रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४१ )
औ जो जीवके संगही संगमें बालकहीसे खेली है सो गति गमन जीवकी,
सहाय छांडि जराके भयसों थकि रहाति है औ देहकी जो दशा कहे शुभदशा
है सुंदरतादि सो सब भागति है जियके साथमें दुरिकै केवल दुराशा कहे दुष्ट
आशा रहिजाति है वृद्धतामें इनकी सबको सुभावहीसों यह होति है तामें जराके
भयको तर्क है तासों असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा है यह वस्तु हमको इते दिनमें मिलि
है ऐसी जो बुद्धि है सो दुराशा कहावति है ॥ १२ ॥
मू०-बिलोकिशिरोरुहश्वेतसमेततनोरुहकेसबकोगुणगायो।
उठेकधौँआयुकेऔधिकेअंकुरशूलकीशुष्कसमूलनशायो ॥
जरैं किधौँकेशवव्याधिनकीकिधौंआधिकेआखरअंतनपायो ।
जराशरपंजरजीवजरेउकिजराजरकंबरसोंपहिरायो ॥ १३ ॥
मनोहरबिजयाछंद ॥ दिनहींदिनबाढतजाइहियेजरिजाइस-
मूलसोऔषधिखैहै । किधौँयाहिकेसाथअनाथज्यों केशव
आवतजातसदादुखसैहै ॥ जगजाकीतूज्योतिजगैजडजीवन-
पायेतुतापहँजाननपैहै । सुनिबालदशागईज्वानीगईजरि-
जैहैजराउदुराशानजैहै ॥ १४ ॥
टी०-यामें प्रसंगवश वृद्धताको वर्णन है तनोरुह कहे तनके रोम तिन सहित
शिरोरुह ( शिरके बारनको ) श्वेत विलोकिकै या प्रकारसों गुण गायो है कि
आयुर्बलकी अवधि ( मर्यादा ) जो आईहै ताके अंकुर उठे हैं औ कि शूलनामा
आयुध विशेष है शूलहू लगे शुष्क समूल कहे पूर्ण नाशको प्राप्त होत है वृद्धता-
हूमैं तासों जानो औ कि अनेक जे व्याधी शरीरव्यथा हैं तिनकी तिनकी
अनेक जरैं हैं औ कि अनेक आधी जे मानसी व्यथा लिखी हैं तिनके आखर
( अक्षर ) हैं जिनको अंत नहीं पाइयत अर्थ बात हैं वृद्धतामें अनेक आधि,
व्याधि होती हैं इतिभावार्थः औ कि जरा जो बुढाई है ताने शर ( बाण ) तिनके
पंजरमें जीवको जरयो कहे डारचो है औ कि जराजर कहे जरवाफी कंबर सो
जीवको पहिरायो है ॥ १३ ॥ यामें जीवप्रति काहूको उपदेश है सो उपदेश कहि
रामचन्द्र दुराशाकृत पोडा देखावत हैं जाकी कहे जा ब्रह्मकी ॥ १४ ॥
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