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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 269 में से

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पृष्ठ 248

( २४२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मू०-दोहा ॥ जहांभामिनीभोगतहँ, बिनभामिनिकहँभो-
ग ॥ भामिनिछूटेजगछुटै, जगछूटेसुखयोग ॥ १५ ॥ जोई
जोईजोकरै, अहंकारकेसाथ ॥ स्नानदानतपहोमजप, निष्फ-
लजानौनाथ ॥ १६ ॥ तोटकछंद ॥-जियमांझअहंपदजोद-
मिये । जिनहींजिनहींगुणश्रीरमिये ॥ तिनहींतिनहींलखिलो-
भडसै । पटतंतुनिउंदुरज्यौंतरसै ॥ १७ ॥
टी०-यामें स्त्री व्यवहार कृत पीड़ा कहत हैं तहां भामिनी ( स्त्री ) है तहांई
दुःखरूपी संसारभोग हैं सो भामिनी जब छूटै जब संसार छूटै तब सुखको
योग है अर्थ दुःखमय संसारको बंधन दुराशादि सम स्त्रीहू है ॥ १५ ॥
यामें अहंकारको व्यवहार कहत हैं अहंकारके साथ जो करिये सो निष्फल
होत है॥ १६ ॥ ताही अहंकारको जो काहू प्रकारसों दमिये (दूरिये) तो
जिन जिन मिथ्याभावनादि गुणसों श्री जो द्रव्य है तासों रमिये अर्थ
द्रव्यको प्राप्त हूजियत है तिन गुणनको देखिकै लोभ जो है सो जीवको डसत
है ( काटत है ) अर्थ काहूको अनुत्तमकर्मसों पावत देखि लोभ जीवको प्रे रत
है कि यहै कर्म करौ जामें द्रव्य लाभ होइ अहंकारहीन प्राणी योग्यायोग्यको
विचार नहीं करत जा प्रकार द्रव्य मिलै सोई ऊंच नीच कर्म करत है इति
भावार्थः लोभ कैसे डसत है जैसे पट (वस्त्र) के तंतु कहे सूत्रनको उंदुर कहे
मूषक तरसै कहे काटत है आशय कि जैसे मूषक पटतंतुनको वृथा काटत है
कछु ताको काम नहीं है तैसे लोभ वृथा जीवको सतावत है ॥ १७ ॥
मू०-बिजयछंद ॥ दानसयाननिकेकलपद्रुमटूटतज्यौँऋण
ईशकेमांगे । सूखतसागरसेसुखकेशवज्यौंदुखश्रीहरिकेअनुरा-
गे ॥ पुण्यबिलातपहारनसेपलज्यौँअघराघवकी निशिजागे ।
ज्यौंद्विजदोषतेसंततिनाशितित्योंगुणभाजतलोभकेआगे ॥ १८॥
टी०-सो लोभ कैसो है ताको ब्यवहार कहत हैं जैसे ईश ( महादेव ) हैं
तिनके मांगेते ऋण टूटि जात है अर्थ जब महादेव एते द्रव्य देते हैं जामें केतेऊ
बड़ो ऋण होइ सो दूरि होतहै तैसे ता लोभके आगे दान औ सयाननके डे