रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४७ )
औभिक्षुकभूतकहैअमिजासहजैसो । हौंणूकहौंअपनोघरतैस्य-
हिताघरसों अपनोधर कैसो ॥ २७ ॥
टी०-हे मुनिनागर ! या संसारमें दोषमयी कहे दूषण (अपवाद) इति तत्
स्वरूप जो दवारि डाढा है अथवा दोषमयी कहे दूषणाधिक्यरूपी जो दवारि है
सो अति लगी है अति कहि या जनायो कि सब संसारभरमें लगी है ऐसो
स्थान या संसारमें कोऊ नहीं है कि जहां प्राणीको दोष न लगै अथवा जहां
कोहूको दोष न लगावै अर्थ या संसारमें वृथा सब सबको दोष लगावत है
अथवा दोष कहे परस्पर विरोधमयी जो दवारि लगी है ताको देखतही तासों
हमारी मति जरि गई है दवारिके छुयेसों जरियत हैं याके देखतही जरी कहे
अति तेज जनायो ता मतिमें या संसारमें राज्यादि भोगकी आश कहे इच्छा न
गूढ कहे अंतरमें है न उजागर कहे प्रसिद्ध है जैसे सागर-(समुद्र) में रज धूरि
गूढ उजागर नहीं है जा स्थानमें जो जीव दवारिमें जरत है ता स्थानमें ताके
भोगकी इच्छा नहीं होति यह रीतिही है ॥ २६ ॥ जैसे ये सब अपनी अपनो
घर कहत हैं तैसे ता घरसो कहे ताही घरको होहूं अपनो कहौं सो घर अपनो
कैसो कहे कौनविधि है या संसारमें कछु काहूको नहीं है वृथा ममत्व है इति
भावार्थः ॥ २७ ॥
मू०-सुन्दरीछन्द ॥ जैसहिहौंअबतैसहिहौजग । आपद-
सम्पदकेनचलौँमग ॥ एकहिदेहतियागबिनासुनि । हौँनकछू
अभिलाषकहौँमुनि ॥ २८ ॥ जोकछुजीवउधारणकोमत ।
जानतहौ तौ कहौ तनुहैरत ॥ यों कहिमौनगहीजगनायक ।
केशवदासमनोबचकायक ॥ २९ ॥ चामरछन्द ॥ साधुसा-
धुकैसभाअशेषहर्षहर्षियो । दीहदेवलोकतेप्रसूनवृष्टिवर्षियो ॥
देखिदेखिराजलोकमोहियोमहाप्रभा । आइयोतहाँतुरन्तदेव-
कीसबैसभा ॥ ३० ॥
टी०-राज्यादि जे आपद् विपत्ति औ संपद् संपत्तिके मग यह हैं तिनमें हौं न
चलिहौं हे मुनि ! एक देह त्याग बिना और कछू अभिलाष नहीं करतो अर्थ