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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 269 में से

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पृष्ठ 250

( २४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

विड़ेंगे कहे भागि जात है तैसे अघ वाघनको देखि धर्मादि भागतहैं पापके संयोगते
जीवके हितसाधक जे दान दयादि हैं ते सब नशि जात हैं इतिभावार्थः ॥ १९ ॥
मू०-दोहा ॥ आंखिनआछतआंधरो, जीवकरैबहुभांति ॥
धीरनवीरजबिनकरै, तृष्णाकृष्णाराति ॥ २० ॥ तृष्णाकृष्णा
षट्पदी, हृदयकमलमेंबास ॥ मत्तदंतिगलगंडयुग, नर्क-
अनर्कविलास ॥ २१ ॥
टी०-तानि छंदनमों तृष्णाको व्यवहार कहत हैं तृष्णारूपी जो कृष्णाराति
कहे कृष्णपक्षकी राति है सो आंखिन अक्षत कहे रहने पर जीवको आँधरो
करति है अर्थ तृष्णायुक्त प्राणीको आंखिनसों आपनो अपमानादि नहीं देखि-
परत औ कृष्णा रातिहूमों अंधकारमें घटपटादि वस्तु आँखिनसों नहीं देखि परत
औ धीरनको धैर्य्य बिना कारदेति है अर्थ कहूं कछु पाइबो होइ तौ तृष्णायुक्त
प्राणी कैसोऊ धीर होइ तौ धीरता छोड़ि धावतहै औ रातिमें अंधकारमें चौरादि
भयसों बड़े धीरउ धैर्य्य बिन है जात हैं ॥ २०॥ कृष्णा कहे श्याम जो तृष्णा-
रूपी षट्पदी (भ्रमरी) है ताको हृदयरूपी कमलमें वासहै ता तृष्णाको नर्क
औ अनर्क कहे स्वर्गकी विलास दुवौ मत्तदंतीके गल कहे गलत अर्थ मदसों
चुवत दुवौ गंडस्थल हैं अर्थ जैसे भ्रमरी कमलमें वसति है औ गजनके गंड-
स्थलन प्रति धायो करतिहै तैसे तृष्णा नरक भोग स्वर्गभोग प्रति धायो करति
है सो उपाउ जीवको नहीं करन देति जासों जीव मुक्त होइ ॥ २१ ॥
मू०-विजयछंद ॥ कौनगनेयहि लोकतरीनबिलोकिबिलो-
किजहाजनबोरै । लाजविशाललता लपटीतनधीर जसत्यतमा
लनितोरै ॥ वंचकताअपमानअयानअलाभभुजंगभयानक-
कृष्णा ॥ पाटुबडो कहूंघाडुनकेशव क्योंतरिजाइतरंगि-
नितृष्णा ॥ २२ ॥
टी०-फेरि कैसी है तृष्णा सो कहत हैं कि ऐसी तृष्णारूपी जो तरंगिणी
नदी है सो कौनी तरहसे जीवसों तरि कहे उतरि जाइ कैसी है तृष्णा नदी
कि यही लोक कहे मृत्युलोककी जे तरी कहे नौका हैं तिन्हें कौन गनै
अर्थ तिनको तो बोरिही देति है ॥ “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः इत्यमरः ॥”