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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 269 में से

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पृष्ठ 256

( २५० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अरुसंतोषविचार ॥१०॥ यहजगचक्राब्यूहकिय, कज्जलक-
लितअगाधु ॥ तामैंपैठिजोनीकसै, अकलंकितसोसाधु॥११॥
टी०-ज्योति ( ब्रह्मज्योति ) ॥ ७॥ ८ ॥ तिन चतुरानन जगत्के जीवन-
को संसारमें दुखार देखिकै अपने चित्तमें तिन जीवनके उद्धारको प्रयोग कहे
यत्न बिचारचौ सो सब हमको सुनायो है सो तुमको सुनाईयतहै ॥ ९ ॥ १०॥
यामें साधुको लक्षण कहत हैं जैसे कज्जल कलित चक्रव्यूहमें शपथार्थ पैठिकै
अकलंकित कहे कज्जल चिह्न रहित निकसे सो साधु कहे दोषरहित होत है तैसे
कज्जल सम दोषयुक्त जो संसार है तामें पैठि अकलंकित कहे अदोष निकसै सो
प्राणी साधु है ॥ ११ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देखतहूंएककालछियेहूं । बातकहैसुनै
भोगकियेहूं ॥ सोवतजागतनेकनक्षोभै । सोसमतासबहीमहँ
शोभै ॥ १२ ॥ जोअभिलाषनकाहुकोआवै । आयेगयेसुख
दुःख नपावै । लैपरमानँदसौंमनलावै । सोसबमांझसंतोषक-
हाव ॥ १३ ॥ आयोकहाँअबहौंकहिकोहौं । ज्योंअपनोपद्-
पाऊं सोठोहौं ॥ बंधुअबंधुहियेमहँजानैं । ताकहँलोगबिचार-
बखानैं ॥ १४ ॥
टी०-यामें समताको लक्षण कहत हैं संसारको जो' स्रक् चंदन वनितादि
विषयभोग है ताको देखत हूं औ छुयेहूं औ ताहीकी बात कहै औ सुनै औ भो-
गहू करै परंतु सोवत वा जागते नेकहू तामें क्षोभै नहीं अर्थ लीन न होय औ
सबहीमें कहे अग्नि जलादिमें समता शोभै सोई समता है ॥ १२ ॥ यामें संतोष-
को लक्षण कहतहैं जो काहू वस्तुको अभिलाष जीमें न आवै औ काहू वस्तुके
आयेसों प्राप्त भयेसों सुख न पावै औ गयेसों दुःख न पावै औ मनको लैके परमा-
नंद जो ब्रह्महै तामें लगावै सोई सबमांझ कहे चारोंके मध्यमें संतोष कहावत है॥
॥ १३ ॥ यामें विचारको लक्षण कहत हैं मैं कौन हौं औ कहां आयो हौं अब
जा उपायसों अपने पद-( स्थान ) को पाऊँ सोउ ठोहौं कहे ढूंढौं या प्रकारसों
विचार करै औ बंधु कहे हित शम दमादि अबंधु कहे अहित काम क्रोधादिको
हियेमें जानै सोई बिचार है ॥ १४ ॥