रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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(२५४) रामचन्द्रिका-सटीक ।
॥ ३० ॥ पूजायहैउरआनु । निर्व्याजधरियेध्यातु ॥ योंपू-
जिघटिकाएक । मनुकियोयाजअनेक ॥ ३१ ॥
टी०-चले तपपंथमें अर्थ उचित तपपंथमें तुम बहुभांति पथाने कहे गमन
करचौ है अर्थ बडो तप करचो है ॥ २७ ॥ २८ ॥ २९ ॥ सत कहे सत्यरूप
चित् कहे चैतन्यरूप जो प्रकाश कहे ज्योति जो रामचन्द्रको प्रमेव कहे भेद है
अर्थ रूपांतर है ताको देव वेद मानत हैं प्राकृत कहे लघु गणेशादि ॥ ३० ॥
निर्व्याज कहे निष्कपट ध्यानको धरिये यहै ता देवकी पूजा है अर्थ ताकी पूजा
ध्यानही है और नहीं है ॥ ३१ ॥
मू०-जियजानयहईयोग । सबधर्मकर्मप्रयोग ॥ सबरूप
पूजिप्रकाश । तबभयेहमसेदास ॥ यहबचनकरिपरमान ।
प्रभुभयेअंतर्द्धान ॥ ३२ ॥ दोहा ॥ यहपूजाअद्भुतअगिनि,
सुनिप्रभुत्रिभुवननाथ ॥ सबैश्रुभाशुभबासना, मैंजारीनि-
जहाथ॥ ३३ ॥ झलनाछंद ॥ यहिभांतिपूजापूजिजीवजो-
भक्तपरमकहाइ । भवभक्तिरसभागीरथीमहँदेहिडुबनिबहाइ ॥
पुनिमहाकर्त्तामहात्यागीमहाभोगीहोइ । अतिशुद्धभावरमै-
रमापतिपूजिहैसबकोइ ॥ ३४ ॥ दोहा ॥ रागद्वेषबिनकौसहूं,
धर्माधर्मजोहोइ॥हर्षशोकउपजैनमन,कर्त्तामहासोलोइ॥३५॥
टी०-धर्मके जे दानादि कर्म हैं तिनको प्रयोग कहे यत्न सब प्राणी प्रकाश
जो रूप है ज्योतिरूप ताको पूजिकै हमारे सम दास भये हैं परिमाण कहे निश्चय
॥ ३२ ॥ ३३ ॥ जो जीव या प्रकारसों पूजा पूजिकै परमभक्त कहायकै भव जो
संसार है ताके दुःखिनको भक्तिरसकी जो भागीरथी गंगा हैं तामें बहाइ देइ
अर्थ दूरि करै फेरि महाकर्त्ता औ महात्यागी औ महाभोगी होइ औ शुद्धभावसों
रमापति (ईश्वर) में रमैं कहे प्राप्त होइ औ ताको सब कोउ पूजन करिहैं
॥ ३४ ॥ महाकर्त्तादिकनकें तीनहूके लक्षण क्रमसों कहत हैं जाके राग कहे
प्रीति बिना जीव रक्षणादि कछू धर्म अकस्मात् ह्वै जाइ ताको हर्ष कहे सुख न
होइ औ द्वेष कहे विरोध बिना जीवहिंसादि अधर्म होइ ताको शोक दुःख ना
होइ सो प्राणी महाकर्त्ता हैं ॥ ३५ ॥