रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुरावशप्रकाशः २४. (२४३)
कल्पद्रुमहैं ते टूटि जातहैं अर्थ लोभसों दानको अभिलाष नशि जातहै औ उचिता-
नुचितकारिबेमें जो सयानप (चातुरी) है सो नहीं रहति औ जैसे श्रीहरि जे
विष्णुहैं तिनके अनुरागसों भक्ति कियेसों सो सागरसो संसारदुःख सूखत
है तैसे ता लोभके आगे जो जीवके सागरसे सुख सूखि जात हैं अर्थ
लोभवश इत उत प्राणी धायो धायो फिरत है धन, पुत्र, कलत्रादिको सुख नहीं
करन पावत औ जैसे राघवकी निशि कहे राघव संबंधी व्रत दिन रामनौमी
आदिकी निशिमें पलहू भरि जागते अघ (पाप) बिलात हैं तैसे लोभके आगे
पहारसे बड़े बड़े पुण्य बिलात हैं अर्थ लोभसों ऐसे ब्रह्मद्रव्यहरणादि पातक
प्राणी करत हैं जासों केतेऊ बड़े पुण्य होईं तौ नशि जात हैं यामें केशवको
रामोक्तिमें अपनी उक्तिको भ्रम है औ जैसे ब्रह्मदोषते संतति जो वंश है सो
नशि जात है तैसे लोभके आगे अनेकगुण भागत हैं अर्थ अनेकगुणको त्याग