रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४५ )
इहां तरी पदने मनुष्यदेह जानो अर्थ मनुष्य देहको प्राप्त ह्वै के तो जीव तृष्णाको
पार पावतही नहीं है मनुष्यदेहमें तृष्णा कैसेहू नहीं मिटति इत्यर्थः ॥ बिलोकि
विलोकि कहे ढूंढि ढूंढि जहाजको बोरति है यहां जहाज पदने देवशरीर जानो
अर्थ देवताहू तृष्णाको पार नहीं पावत अथवा लोकनदी पदते लोकव्यवहार युक्त
मनुष्य देह जानो औ जहाज पदते संसारको त्यागकिये जे योगीजन हैं तिनके
शरीर जानो अर्थ योगीजन तृष्णाको पार नहीं पावने संसारविशिष्ट प्राणिनकी
कहा गिनती है औ लाजरूपी जो विशाल लता है सो लपटी हैं तनमें जिनके
ऐसे धैर्य्य औ सत्यरूपी तमाल वृक्ष हैं तिन्हें अति वेगसों तीरै कहे उखारि
डारति है नदीहू कूलके वृक्ष उखारि डारति है इहां तमालपद उपलक्षण है
तासों वृक्षमात्र जानो अर्थ तृष्णासों लाज औ सत्य प्राणीको दूर ह्वै जात है औ
वंचकता कहे छल औ अपमान औ अयान ( अज्ञानता ) औ अलम्भ कहे या-
चितवस्तुकी अप्राप्तिरूपी जे भुजंग ( सर्प ) हैं तिन करिकै अति भयानक है
नदीहूमैं सर्प रहतहैं अर्थ वंचकतादि जे चारों हैं तिनसों युक्त सदा तृष्णा रहति
है औ कृष्णा कहे श्यामरूपाहै औ जाको पाटु बडो है अन्त नहीं पाइयत औ
दुहूँ कूलमें कहूं घाट नहीं है जहां विश्रामहू पावै ॥ २२ ॥
मू०-पैरतपापपयोनिधिमैंमनमूढ़मनोजजहाजचढ़ोई। पेल-
तऊनतजैजड़जीवजऊबड़वानलक्रोधदढ़ोई ॥ झूठतरंगिनिमैं
उरझैसुइतेपरलोभप्रबाहबढ़ोई ॥ बूड़तहैतेहितेउबरैकहिकेशव
काहेनपाठपढोई ॥ २३ ॥
टी०-यामें जीवप्रति काहूकी शिक्षा है सो प्रसंग पाइ रामचन्द्र कहत हैं हे
मन ! मूढ ! जड ! जीव ! तू मनोज-( कन्दर्प ) रूपी जो जहाज है तामें चढ्यो
पापरूपी पयोनिधि समुद्रमें पैरत है अर्थ कामवश परस्त्री गमनादि पाप करत
फिरत है तहां अनेक अपमानादिते उत्पन्न जो क्रोधरूपी वडवानल है तामें जऊ
कहे यद्यपि दढोई कहे जरिहू गयो है तऊ कहे ताहूपर मनोज जहाजमें चढि
कामसमुद्रमें परिवो यह जो खेल है ताको तू नहीं तजतो एतेहूपर लोभ रूप
प्रवाह बढ्यो है जामें ऐसी जो झूठरूपी तरंगिणी नदी पापसमुद्रमें मिली है तामें
उरझत है अडिजात है अर्थ लोभवश अनेक झुठाई करत फिरत सो या प्रकार है या