों
हमारी मति जरि गई है दवारिके छुयेसों जरियत हैं याके देखतही जरी कहे
अति तेज जनायो ता मतिमें या संसारमें राज्यादि भोगकी आश कहे इच्छा न
गूढ कहे अंतरमें है न उजागर कहे प्रसिद्ध है जैसे सागर-(समुद्र) में रज धूरि
गूढ उजागर नहीं है जा स्थानमें जो जीव दवारिमें जरत है ता स्थानमें ताके
भोगकी इच्छा नहीं होति यह रीतिही है ॥ २६ ॥ जैसे ये सब अपनी अपनो
घर कहत हैं तैसे ता घरसो कहे ताही घरको होहूं अपनो कहौं सो घर अपनो
कैसो कहे कौनविधि है या संसारमें कछु काहूको नहीं है वृथा ममत्व है इति
भावार्थः ॥ २७ ॥
मू०-सुन्दरीछन्द ॥ जैसहिहौंअबतैसहिहौजग । आपद-
सम्पदकेनचलौँमग ॥ एकहिदेहतियागबिनासुनि । हौँनकछू
अभिलाषकहौँमुनि ॥ २८ ॥ जोकछुजीवउधारणकोमत ।
जानतहौ तौ कहौ तनुहैरत ॥ यों कहिमौनगहीजगनायक ।
केशवदासमनोबचकायक ॥ २९ ॥ चामरछन्द ॥ साधुसा-
धुकैसभाअशेषहर्षहर्षियो । दीहदेवलोकतेप्रसूनवृष्टिवर्षियो ॥
देखिदेखिराजलोकमोहियोमहाप्रभा । आइयोतहाँतुरन्तदेव-
कीसबैसभा ॥ ३० ॥
टी०-राज्यादि जे आपद् विपत्ति औ संपद् संपत्तिके मग यह हैं तिनमें हौं न
चलिहौं हे मुनि ! एक देह त्याग बिना और कछू अभिलाष नहीं करतो अर्थ
( २४८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
केवल देह त्याग करिवेहीकी इच्छा है ॥ २८ ॥ रत कहे अनुरक्त ॥ २९ ॥
देवकी सबै सभा आइयो कहे आवत भई सो राजलोक कहे राजभवनकी प्रभा
देखि मोहियो कहे मोहित भई ॥ ३० ॥
मू०- विश्वामित्र ॥ व्यासपुत्रकेसमानशुद्धबुद्धिजानिये । ई-
शकोअशेषतत्त्वतत्त्वसोबखानिये ॥ इष्टहौबशिष्ठशिष्टनित्यव-
स्तुशोधिये । देवदेवरामदेवकोप्रबोधबोधिये ॥ ३१ ॥
टी०-विश्वामित्र वशिष्ठसों कहत हैं कि हम तुमको व्यासपुत्र जे शुकाचार्य्य हैं
तिनके समान शुद्ध बुद्धि कहे ज्ञानयुक्त है बुद्धि जिनकी ऐसे जानियत हैं
अर्थ अतिज्ञानी हौ और ईश जे ईश्वर हैं तिनको जो अशेष कहे संपूर्ण तत्त्व कहे
स्वरूप है ताको तत्त्व कहे सिद्धांत सो अर्थ निश्चयात्मक बखानि एक हेतु कहत
हैं ॥ “तत्त्वस्वरूपेपरमात्मनीतिमेदिनी ॥” हे शिष्ट कहे श्रेष्ठ ! वशिष्ठ ! तुम इष्ट
कहे रघुवंशके गुरु हौ और नित्य जो वस्तु है ताको शोधिये कहे ढूंढो करत हौ
सो सब विधिसों तुमको उचित है तासों देवके देव जे राम देव हैं तिनको प्रबोध
जो ज्ञान है तासों बोधिये कहे बोध करौ अर्थ जीवोद्धारको मत रामचंद्र पूछत
हैं सो कहौ ॥ ३१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचंद्रिकायामिन्द्रजिद्विर-
चितायांजगन्निन्दावर्णनं नाम चतुर्विंशतितमः प्रकाशः ॥ २४ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसादनिर्मिताया
रामभक्तिप्रकाशिकायां चतुर्विंशतितमः प्रकाशः ॥ २४ ॥
मू०-दोहा ॥ कथापचीसप्रकाशमें, ऋषिबशिष्ठसुखपाइ ॥
जीवउधारणरीतिसब, रामहिंकह्योसुनाइ ॥१॥ बशिष्ठ-पद्ध-
टिकाछन्द ॥ तुमआदिमध्यअवसानएक । अरुजीवजन्म समु-
झौअनेक ॥ तुम्हींजोरचीरचनाबिचारि । त्यहिकौनभांतिस-
मुझौमुरारि ॥ २ ॥ सबजातिबूझियतमोहिंराम । सुनियेजोक-
हौंजगब्रह्मनाम ॥ तिनकेअशेषप्रतिबिम्बजाल । त्यइजीवजा
पञ्चविंशप्रकाशः २५. ( २४९ )
निजगमेंकृपाल ॥३॥ निशिपालिकाछन्द ॥ लोभमदमोहब-
शकामजबहींभयो । भूलिगयेरूपनिजबेधितिनसोंगयो ॥ रा-
म ॥ बूझियतबातयहकैनविधिउद्धरै ॥ बशिष्ट ॥ वेदविधिशो-
धिबुधयत्नबहुधाकरै ॥४॥ राम-दोहा ॥ जितलैजैहैबासना,
तिततितहैहैलीन ॥ यत्नकहौकैसेकरे, जीवबापुरोदीन ॥ ५ ॥
बशिष्ट-दोधकछन्द ॥ जीवनकीयुगभांतिदुराशा ॥ होतिशुभा-
शुभरूपप्रकाशा । यत्ननसोंशुभपन्थलगावै । तौअपनोत-
हींपदपावै ॥ ६ ॥
टी०- १ जीवनके जे अनेक जन्म हैं तिनको समुझौं कहे जानत हौ अथवा
अनेक जे जीव हैं तिनके जन्मको अर्थ जा प्रकारसों जीवनकी उत्पत्ति है ताको
समुझौ कहे मोसों बूझत हौ ॥ २ ॥ सब वस्तु जानिहूकै जो हमसों बूझियत कहे
पूंछतहौ तौ सुनौं हम कहियत हैं जगमें जो ब्रह्मनाम कह्यो है अर्थ जिनको
ब्रह्मनाम है तिनके जे प्रतिबिंब जा प्रतिबिंब समूह हैं तेई जीव हैं यह मत प्रति-
बिंबवादिनको वेदांतमें प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥ अपनो जो रूप ब्रह्म है ताको भूलि-
गये तिनसों लोभादिसों ॥ ४ ॥ वासना (दुराशा) ॥ ५ ॥ शुभ दुराशा जो
ईश्वर पूजनादिकी आशा है ताके पंथमें जीवको अथवा मनको लगावै तो
अपनो जो पद (स्थान) है ब्रह्मस्थान ताको पावै अर्थ शुभवासनाको ग्रहण
करै ताके बाद ताहू वासनाको त्याग करि ब्रह्मपदको प्राप्त होय ॥ ६ ॥
मू०-हौंमनतेनिधिपुत्रउपायो। जीवउधारणमंत्रबतायो ॥
हैपरिपूर्णज्योतिंतिहारी । जाइकहीनसुनीननिहारी ॥ ७॥
दोहा ॥ ताकीइच्छातेभये, नारायणमतिनिष्ठ ॥ तिनतेचतु-
राननभये, तिनतेजगतप्रतिष्ठ ॥ ८ ॥ दोधकछंद ॥ जीवस-
बैअवलोकिदुखारे । आपनचित्तप्रयोगबिचारे ॥ मोहिंसुनाये
तुम्हेंतेसुनाऊं । जीवउधारणगीतगुनाऊं ॥ ९ ॥ दोहा-मुक्ति
पुरीदरबारके, चारिचतुरप्रतिहार । साधुनकोसतसंगसम,
( २५० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अरुसंतोषविचार ॥१०॥ यहजगचक्राब्यूहकिय, कज्जलक-
लितअगाधु ॥ तामैंपैठिजोनीकसै, अकलंकितसोसाधु॥११॥
टी०-ज्योति ( ब्रह्मज्योति ) ॥ ७॥ ८ ॥ तिन चतुरानन जगत्के जीवन-
को संसारमें दुखार देखिकै अपने चित्तमें तिन जीवनके उद्धारको प्रयोग कहे
यत्न बिचारचौ सो सब हमको सुनायो है सो तुमको सुनाईयतहै ॥ ९ ॥ १०॥
यामें साधुको लक्षण कहत हैं जैसे कज्जल कलित चक्रव्यूहमें शपथार्थ पैठिकै
अकलंकित कहे कज्जल चिह्न रहित निकसे सो साधु कहे दोषरहित होत है तैसे
कज्जल सम दोषयुक्त जो संसार है तामें पैठि अकलंकित कहे अदोष निकसै सो
प्राणी साधु है ॥ ११ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देखतहूंएककालछियेहूं । बातकहैसुनै
भोगकियेहूं ॥ सोवतजागतनेकनक्षोभै । सोसमतासबहीमहँ
शोभै ॥ १२ ॥ जोअभिलाषनकाहुकोआवै । आयेगयेसुख
दुःख नपावै । लैपरमानँदसौंमनलावै । सोसबमांझसंतोषक-
हाव ॥ १३ ॥ आयोकहाँअबहौंकहिकोहौं । ज्योंअपनोपद्-
पाऊं सोठोहौं ॥ बंधुअबंधुहियेमहँजानैं । ताकहँलोगबिचार-
बखानैं ॥ १४ ॥
टी०-यामें समताको लक्षण कहत हैं संसारको जो' स्रक् चंदन वनितादि
विषयभोग है ताको देखत हूं औ छुयेहूं औ ताहीकी बात कहै औ सुनै औ भो-
गहू करै परंतु सोवत वा जागते नेकहू तामें क्षोभै नहीं अर्थ लीन न होय औ
सबहीमें कहे अग्नि जलादिमें समता शोभै सोई समता है ॥ १२ ॥ यामें संतोष-
को लक्षण कहतहैं जो काहू वस्तुको अभिलाष जीमें न आवै औ काहू वस्तुके
आयेसों प्राप्त भयेसों सुख न पावै औ गयेसों दुःख न पावै औ मनको लैके परमा-
नंद जो ब्रह्महै तामें लगावै सोई सबमांझ कहे चारोंके मध्यमें संतोष कहावत है॥
॥ १३ ॥ यामें विचारको लक्षण कहत हैं मैं कौन हौं औ कहां आयो हौं अब
जा उपायसों अपने पद-( स्थान ) को पाऊँ सोउ ठोहौं कहे ढूंढौं या प्रकारसों
विचार करै औ बंधु कहे हित शम दमादि अबंधु कहे अहित काम क्रोधादिको
हियेमें जानै सोई बिचार है ॥ १४ ॥
पंचविंशप्रकाशः २५. (२५१)
मू०-चारिमैंएकहुजोअपनावै । तौतुमपैप्रभुआवनपावै ॥
राम ॥ ज्योतिनिरीहनिरंजनमानी। तामहैंक्योंऋषिइच्छबखा-
नी ॥ १५ ॥ वशिष्ठ-दोहा ॥ सकलशक्तिअनुमानिये, अद्भुत
ज्योतिप्रकाश ॥ जातेजगकोहोतहै, उत्पतिस्थितिअरुनाश॥
॥ १६ ॥ श्रीराम-दोधकछंद ॥ जीवबँधेसबआपनिमाया ॥
कीन्हेंकुकर्ममनोवचकाया ॥ जीवनचित्तप्रबोधनआनो ।
जीवनमुक्तकेभेदबखानो ॥ १७ ॥
टी०-जैसे चोपदारको अपनाइकै राजाके पास सब जात हैं तैसे इन चारिमैं
एकहूको अपनावै तौ तुमपै जान पावै फेरि राम ऋषिसों पूंछचों कि ज्योतिको
तौ निरीह कहे इच्छा रहित और निरंजन कहे रागरहित मान्यौ औ कह्यो कि
“ताकी इच्छाते भये, नारायण मतिनिष्ठ” तौ ज्योतिमें इच्छा क्यों कही सो
कहौ ॥ १५ ॥ वशिष्ठ कह्यो कि अद्भुत जो ज्योतिको प्रकाश है तामें इच्छादि
कहैं तौ नहीं परंतु इच्छादिकनकी सबकी शक्ति अनुमानियतहै जा शक्तिसों
संसारकी उत्पत्ति स्थिति नाश होत है ॥ १६ ॥ जीव जे हैं ते अपनीमायामें
बँधे मनसा वाचा कर्मणा कुकर्म (कुत्सितकर्म) कीन्हे हैं तिन जीवनको जो
प्रबोधन कहे ज्ञान तुम कह्यो सो हम चित्तमें आन्यो अर्थ भ्यास जान्यो इति अब
जीवनमुक्तके भेद कहौ ॥ १७ ॥
मू०-वशिष्ठ ॥ बाहेरहूंअतिशुद्धहियेहू । जाहिनलागतकर्म
कियेहू ॥ बाहेरमूढसोअंतसयानो। ताकहँजीवनमुक्तबखानो॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ आपुनसोअवलोकिये, सबहीयुक्तायुक्त ॥
अहंभावमिटिजाहिजो,कौंनबद्धकोमुक्त ॥ १९ ॥ श्रीराम-दो-
धक ॥ सोसिगरेगुणहोतसोजानो । स्थावरजीवनमुक्तबखा-
नो ॥ वशिष्ठ ॥ जानिसबैगुणदोषनछँडै । जीवनमुक्तनकेपद-
मंडै ॥२०॥ राम-दोहा ॥ साधुकहावतकरतहैं, जगमेंसबव्यौ-
हार ॥ तिनकोमीचुनछैंसकै, कहिप्रभुकौनविचार ॥ २१ ॥
टी०-यामें जीवन्मुक्तको लक्षण कहते हैं बाहर कहे तनमें औ हियहूमैं
कहे मनहूमैं शुद्ध होय औ पाप पुण्य कर्म करै सो लागै नहीं औ बाहर मूढ़
(२५२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अज्ञान रहे अर्थ बावरं सन रहे औ अंतमें सयानो रहे ताहीको जीवन्मुक्त
कहियत है॥ १८॥ युक्त कहे योग्य मनुष्यादि अयुक्त कहे अयोग्य सूकरादि
तिनको आपुनसो कहे आपने सम अवलोकिये (देखिये) अर्थ अपने सम
सबको जानिये औ अहंभाव मिटि जाय तौ कौन बद्ध है कौन मुक्त है अर्थ
सबही मुक्त हैं ॥१९॥ योग्यके गुण अयोग्यके दोष जानिकै त्याग करै ॥२०॥
रामचन्द्र कहत हैं कि ज्ञानसों जीवनकी मुक्ति कह्यो सो जान्यो अब यह कहौ
कि जे प्राणी साधु कहावत हैं औ जगमें स्त्री पुत्रादिके सब व्यौहार करत हैं
तिनको मीचु नहीं छुई सकति अर्थ तिनकी मृत्यु नहीं होति है ताको विचार
हे प्रभु ! हे वशिष्ठ ! कहौ ॥ २१ ॥
मू०-वशिष्ठ-पद्धटिकाछन्द ॥ जगजिनकोमनतवचरणली-
न । तनतिनकोमृत्युनकरतिक्षीन ॥ तेहिक्षणहींक्षणदुखक्षीण
होत । जियकरतअमितआनँदउदोत ॥ २२ ॥ जोचाहैजीवन
अतिअनंत । सोसाधैप्रणायामयंत्र ॥ शुभरेचकपूरकनामजा-
नि । अरुकुम्भकादिसुखदानिमानि ॥ २३ ॥ जोक्रमक्रमसाधै
साधुधीर । सोतुमहिंमिलै याहीशरीर ॥ राम ॥ जगतुमते नाहिं
सर्वज्ञआन । अबकहौदेवपूजाविधान ॥ २४ ॥
टी०-हे राम ! जिन प्राणिनको मन तुम्होर चरणमें लीन है ते साधु जगमें
सब व्यवहारहू करत हैं ताहूपर तिनके तनको मृत्यु क्षीण नहीं करि सकति औ
तिहि प्राणीके क्षणमें संसाररूपी दुःख क्षीण होत हैं औ मुक्तिरूपी जो अमित
आनन्द है सो उदोत ( प्रकाश ) करत है ॥ २२ ॥ अंगुष्ठ ते तृतीय अंगुलीको
नाम अनामिका है तासों नासाको बाम रंध्र अंगुष्ठसों रोंकि बाम रंध्रसों वायुको
छोडिये सो पूरक प्राणायाम है; औ दक्षिण रंध्र अंगुष्ठसों औ बामरंध्र
अंगुष्ठसों औ बामरंध्र अनामिकासों साथही रोंकि वायुको हृदयमें स्थापन करिये
सो कुम्भक है औ यथा वायुपुराणे।“प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचकः पूरकस्तथा ॥
कुम्भको रेचकस्तत्र नासारंध्राच्च दक्षिणात् ॥ निरुध्य वामरंध्रञ्चानामिकया
विसर्जनम् ॥ निरुध्य दक्षिणं रंध्रं वामरंध्राच्च पूरणम् ॥ तथैवानामिकांगुल्या
पूर्ण तु तदुच्यते ॥ रेचकात्पूरणात्पश्चाद्द्वैपुटन्नाशयस्तथा । सन्निरुध्य हृदि-
स्थाप्य वायुं तिष्ठत्स कुम्भकः" ॥ २३ ॥ २४ ॥
मू०-वशिष्ट-तारकछंद ॥ हमएकसयमनिकसेतपसाको ।
तवजाइभजेहिमवंतरसाको ॥ बहुभांतिकरचोतपक्योंकहि
आवै । शितकण्ठप्रसन्नभयेजगगावै ॥ २५ ॥ दंडक ॥ ऊजरे
उदारउरबासुकीबिराजमान हारकेसमानआनउपमानटोहिये।
शोभिजैजटानबीचगंगाजूकेजलबुंदकुंदकीसीकलीकेशोदासम-
नमोहिये।नखकीसीरेखाचंद्रचन्दनसीचारुरजअंजन शृंगारहू-
गरलरुचिरोहिये। सबसुखसिद्धि शिवासौंहैशिवजूकेसाथजाव-
कसोपावकलिलारलाग्योसोहिये ॥ २६ ॥
टी०-रसा (पृथ्वी) जग गावै अर्थ जिनको जगत्के प्राणी गान करत
हैं ॥ २५ ॥ उजरे औ उदार कहे बडे उरमें हार मालाके समान वासुकी नाम
सर्प विराजमानहै और उपमाको नहीं टोहिये कहे ढूंढियत अर्थ और उपमाके
सदृश नहीं हैं तासों खोज नहीं करियत रज कहे विभूति अंजन जां शृंगार है
ताकी रुचि गरल जो विष है ता करिके रोहिये कहे धारण करियत है अर्थ लगि-
गयो पार्वतीके नेत्रांजन सम गरल शोभित है सब सुखकी सिद्धि शिवा जो
पार्वतीजी हैं ते संगमें शोभती हैं औ जावक कहे महाउर सम लिलारमें लाग्यो
पावक (अग्नि) शोभित है ऐसे सदा सुरत चिह्नयुक्त प्रसन्न है हमारे समीप
आये इतिशेषः ॥ २६ ॥
मू०-महादेव-तारकछन्द ॥ बरमाँगिकछूऋषिराजसयाने ।
बहुभांतिचलेतपपंथपयाने ॥ वशिष्ट ॥ पुजवोपरमेश्वरमोमन
इच्छा । सिखवोप्रभुदेवप्रपूजनशिक्षा ॥ २७ ॥ शिव-दोहा ॥
रामरमापतिदेवनहिं, रंगनरूपनभेव ॥ देवकहतऋषिकौनको,
सिखऊंजाकीसेव ॥ २८ ॥ वशिष्ट-तोमरछंद ॥ हमकहाजान-
हिंअज्ञ । तुमसर्वदासर्वज्ञ ॥ अबदेवदेहुंबताइ । पूजाकहोस-
मुझाइ ॥ २९ ॥ शिव ॥ सतचित्तप्रकाशप्रभेव । तेहिबेद-
मान तदेव ॥ तेहिपूजिऋषिरुचिमंडि । सबप्राकृतनकोछांडि
यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
(२५४) रामचन्द्रिका-सटीक ।
॥ ३० ॥ पूजायहैउरआनु । निर्व्याजधरियेध्यातु ॥ योंपू-
जिघटिकाएक । मनुकियोयाजअनेक ॥ ३१ ॥
टी०-चले तपपंथमें अर्थ उचित तपपंथमें तुम बहुभांति पथाने कहे गमन
करचौ है अर्थ बडो तप करचो है ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ सत कहे सत्यरूप
चित् कहे चैतन्यरूप जो प्रकाश कहे ज्योति जो रामचन्द्रको प्रमेव कहे भेद है
अर्थ रूपांतर है ताको देव वेद मानत हैं प्राकृत कहे लघु गणेशादि ॥ ३० ॥
निर्व्याज कहे निष्कपट ध्यानको धरिये यहै ता देवकी पूजा है अर्थ ताकी पूजा
ध्यानही है और नहीं है ॥ ३१ ॥
मू०-जियजानयहईयोग । सबधर्मकर्मप्रयोग ॥ सबरूप
पूजिप्रकाश । तबभयेहमसेदास ॥ यहबचनकरिपरमान ।
प्रभुभयेअंतर्द्धान ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ यहपूजाअद्भुतअगिनि,
सुनिप्रभुत्रिभुवननाथ ॥ सबैश्रुभाशुभबासना, मैंजारीनि-
जहाथ॥ ३३ ॥ झलनाछंद ॥ यहिभांतिपूजापूजिजीवजो-
भक्तपरमकहाइ । भवभक्तिरसभागीरथीमहँदेहिडुबनिबहाइ ॥
पुनिमहाकर्त्तामहात्यागीमहाभोगीहोइ । अतिशुद्धभावरमै-
रमापतिपूजिहैसबकोइ ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ रागद्वेषबिनकौसहूं,
धर्माधर्मजोहोइ॥हर्षशोकउपजैनमन,कर्त्तामहासोलोइ॥३५॥
टी०-धर्मके जे दानादि कर्म हैं तिनको प्रयोग कहे यत्न सब प्राणी प्रकाश
जो रूप है ज्योतिरूप ताको पूजिकै हमारे सम दास भये हैं परिमाण कहे निश्चय
॥ ३२ ॥ ३३ ॥ जो जीव या प्रकारसों पूजा पूजिकै परमभक्त कहायकै भव जो
संसार है ताके दुःखिनको भक्तिरसकी जो भागीरथी गंगा हैं तामें बहाइ देइ
अर्थ दूरि करै फेरि महाकर्त्ता औ महात्यागी औ महाभोगी होइ औ शुद्धभावसों
रमापति (ईश्वर) में रमैं कहे प्राप्त होइ औ ताको सब कोउ पूजन करिहैं
॥ ३४ ॥ महाकर्त्तादिकनकें तीनहूके लक्षण क्रमसों कहत हैं जाके राग कहे
प्रीति बिना जीव रक्षणादि कछू धर्म अकस्मात् ह्वै जाइ ताको हर्ष कहे सुख न
होइ औ द्वेष कहे विरोध बिना जीवहिंसादि अधर्म होइ ताको शोक दुःख ना
होइ सो प्राणी महाकर्त्ता हैं ॥ ३५ ॥
पंचविंशप्रकाशः २५. ( २५५ )
मू०-दोहा ॥ भोजअभोजनरतविरत, नीरससरससमान ॥
भोगहोइअभिलाषबिन, महाभोगतामान ॥ ३६ ॥ जोकछु
आंखिनदेखिये, बाणीबर्य्यौजाहि ॥ महात्यागीजानिये,
झूठोजानौताहि ॥ ३७ ॥ तोमरछंद ॥ जियज्ञानबहुव्यौहार ।
अरुयोगभोगबिचार ॥ यहिभांतिहोइजोराम । मिलिहैंसोते-
रेधाम ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ निशिबासरवस्तुबिचारकरैमुखसां-
चहियेकरुणाघनुहै । अघनिग्रहसंग्रहधर्मकथानपरिग्रहसाधु-
नकोगनुहै । कहिकेशवयोगजगेहियभीतरबाहेरभोगनसोंतनु-
है । मनुहाथसदाजिनकेतिनकोबनहीघरहैघरहीबनुहै ॥ ३९॥
टी०-भोज कहे भक्ष्य औ अभोज ( अभक्ष्य ) पदार्थमें रत ( अनुरक्त ) औ
विरत ( विरक्त ) न होइ अर्थ भोज्य अभोज्यको समान भक्षण करै औ निरस
कहे स्वादरहित सरस ( स्वादयुक्त ) वस्तु जाको समान होईं औ भोग जाको
अभिलाष बिना होइ सो महाभोक्ता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ जाके जियमें ज्ञानको
बहुत प्रकारको व्यौहार है औ योग औ भोगको बहु विचार है ऐसो जब होइ
तब तुम्हारो जो धाम ( तेज ) है ज्योतिरूप ताको मिलिहै अथवा धाम कहे
घर वैकुंठ ताको मिलि है ( प्राप्त ) ह्वै है ॥ ३८ ॥ वस्तुविचार कहे ब्रह्मविचार
अथवा सत् असद्वस्तुको विचार निग्रह ( ताडन ), परिग्रह कहे परिजन ( निक-
टवासी ) इति ॥ “परिग्रहः परिजने इति मेदिनी” ॥ ३९ ॥
मू०-॥ दोहा ॥ लेइजोकहियेसाधुअन, लीन्हेकहियेबाम ॥
सबकोसाधनएकजग, रामतिहारोनाम ॥ ४० ॥ राम ॥ मोहिं
नहुतोजनाइबे, सबहीजान्यौआजु ॥ अवजोकहौसोकरिबनै,
कहेतुम्हारेकाज ॥ ४१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्र-
जिद्विरचितायांजीवोद्धारवर्णनं नाम पंचविंशः प्रकाशः ॥ २५ ॥
( २५६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टी०-वाम कहे कुटिल साधन कहे उपाय अर्थ मुक्तिको उपाय केवल तुम्हारे
नामको जप है ॥ ४० ॥ जो आपनो ईश्वरत्व मोहि काहूको जनाइबोई नहीं रह्यौ
सो सबही जान्यौ तासों जो कहौ सो अब करिये अर्थ राज्य लेबेकी कहत
हौ सो लेहैं ॥ ४१ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां पंचविंशः प्रकाशः ॥ २५ ॥
मू०-दोहा ॥ कथाछबीसप्रकाशमें, कह्योवशिष्ठविवेक ॥
रामनामकोतावअरु, रघुबरकोअभिषेक ॥ १ ॥ तोटनकछंद ॥
बोलेऋषिराजभरथतबै । कीजैअभिषेकप्रयोगसबै ॥ शत्रुघ्न-
कह्योचुपह्वैनरहै । श्रीरामकेनामकोतत्त्वगहौ ॥ २ ॥
टी०-जब रामचन्द्र राज्य अंगीकार करचौ तब ऋषिराज-(वशिष्ठ) सों
भरत बोले प्रयोग (यत्न) शत्रुघ्न भरतसों कह्यो कि चुप क्यों नहीं है रहते
अर्थ राज्याभिषेक तौ रामचन्द्र अंगीकार करचौ है तौ हैहैई ॥ १ ॥ जो ऋषि-
राज कह्यौ है कि सबको साधन एक जग, राम तिहारो नाम ॥ तारामनामकी
तत्त्व ऋषिसों गहौ अर्थ सुनिकै धारण करौ ॥ २ ॥
मू०-राम-तोटनकछन्द ॥ श्रद्धाबहुधाउरआनिभई।ब्रह्मासु-
तसोंबिनतीबिनई ॥ श्रीरामकोनामकहौरुचिकै । मतिमानमहा-
मनकोशुचिकै ॥ ३ ॥ वशिष्ठ--स्वागताछंद ॥ चित्तमांझजस
आनिअरुझी । बाततातकहँमैंयहबूझी ॥ योगयागकरिजै
: आवै । स्नानदानविधिमर्मनपावै ॥ हैअशक्तसबभांतिबिचारे
कौनभांतिप्रभुताहिउधारो ॥ ४ ॥
टी०-शत्रुघ्नके उरमें बडी श्रद्धा भई ॥ ३ ॥ अरुझी अर्थ संदेह भई ता
( ब्रह्मा ) मर्म ( सिद्धान्त ) ॥ ४ ॥
मू०-ब्रह्मा-भुजंगप्रयातछन्द ॥ जहाँसच्चिदानन्दरूपैधरैंगे ।
सुत्रैलोक्यकोतापतीन्योंहरैंगे । कहैगोसबैनामश्रीरामताको ।
सदासिद्धहैशुद्धउच्चारजाको ॥ ५ ॥ कहैनामआधोसोआधोन
पड़्विंशप्रकाशः २६. ( २५७ )
शावै। कहैनामपूरोसोबैकूंठपावै॥ सुधारैंदुहूंलोककोवर्णदोऊ।
हियेछद्मछांड़ैकहैवर्णकोऊ ॥ ६ ॥ सुनावैसुनैसाधुसंगीकहावै।
कहावैकहैपापपुंजैनशावै ॥ स्मरावैस्मरैवासनाजारिडारै। तजै
छद्मकोदेवलोकैसिधारै ॥७॥ तामरसछंद ॥ जबसबवेदपुराण
नशैंहैं। जपतपतीरथहूमिटिजैंहैं ॥ द्विजसुरभीनहिंकोउविचारै।
तबजगकेवलनामउधारै ॥ ८ ॥ दोहा ॥ मरणकालकाशीविषे-
महादेवनिजधाम ॥ जीवनकोउपदेशिहैं,रामचन्द्रकोनाम॥९॥
मरणकालकोऊकहै, पापीहोइपुनीत ॥ सुखहीहरिपुरजाइहै,
सबजगगावैगीत ॥ १० ॥
टी०-और मंत्र पुरश्चरणादिसों सिद्ध किये जात हैं औ याके शुद्ध उच्चार
सदाही सिद्ध हैं॥ ५ ॥ आधो नाम रा अथवा म अधोगति (नरक) इति,
पूरे नामके जपसों बैकुंठ प्राप्तिहोतिहै मृत्युलोकमें कहा होत है ता लिये फेरि
कहत हैं कि राम ये जे दुवौ अंक (वर्ण) हैं ते मृत्युलोक, स्वर्गलोक दुवौ सुधा-
रत हैं मृत्युलोकमें यश गौरवादिको लाभ होत है, बैकुंठमें देवसुख प्राप्त होत है
इत्यर्थः ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ १० ॥
मू०-रामनामेकतत्त्वको, जानतवेदप्रभाव, ॥ गंगाधरकैध-
रणिधर, बालमीकिमुनिराव ॥ ११ ॥ दोधकछंद ॥ सातहु
सिंधुन्केजलह्वरे। तीरर्थजालनिकेपयपूरे॥ कंचनकेघटबानर
लीने। आइगयेहरिआनँदभीने ॥ १२ ॥ दोहा ॥ सकलरत्न
मयमृत्तिका, शुभऔषधीअशेष ॥ सातद्वीपकेपुष्पफल, पल्ल-
वससविशेष ॥ १३ ॥ दोधकछंद॥आंगनहीरनकोमनमोह्रै॥
कुंकुमचन्दनचर्चितसोहै ॥ हैसरसीसमशोभप्रकाशी ।
लोचनमीनमनोजविलाशी ॥ १४ ॥ दोहा ॥ गजमोतिनयुत
शोभिजैं, मरकतमणिकेथार ॥ उदकबुन्दसोंजनुलसत, पुर-
इनिपत्रअपार ॥ १५ ॥ बिशेषकछंद ॥ भांतिनभांतिनभाज-
१७
नराजनकौनगने । ठौरहिठौररहेजनुफूलिसरोजघने ॥ भूपन-
केप्रतिबिम्बबिलोकतरूपरसे। खेलतहैजलमांझमनोजलदेव-
बसे ॥ १६ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ मृगमदमिलिकुंकुमसुरभिनीर।
घनसारसहितअम्बरउसीर । घसिकेशारिसोंबहुबिबिधिनौर ।
क्षितिछिरकेचरथावरशरीर ॥ १७ ॥ बहुवर्णफूलफलदलउ-
दार । तहँभरिराखेभाजनअपार ॥ तहँपुष्पवृक्षशोभैंअनेक ।
मणिवृक्षस्वर्णकेवृक्षएक ॥ १८ ॥ त्यांहिंउपररच्योएकैबितान।
दिविदेखतदेवनकेबिमान । दुहुँलोकहोतपूजाबिधान।अरुनृ-
त्यगीतवादित्रगान ॥ १९ ॥
टी०-धरणिधर ( शेष ) ॥ ११ ॥ हरि जे रामचन्द्र हैं तिनके अभिषेको-
त्सवके आनंदमें भीने इत्यर्थः ॥ १२ ॥ रस ( घृतादि ) ॥ १३ ॥ भांतिन
भांति तीनि छंदमें एक वाक्यता है सरसी तडाग ता आंगनमें प्रतिबिंबत जे
सबके लोचन हैं तेई मनोजके ( कामके ) मीन ( मत्स्य ) हैं अथवा मनोजबि-
लासी कहे कामके खेलिबेके मीन हैं ॥ १४ ॥ ताही तडागमें पात्र पुरइनि पत्र
समहैं ॥ १५ ॥ ताही तडागमें भाजन कहे पात्र सरोज सम फूलि रहे हैं प्रति-
बिंब जलदेव सम हैं॥ १६ ॥सुरभि ( सुगंधित अथवा सुंदर ) “सुरभिर्हेम्नि चंप-
के जातीफले मातृभेदे रम्ये चैत्र वसंतयोः॥ सुगंधौ गवि शलक्यामिति हेमचंद्रः॥”
अम्बर सुगन्ध वस्तुविशेष ॥“अंबरंनद्वयोर्व्योम्निसुगन्ध्यंतरवस्त्रयोरिति मेदिनी॥”
सरिसों ( बराबरिसों ) अर्थ मृगमदादि सब सम घसिकै ॥ १७ ॥ दलपत्र
( भाजन पात्र ) ॥ १८ ॥ एकै अपूर्व वादित्र ( बाजने ) ॥ १९ ॥
मू०-तरुऊमरिकोआसनअनूप । बहुरचितहेममयविश्वरू-
प ॥ तहँबैठेआपुनआइराम । सियसहितमनोरतिरुचिरकाम
॥ २०॥ जनुघनदामिनिआनन्ददेत । तरुकल्पकल्पबल्लीस-
मेत । ह्वैकैधौं विद्यासहितज्ञान । कैतपसंयुक्तमनसिद्धिजान ॥
॥२१॥ कैबिक्रमयुतकीरंतिप्रवीन । कैश्रीनारायणशोभलीन॥
कैअतिशोभितस्वाहासनाथ। कैसुन्दरता शृंगारसाथ ॥ २२ ॥
षड्बिंशप्रकाशः २६. (२५९)
सुन्दरीछंद ॥ केशवशोभनछत्रबिराजत । जाकहँदेखिसु-
धाधरलाजत ॥ शोभितमोतिनकेमतिकेगन । लोकन
केजनुलागिरेहेमन ॥ २३ ॥ दोहा ॥ शीतलताशुभतासबै,
सुन्दरताकेसाथ ॥ अपनीरविक्रीअंशुल, सेवतजनुनिशि-
नाथ ॥ २४ ॥
टी०--ऊमारि (मूर्लारि) हैममय कहे सुवर्णमयी विश्व कहे संसारके रूप अर्थ
संसारके वस्तु स्वरूपन करिके रचित है (चित्रित) है ॥ २० ॥ कै तपसंयुक्त सिद्धि
कहे तपसिद्धि यह मनमें जानु इत्यर्थः ॥ २१ ॥ श्री (लक्ष्मी) सनाथ कहे अग्रि
सहित शृंगाररस अथवा भूषणको शृंगार कियेसों सुन्दरता बढति है तासों जानों
॥ २२ ॥ २३ ॥ ताही छत्रमें तर्क है शीतलता औ शुभता कहे मांगल्य औ
सुन्दरता जो सब कहे पूर्ण है तिनके संग अपनी औ रविकी अंशु (किरणि)
लेके मानों निशिनाथ (चन्द्रमा) रामचन्द्रको सेवत है चन्द्रकिरणि सम मुक्तन-
की किरणि हैं रविकिरणि सम औ जटित जे माणिकादि मणिहैं तिनकी किरणि
हैं औ शीतलतादि हैंही ॥ २४ ॥
मू०--सुन्दरीछन्द ॥ ताहिलियेरविपुत्रसदारत । चमरबिभी-
षणअंगदढारत ॥ कीरतिलैजगकीजनुवारत । चन्द्रकचंदन-
चंदसवांरत ॥ २५ ॥ लक्ष्मणदर्पणकोदेखरावत । पाननिल-
क्ष्मणबंधुखवावत १॥ भरथ॒लैलैनरदेवसदारत । देवअदेवनिपा-
यनपारत ॥ २६ ॥ दोहा ॥ जामवंतहनुमंतनल, नीलभरा-
तिबसाथ ॥ छरीछबीलीशोभिजै, दिक्पालनकेहाथ ॥ २७ ॥
रूपबिक्रमसुरभिसम, बचनरचनबहुभेव ॥सभामध्यपहिचा-
नये, नरनरदेवनदेवः॥ २८ ॥ आईजबअभिषेककी, घटिका
केशवदास ॥ बाजेएकहिबारबहु, दुंदुभिदीहअकाश ॥ २९॥
टी०-रत कहे अनुरक्त है कीर्तिसम चमरहै फिरि चमर कैसे हैं कि चंद्रक जो
कपूरहै औ चंदन औ चंद्रमा है सदा आर्त कहे पीडित जिनसों अर्थ जिनकी
( २६० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
श्वेततासों अपनी श्वेतताही न समुझि चंद्रकादि दुःखी होतहैं ॥ २५ ॥ २६ ॥
माहीं (मरातिव) प्रसिद्ध है छरी (आशा) ॥ २७ ॥ सुरभि (सुगंधि)
॥ २८ ॥ २९ ॥
मू०-झूलनाछंद ॥ तबलोकनाथविलोकि कैरघुनाथकोनि-
जहाथ । सबिशेषसोंअभिषेककीपुनिउचरीशुभगाथ ॥ ऋषि
राजइष्टवशिष्ठसोंमिलिगाधिनन्दनआइ। पुनिबालमीकिबिया-
सआदिजितेहुतेमुनिराइ ॥ ३० ॥ रघुनाथशंभुस्वयंभुकोनिज
भक्तिदीसुखपाइ । सुरलोककोसुरराजकोकियदीहनिर्भयराइ ।
बिधिसोंऋषीशनसोंबिनयकरिपूजिऔपरिपाई । बहुधाइईत-
पव्रक्षकीसबासिद्धि सिद्धसुभाइ ॥ ३१ ॥
टी०-लोकनाथ जे ब्रह्मा हैं तिन अभिषेककी घटिका आई बिलोकिकै निज
हाथसों रघुनाथको अभिषेक की कहे कर