रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमुद्रमें तुम बूडत हौ सो जासों उबरै कहे निकरै सो केशव यह जो पाठ है
ताको आजुतक काहे न पढ्यौ अर्थ भगवानको ना कहे न जप्यो अबहूं भगवा-
नको नाम जपिवो तोंको उचित है इति भावार्थः ॥ केशव पदके कहिबेको
आशय यह कि “के जले शेते इति केशवः” अर्थ वे समुद्रके जलहीमें सोयो
करत हैं तासों समुद्रसों उबारिबो उनको सहज है और नामके जपदूसों या समु-
द्रसों ना कढि है इतिभावार्थः ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ जोकेहूसुखभावना, काहूकोजगहोति ॥ काल
आखुपटतंतुज्यों, तबहींकाढतज्योति ॥ २४ ॥ ब्रह्मविष्णु-
शिवआदिदै, जेतनेदृश्यशरीर ॥ नाशहेतुधावतसबै, ज्योंबड-
वानलनीर ॥ २५ ॥
टी०-यामें समयके व्यवहार कहत हैं जो केहु कहे कौनेहू प्रकारसों सुख-
भावना कहे मोक्षकी वासना जगमें काहू प्राणीके होति है तो काल कहे समय-
रूपी जो आखु ( मूषक ) है सो