रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमू०-वशिष्ट-तारकछंद ॥ हमएकसयमनिकसेतपसाको ।
तवजाइभजेहिमवंतरसाको ॥ बहुभांतिकरचोतपक्योंकहि
आवै । शितकण्ठप्रसन्नभयेजगगावै ॥ २५ ॥ दंडक ॥ ऊजरे
उदारउरबासुकीबिराजमान हारकेसमानआनउपमानटोहिये।
शोभिजैजटानबीचगंगाजूकेजलबुंदकुंदकीसीकलीकेशोदासम-
नमोहिये।नखकीसीरेखाचंद्रचन्दनसीचारुरजअंजन शृंगारहू-
गरलरुचिरोहिये। सबसुखसिद्धि शिवासौंहैशिवजूकेसाथजाव-
कसोपावकलिलारलाग्योसोहिये ॥ २६ ॥
टी०-रसा (पृथ्वी) जग गावै अर्थ जिनको जगत्के प्राणी गान करत
हैं ॥ २५ ॥ उजरे औ उदार कहे बडे उरमें हार मालाके समान वासुकी नाम
सर्प विराजमानहै और उपमाको नहीं टोहिये कहे ढूंढियत अर्थ और उपमाके
सदृश नहीं हैं तासों खोज नहीं करियत रज कहे विभूति अंजन जां शृंगार है
ताकी रुचि गरल जो विष है ता करिके रोहिये कहे धारण करियत है अर्थ लगि-
गयो पार्वतीके नेत्रांजन सम गरल शोभित है सब सुखकी सिद्धि शिवा जो
पार्वतीजी हैं ते संगमें शोभती हैं औ जावक कहे महाउर सम लिलारमें लाग्यो
पावक (अग्नि) शोभित है ऐसे सदा सुरत चिह्नयुक्त प्रसन्न है हमारे समीप
आये इतिशेषः ॥ २६ ॥
मू०-महादेव-तारकछन्द ॥ बरमाँगिकछूऋषिराजसयाने ।
बहुभांतिचलेतपपंथपयाने ॥ वशिष्ट ॥ पुजवोपरमेश्वरमोमन
इच्छा । सिखवोप्रभुदेवप्रपूजनशिक्षा ॥ २७ ॥ शिव-दोहा ॥
रामरमापतिदेवनहिं, रंगनरूपनभेव ॥ देवकहतऋषिकौनको,
सिखऊंजाकीसेव ॥ २८ ॥ वशिष्ट-तोमरछंद ॥ हमकहाजान-
हिंअज्ञ । तुमसर्वदासर्वज्ञ ॥ अबदेवदेहुंबताइ । पूजाकहोस-
मुझाइ ॥ २९ ॥ शिव ॥ सतचित्तप्रकाशप्रभेव । तेहिबेद-
मान तदेव ॥ तेहिपूजिऋषिरुचिमंडि । सबप्राकृतनकोछांडि