रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषड्बिंशप्रकाशः २६. (२५९)
सुन्दरीछंद ॥ केशवशोभनछत्रबिराजत । जाकहँदेखिसु-
धाधरलाजत ॥ शोभितमोतिनकेमतिकेगन । लोकन
केजनुलागिरेहेमन ॥ २३ ॥ दोहा ॥ शीतलताशुभतासबै,
सुन्दरताकेसाथ ॥ अपनीरविक्रीअंशुल, सेवतजनुनिशि-
नाथ ॥ २४ ॥
टी०--ऊमारि (मूर्लारि) हैममय कहे सुवर्णमयी विश्व कहे संसारके रूप अर्थ
संसारके वस्तु स्वरूपन करिके रचित है (चित्रित) है ॥ २० ॥ कै तपसंयुक्त सिद्धि
कहे तपसिद्धि यह मनमें जानु इत्यर्थः ॥ २१ ॥ श्री (लक्ष्मी) सनाथ कहे अग्रि
सहित शृंगाररस अथवा भूषणको शृंगार कियेसों सुन्दरता बढति है तासों जानों
॥ २२ ॥ २३ ॥ ताही छत्रमें तर्क है शीतलता औ शुभता कहे मांगल्य औ
सुन्दरता जो सब कहे पूर्ण है तिनके संग अपनी औ रविकी अंशु (किरणि)
लेके मानों निशिनाथ (चन्द्रमा) रामचन्द्रको सेवत है चन्द्रकिरणि सम मुक्तन-
की किरणि हैं रविकिरणि सम औ जटित जे माणिकादि मणिहैं तिनकी किरणि
हैं औ शीतलतादि हैंही ॥ २४ ॥
मू०--सुन्दरीछन्द ॥ ताहिलियेरविपुत्रसदारत । चमरबिभी-
षणअंगदढारत ॥ कीरतिलैजगकीजनुवारत । चन्द्रकचंदन-
चंदसवांरत ॥ २५ ॥ लक्ष्मणदर्पणकोदेखरावत । पाननिल-
क्ष्मणबंधुखवावत १॥ भरथ॒लैलैनरदेवसदारत । देवअदेवनिपा-
यनपारत ॥ २६ ॥ दोहा ॥ जामवंतहनुमंतनल, नीलभरा-
तिबसाथ ॥ छरीछबीलीशोभिजै, दिक्पालनकेहाथ ॥ २७ ॥
रूपबिक्रमसुरभिसम, बचनरचनबहुभेव ॥सभामध्यपहिचा-
नये, नरनरदेवनदेवः॥ २८ ॥ आईजबअभिषेककी, घटिका
केशवदास ॥ बाजेएकहिबारबहु, दुंदुभिदीहअकाश ॥ २९॥
टी०-रत कहे अनुरक्त है कीर्तिसम चमरहै फिरि चमर कैसे हैं कि चंद्रक जो
कपूरहै औ चंदन औ चंद्रमा है सदा आर्त कहे पीडित जिनसों अर्थ जिनकी