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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 269 में से

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पृष्ठ 258

(२५२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अज्ञान रहे अर्थ बावरं सन रहे औ अंतमें सयानो रहे ताहीको जीवन्मुक्त
कहियत है॥ १८॥ युक्त कहे योग्य मनुष्यादि अयुक्त कहे अयोग्य सूकरादि
तिनको आपुनसो कहे आपने सम अवलोकिये (देखिये) अर्थ अपने सम
सबको जानिये औ अहंभाव मिटि जाय तौ कौन बद्ध है कौन मुक्त है अर्थ
सबही मुक्त हैं ॥१९॥ योग्यके गुण अयोग्यके दोष जानिकै त्याग करै ॥२०॥
रामचन्द्र कहत हैं कि ज्ञानसों जीवनकी मुक्ति कह्यो सो जान्यो अब यह कहौ
कि जे प्राणी साधु कहावत हैं औ जगमें स्त्री पुत्रादिके सब व्यौहार करत हैं
तिनको मीचु नहीं छुई सकति अर्थ तिनकी मृत्यु नहीं होति है ताको विचार
हे प्रभु ! हे वशिष्ठ ! कहौ ॥ २१ ॥
मू०-वशिष्ठ-पद्धटिकाछन्द ॥ जगजिनकोमनतवचरणली-
न । तनतिनकोमृत्युनकरतिक्षीन ॥ तेहिक्षणहींक्षणदुखक्षीण
होत । जियकरतअमितआनँदउदोत ॥ २२ ॥ जोचाहैजीवन
अतिअनंत । सोसाधैप्रणायामयंत्र ॥ शुभरेचकपूरकनामजा-
नि । अरुकुम्भकादिसुखदानिमानि ॥ २३ ॥ जोक्रमक्रमसाधै
साधुधीर । सोतुमहिंमिलै याहीशरीर ॥ राम ॥ जगतुमते नाहिं
सर्वज्ञआन । अबकहौदेवपूजाविधान ॥ २४ ॥
टी०-हे राम ! जिन प्राणिनको मन तुम्होर चरणमें लीन है ते साधु जगमें
सब व्यवहारहू करत हैं ताहूपर तिनके तनको मृत्यु क्षीण नहीं करि सकति औ
तिहि प्राणीके क्षणमें संसाररूपी दुःख क्षीण होत हैं औ मुक्तिरूपी जो अमित
आनन्द है सो उदोत ( प्रकाश ) करत है ॥ २२ ॥ अंगुष्ठ ते तृतीय अंगुलीको
नाम अनामिका है तासों नासाको बाम रंध्र अंगुष्ठसों रोंकि बाम रंध्रसों वायुको
छोडिये सो पूरक प्राणायाम है; औ दक्षिण रंध्र अंगुष्ठसों औ बामरंध्र
अंगुष्ठसों औ बामरंध्र अनामिकासों साथही रोंकि वायुको हृदयमें स्थापन करिये
सो कुम्भक है औ यथा वायुपुराणे।“प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचकः पूरकस्तथा ॥
कुम्भको रेचकस्तत्र नासारंध्राच्च दक्षिणात् ॥ निरुध्य वामरंध्रञ्चानामिकया
विसर्जनम् ॥ निरुध्य दक्षिणं रंध्रं वामरंध्राच्च पूरणम् ॥ तथैवानामिकांगुल्या
पूर्ण तु तदुच्यते ॥ रेचकात्पूरणात्पश्चाद्द्वैपुटन्नाशयस्तथा । सन्निरुध्य हृदि-
स्थाप्य वायुं तिष्ठत्स कुम्भकः" ॥ २३ ॥ २४ ॥