रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचविंशप्रकाशः २५. (२५१)
मू०-चारिमैंएकहुजोअपनावै । तौतुमपैप्रभुआवनपावै ॥
राम ॥ ज्योतिनिरीहनिरंजनमानी। तामहैंक्योंऋषिइच्छबखा-
नी ॥ १५ ॥ वशिष्ठ-दोहा ॥ सकलशक्तिअनुमानिये, अद्भुत
ज्योतिप्रकाश ॥ जातेजगकोहोतहै, उत्पतिस्थितिअरुनाश॥
॥ १६ ॥ श्रीराम-दोधकछंद ॥ जीवबँधेसबआपनिमाया ॥
कीन्हेंकुकर्ममनोवचकाया ॥ जीवनचित्तप्रबोधनआनो ।
जीवनमुक्तकेभेदबखानो ॥ १७ ॥
टी०-जैसे चोपदारको अपनाइकै राजाके पास सब जात हैं तैसे इन चारिमैं
एकहूको अपनावै तौ तुमपै जान पावै फेरि राम ऋषिसों पूंछचों कि ज्योतिको
तौ निरीह कहे इच्छा रहित और निरंजन कहे रागरहित मान्यौ औ कह्यो कि
“ताकी इच्छाते भये, नारायण मतिनिष्ठ” तौ ज्योतिमें इच्छा क्यों कही सो
कहौ ॥ १५ ॥ वशिष्ठ कह्यो कि अद्भुत जो ज्योतिको प्रकाश है तामें इच्छादि
कहैं तौ नहीं परंतु इच्छादिकनकी सबकी शक्ति अनुमानियतहै जा शक्तिसों
संसारकी उत्पत्ति स्थिति नाश होत है ॥ १६ ॥ जीव जे हैं ते अपनीमायामें
बँधे मनसा वाचा कर्मणा कुकर्म (कुत्सितकर्म) कीन्हे हैं तिन जीवनको जो
प्रबोधन कहे ज्ञान तुम कह्यो सो हम चित्तमें आन्यो अर्थ भ्यास जान्यो इति अब
जीवनमुक्तके भेद कहौ ॥ १७ ॥
मू०-वशिष्ठ ॥ बाहेरहूंअतिशुद्धहियेहू । जाहिनलागतकर्म
कियेहू ॥ बाहेरमूढसोअंतसयानो। ताकहँजीवनमुक्तबखानो॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ आपुनसोअवलोकिये, सबहीयुक्तायुक्त ॥
अहंभावमिटिजाहिजो,कौंनबद्धकोमुक्त ॥ १९ ॥ श्रीराम-दो-
धक ॥ सोसिगरेगुणहोतसोजानो । स्थावरजीवनमुक्तबखा-
नो ॥ वशिष्ठ ॥ जानिसबैगुणदोषनछँडै । जीवनमुक्तनकेपद-
मंडै ॥२०॥ राम-दोहा ॥ साधुकहावतकरतहैं, जगमेंसबव्यौ-
हार ॥ तिनकोमीचुनछैंसकै, कहिप्रभुकौनविचार ॥ २१ ॥
टी०-यामें जीवन्मुक्तको लक्षण कहते हैं बाहर कहे तनमें औ हियहूमैं
कहे मनहूमैं शुद्ध होय औ पाप पुण्य कर्म करै सो लागै नहीं औ बाहर मूढ़