रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनराजनकौनगने । ठौरहिठौररहेजनुफूलिसरोजघने ॥ भूपन-
केप्रतिबिम्बबिलोकतरूपरसे। खेलतहैजलमांझमनोजलदेव-
बसे ॥ १६ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ मृगमदमिलिकुंकुमसुरभिनीर।
घनसारसहितअम्बरउसीर । घसिकेशारिसोंबहुबिबिधिनौर ।
क्षितिछिरकेचरथावरशरीर ॥ १७ ॥ बहुवर्णफूलफलदलउ-
दार । तहँभरिराखेभाजनअपार ॥ तहँपुष्पवृक्षशोभैंअनेक ।
मणिवृक्षस्वर्णकेवृक्षएक ॥ १८ ॥ त्यांहिंउपररच्योएकैबितान।
दिविदेखतदेवनकेबिमान । दुहुँलोकहोतपूजाबिधान।अरुनृ-
त्यगीतवादित्रगान ॥ १९ ॥
टी०-धरणिधर ( शेष ) ॥ ११ ॥ हरि जे रामचन्द्र हैं तिनके अभिषेको-
त्सवके आनंदमें भीने इत्यर्थः ॥ १२ ॥ रस ( घृतादि ) ॥ १३ ॥ भांतिन
भांति तीनि छंदमें एक वाक्यता है सरसी तडाग ता आंगनमें प्रतिबिंबत जे
सबके लोचन हैं तेई मनोजके ( कामके ) मीन ( मत्स्य ) हैं अथवा मनोजबि-
लासी कहे कामके खेलिबेके मीन हैं ॥ १४ ॥ ताही तडागमें पात्र पुरइनि पत्र
समहैं ॥ १५ ॥ ताही तडागमें भाजन कहे पात्र सरोज सम फूलि रहे हैं प्रति-
बिंब जलदेव सम हैं॥ १६ ॥सुरभि ( सुगंधित अथवा सुंदर ) “सुरभिर्हेम्नि चंप-
के जातीफले मातृभेदे रम्ये चैत्र वसंतयोः॥ सुगंधौ गवि शलक्यामिति हेमचंद्रः॥”
अम्बर सुगन्ध वस्तुविशेष ॥“अंबरंनद्वयोर्व्योम्निसुगन्ध्यंतरवस्त्रयोरिति मेदिनी॥”
सरिसों ( बराबरिसों ) अर्थ मृगमदादि सब सम घसिकै ॥ १७ ॥ दलपत्र
( भाजन पात्र ) ॥ १८ ॥ एकै अपूर्व वादित्र ( बाजने ) ॥ १९ ॥
मू०-तरुऊमरिकोआसनअनूप । बहुरचितहेममयविश्वरू-
प ॥ तहँबैठेआपुनआइराम । सियसहितमनोरतिरुचिरकाम
॥ २०॥ जनुघनदामिनिआनन्ददेत । तरुकल्पकल्पबल्लीस-
मेत । ह्वैकैधौं विद्यासहितज्ञान । कैतपसंयुक्तमनसिद्धिजान ॥
॥२१॥ कैबिक्रमयुतकीरंतिप्रवीन । कैश्रीनारायणशोभलीन॥
कैअतिशोभितस्वाहासनाथ। कैसुन्दरता शृंगारसाथ ॥ २२ ॥