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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 261

पंचविंशप्रकाशः २५. ( २५५ )
मू०-दोहा ॥ भोजअभोजनरतविरत, नीरससरससमान ॥
भोगहोइअभिलाषबिन, महाभोगतामान ॥ ३६ ॥ जोकछु
आंखिनदेखिये, बाणीबर्य्यौजाहि ॥ महात्यागीजानिये,
झूठोजानौताहि ॥ ३७ ॥ तोमरछंद ॥ जियज्ञानबहुव्यौहार ।
अरुयोगभोगबिचार ॥ यहिभांतिहोइजोराम । मिलिहैंसोते-
रेधाम ॥ ३८ ॥ सवैया ॥ निशिबासरवस्तुबिचारकरैमुखसां-
चहियेकरुणाघनुहै । अघनिग्रहसंग्रहधर्मकथानपरिग्रहसाधु-
नकोगनुहै । कहिकेशवयोगजगेहियभीतरबाहेरभोगनसोंतनु-
है । मनुहाथसदाजिनकेतिनकोबनहीघरहैघरहीबनुहै ॥ ३९॥
टी०-भोज कहे भक्ष्य औ अभोज ( अभक्ष्य ) पदार्थमें रत ( अनुरक्त ) औ
विरत ( विरक्त ) न होइ अर्थ भोज्य अभोज्यको समान भक्षण करै औ निरस
कहे स्वादरहित सरस ( स्वादयुक्त ) वस्तु जाको समान होईं औ भोग जाको
अभिलाष बिना होइ सो महाभोक्ता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ जाके जियमें ज्ञानको
बहुत प्रकारको व्यौहार है औ योग औ भोगको बहु विचार है ऐसो जब होइ
तब तुम्हारो जो धाम ( तेज ) है ज्योतिरूप ताको मिलिहै अथवा धाम कहे
घर वैकुंठ ताको मिलि है ( प्राप्त ) ह्वै है ॥ ३८ ॥ वस्तुविचार कहे ब्रह्मविचार
अथवा सत् असद्वस्तुको विचार निग्रह ( ताडन ), परिग्रह कहे परिजन ( निक-
टवासी ) इति ॥ “परिग्रहः परिजने इति मेदिनी” ॥ ३९ ॥
मू०-॥ दोहा ॥ लेइजोकहियेसाधुअन, लीन्हेकहियेबाम ॥
सबकोसाधनएकजग, रामतिहारोनाम ॥ ४० ॥ राम ॥ मोहिं
नहुतोजनाइबे, सबहीजान्यौआजु ॥ अवजोकहौसोकरिबनै,
कहेतुम्हारेकाज ॥ ४१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्र-
जिद्विरचितायांजीवोद्धारवर्णनं नाम पंचविंशः प्रकाशः ॥ २५ ॥