रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
( २३४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
मू०-यद्यपिहोइशुद्धमतिसत्तु । फिरैपिशाचीज्यौंउनमत्तु ॥
गुनवंतनिआलिंगतिनहीं । अपवित्रनिज्योंछांडतितहीं॥२९॥
शूरनिनाशतिज्योंअहिदेखि । कंटकज्योंबहुसाधुनलेखि ॥
सुधासोदरायद्यपिआप । सबहीतेअतिकटकप्रताप ॥ ३० ॥
यद्यपिपुरुषोत्तमकीनारि । तदपिसकलखलजनअनुहारि ॥
हित कारिनकीअतिद्वेषिनी । अहितलोगकोअन्वैषिनी
॥ ३१॥ मनमृगकोसुबधिककीगीति । विषयबेलिकीबारि-
दरीति ॥ मदपिशाचिकाकीसीअली । मोहनींदकीशय्या-
भली ॥ ३२ ॥
टी०-सत्तु ( प्राणी ) अथ राजासों राज्यश्री युक्त द्वै पिशाचाक्रांत पुरुष-
सम उन्मत्त फिरत हैं गुणवंतन कहे विद्यादि अनेक गुणको अपवित्र सम त्याग
करति है इत्यर्थः ॥ "पंडिते निर्द्धनत्वमित्युक्तं माधवानलनाटके” ॥ २९ ॥
नाशति कहे छोडति है शूर औ साधुनको राज्यश्री नहीं प्राप्त होति अथवा शूर
औ साधुनको संग्रह राजा नहीं करते इत्यर्थः सुधा जो अमृत है ताकी सोदरा
( बहिन ) ॥ ३० ॥ पुरुषोत्तम (विष्णु) द्वेषिणी कहे शत्रु है अन्वेषिणी कहे
ढूंढनहारी है ॥ ३१ ॥ बधिकसम मनरूपी मृगको बांधि लेति है कहे काबू करि
लेति है इत्यर्थः ॥ औ बारिद कहे मेघसम विषयरूपी बेलिको हरित करति है
इत्यर्थः मद्रूपी जो पिशाचिका (प्रेतिन) है ताकी अली कहे सखी है अर्थ
सहायक है पठावनहारी इति मोह कहे अज्ञानरूपी जो नींद है ताकी शय्या
जैसे शय्यामें नींद बढति है तैसे राज्यमें मोह बढ़त है इत्यर्थः ॥ ३२ ॥
मू०-आशीबिषदोषनकीदरी । गुणसतपुरुषनकारणछरी ॥
कलहंसनकीमेघावली । कपटनृत्यकारीकीथली ॥ ३३ ॥
दोहा ॥ बामकामकरिकीकिधौं, कोमलकदलिसुवेष । धीरधर्म-
द्विजराजको, मनोराहुकीरेष ॥ ३४ ॥ चौपाई ॥ मुखरोगी
ज्योंमौनेरहै । बात बलायएकद्वैकहै ॥ बंधुबर्गपहिचानैनहीं ।
मानोसन्निपातहैगही ॥ ३५ ॥
त्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २३५ )
टी०--दरी-( कंदरा ) में आशीविष ( सर्प ) सम अनेक प्रजा पीडनादि दोष
जामें वास करत हैं इत्यर्थः औ अनेक जे विद्यादिगुणरूपी सत्पुरुष हैं तिनके
कारण कहे अर्थ छरी कहे ताडन दंड है जैसे राजद्वारमें ताडन दंड देखि
सत्पुरुष नहीं आवत तैसे राज्यश्री युक्त पुरुषके पास विद्यादि गुण नहीं आवत
तासों सत्पुरुष लोभवश दंडपात हंसहि भूप द्वारादि स्थलमें जातहीहैं कुपुरुष
कह्यो राज्यसुखालस्यसों राजा गुणनको अभ्यास नहीं करत इति भावार्थः कल
कहे अविग्नतासों चित्तइति हंसनको मेघावलीसम राजनके कलको राज्यश्री दूरि
करति है इत्यर्थः अनेक शत्रु भयादि युक्त राजनको चित्र सदा रहत हैं इति
भावार्थः शत्रुसैन्यभेदादि अनेक कपटयुक्त राजा होत हैं इति भावार्थः
॥ ३३ ॥ बाम कहे कुटिल जो काम ( कंदर्प ) रूपी करि, ( हाथी ) है
ताको सुवेष कहे हरित कोमल कदली (केरा) है अर्थ गजनको कदली सम
कामको बलकर्ता है अथवा सुखद है राजा अति कामी होत हैं इति भावार्थः ।
कदली भक्षणसों गजनको बल औ सुख होतहै यह प्रसिद्ध है औ धीर औ
धर्मरूपी द्विजराज ( चंद्रमा ) को राहुरेखसम पीडाकर्ती है इत्यर्थः राजा बंधु-
मंत्रीआदिमें भेद भय मानि सदा अधीर रहते हैं औ आलस्यवश दानादि धर्म
विधिपूर्वक नहीं करत इति भावार्थः ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
मू०महामंत्रहूहोतनबोध । डसीकालअहिकरिजनुक्रोध ॥
पानबिलासउदितआतुरी । परदारागमनैचातुरी ॥ ३६ ॥ मृ-
गया यहै शूरताबढी । बंदीमुखनिचापसोंपढी ॥ जोकेहूंचित-
वैयहदया । बातकहैतौबड़ीएमया ॥ ३७॥ दर्शनदीबोईअ-
तिदान । हँसि बोलैतौबड़सनमान ॥ जोकेहूसोंअपनोकहै ।
सपनेकीसीपदवी लहै ॥ ३८॥ दोहा ॥ जोईअतिहितकीकहै,
सोईपरमअमित्र । सुखबक्ताईजानिये, संततमंत्रीमित्र ॥३९॥
टी०-मंत्रिन करि दीन्हे जे महा कहे बडेबडे मंत्र हैं तिनहुसों जाको बोध
ज्ञान नहीं होत सो मानों काल अहि कहे कालसर्प करिकै डसी कहे काटी गई है
अर्थ मानों क्रोध करि कालसर्प काट्यो है जा प्राणीको कालसर्प काटत है
ताहूको झारिवेके जे महामंत्र हैं तिनसों बोध ( ज्ञान ) नहीं होत अर्थ मूर्च्छा नहीं
जागति पान कहे मद्यपानको जो विलास है ताहीमें उदित कहे प्रगट है आतुरी
( २३६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शीघ्रता जाकी ॥ ३६ ॥ मृगया यहै शूरता बडी इत्यादिमों या जनायो कि
योंही विधि राजा थोरो करत हैं ताको बहुत मानि लेत हैं ॥ ३७ ॥ पदवी
( राज्य ) ॥ ३८ ॥ ३९ ॥
मू०--चौपाई ॥ कहौंकहालगिताकेसाज । तुमसबजानतहौ-
ऋषिराज ॥ जैसीशिवमूरतिमानिये । तैसीराजश्रीजानिये
॥४०॥ सावधानहैसैबैजाहि ॥ सांचीदेतपरमपदताहि । जित-
नेतृपयाकेबशभये । पेलिस्वर्गमगनर्कहिगये ॥ ४१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिंद्रजिद्विरचितायांराज्यश्रीदूषणव-
र्णनंनामत्रयोविंशःप्रकाशः ॥ २३ ॥
टी०-॥ ४० ॥ शिवमूरतिहूको सावधान है विधिपूर्वक सेवनो बनि परै तो
स्वर्गप्राप्ति होत है ना बनै तौ चित्तविक्षेपादि है अंतमें नरकप्राप्ति होतहै तैसे
याहूको सावधान है जनकादि सम सेवन करै तौ स्वर्ग जाई परंतु सावधान है
सेवन नहीं बनि परत तासों केतने भूप बेनु आदिक स्वर्गमर्गसों पेलिकै नरकको
गये हैं तासों हम राज्यश्री ग्रहण ना करि हैं इति भावार्थः ॥ ४१ ॥
इतिश्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद-
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायां त्रयोविंशः प्रकाशः ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ चौबीसयेंप्रकाशमें, रामबिरक्तिबखानि ॥ बि-
श्वामित्रबशिष्ठसों, बोधकहीशुभआनि ॥ १॥ राम-अमृतगति-
छंद ॥ सुमतिमहाऋषिसुनिये।जगमहँसुखवनगुनिये॥मरणहिं
जीवनतजहीं । मरिमरिजन्मनभजहीं ॥ २ ॥ उदरनिजीवपरत
है । बहुदुखसोंनिसरतहै ॥ अंतहुपीरअनतहीं। तनउपचारसह-
तहीं ॥ ३॥ दोधकछंद ॥ पोचभलीनकछूजियजानै। लेसबब-
स्तुनआननआनै॥शैशवतेकछुहोतबडेई।खेलतहैंतैअयानचढ़े
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २३७ )
ई॥ ४॥ हैपितुमातनितेदुखभारे । श्रीगुरुतेअतिहोतदुखारे ॥
भूखन्प्यास ननींदनजोवें । खेलनकोबहुभांतिनरोवें ॥ ५ ॥
टी०-वशिष्ठसों बोध जो ज्ञान है ताके कहिबेको विश्वामित्र कही कहे कह्यो
हैं ॥ १ ॥ राजश्रीको दुख कहि अब यामें संसारको दुख देखावत हैं जीव जे
हैं ते मरणको नहीं तजत मरिकै फिरि जन्मको भजहीं कहे प्राप्त होत हैं ॥२॥
यामें जनन, मरण, जीवनको दुख देखावत हैं प्रथम तौ जीव उदरमें परत हैं
गर्भमें आवत हैं तहांसे बहुत दुखसों निसरत हैं अर्थ जन्ममें बडो दुख होत हैं
औ अंत जो मरण है ताहूमें बडी पीर कहे कष्ट होत है औ अनतही कहे जनन
मरणते अन्यत्र अर्थ जीवतनमें तनके अनेक जे उपचार कहे व्योहार हैं तिनके
सहित जीवको पीर है सो आगे कहैं ॥ “उपचारस्तु सेवायां व्यवहारोपचारयोरि-
त्यभिधानचिंतामणिः”॥ ३ ॥ द्वैछंदनमां शिशुता अवस्थाके देहव्यवहारमें प्राप्ति
जीवको दुख कहत हैं ते कहे तेई जीव शैशव कहे बाल्य अवस्थामें पोच कहे
बुरो विषादि औ भली द्राक्षादि कछू जियमें नहीं जानत जो वस्तु पावत हैं
ताको लैके आनन कहे मुखमें आनै कहे डारि लेत हैं तहां विषादि ग्रहणमें
जीवको पीडा होति है इति भावार्थः फेरि ते कहे तेई जीव कछू बडे होत कहे
बडे होते अयान कहे अज्ञानमें चढे चढे गैलनमें खेलत फिरतहैं अज्ञानमें चढे कहि
या जनायो कि जैसे वाहनमें चढिकै कोऊ धावै तौ थकत नहीं तैसे अज्ञानरूपी
बाहनमें चढि खेलमें धावत जीव थकत नहीं है ॥ ४॥ ता खेलिबेके लिये माता
पिता मने करत हैं तासों बडो दुख होतहै औ गुरु खेलिबो छडाई पढाइबो
चाहत है तासों अति दुखी होतहैं औ भूख औ प्यास औ नींदको नहीं जोवत
कहे देखत अर्थ अपने पास आई भूख प्यास नींदको नहीं गनत अथवा भूख
प्यास नींदको नहीं जोवत कहे चाहत तैसे सब अवस्थाके ऐसे देहव्यवहारनमें
जीवको ऐसी पीडा होतिहै इति भावार्थः॥ “शिशुत्वं शैशवं बाल्यमित्यमरः”॥५॥
मू०-जारतिचित्तचितादुचिताई। दीहत्वचाअहिकोपचवाई।
कामसमुद्रझकोरनिझूल्यो । यौबनजोरमहाप्रभुभूल्यो ॥ ६ ॥
धूमसोनीलनिचोलमैं सोहै । जाइछुई न विलोकत मोहै ॥ पावक
पायशिखाबनचारी । जारतिहैनरकोपरनारी ॥ ७ ॥
टी०-तीनिछंदमें युवा अवस्थाके व्यवहारको दुःख कहतहैं यौवनके जोरमें अर्थ
युवा अवस्थामें चित्तरूपी जो चिताहै तामें जीवको कहे दुचिताई जो संशय है सो
( २३८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जारति है जैसे चितामें जीवको दुचिताई जारतिहै इत्यर्थः औ अहि कहे सर्पसम
जो कोप मरे प्राणीको जारियत है तैसे चित्तरूपी चितामें है सो दीह कहे बहुत
अर्थनकी विधि जीवके त्वचाचर्मकी चवाई कहे चबातहै अर्थ काटतहै अथवा
त्वचासम अहिकोप चबातहै अर्थ सर्पत्वचामें काटत है तब जीवको परम पीडा
होति है औ कोप तौ जीवहीको काटत है ताको पीडा तौ अकथनीय है औ जब
काम अथवा अभिलाषरूपी जो समुद्र है ताके तरंगके झकोरनमें झूलौ इत उत
आयो गयो तब हेमहाप्रभु ! जीव जो है सो भूल्यो अर्थ अपनपा को भुलान्यो
महाप्रभु ऋषिनको संबोधन है चिता ( दाह ) सर्प दंश समुद्र तरंगके झकोरनमें
सबको विकलतासों आपनपाकी सुधि भूलि जात है ॥ ६ ॥ यौवन जोरमें
और कहा होत है सो कहत हैं धूमसम जो नीलनिचोल कहे श्याम वस्त्र है तामें
सोहति है इहां केवल धूमकी समताके लिये नीलनिचोल कह्यौ अग्नि दाहभयसों
परनारी लोकभयसों छुई नहीं जाति देखतही मनको दुवौ मोहत हैं परनारी
मोहति कहे बश करति है अग्नि मोहिति कहे भयसों अथवा तेजसों मूर्छित
करतिहै सो पापरूपी यौवन है तामें चारि कहे गामी अर्थ जैसे अग्नि
वनमें बिहरति है तैसे पर नारी पापहीमें बिहरति है ऐसी परनारी रूपी
जो पावकशिखा है सो नरको जारति है परस्त्रीको देखि जीव विकल होत है
इत्यर्थः ॥ ७ ॥
मू०-बंकहियेनप्रभासरसीसी । कर्दमकामकछूपरसीसी ॥
कामिनिकामकीडोरिग्रसीसी । मीनमनुष्यनकोबनसीसी ॥८॥
टी०-मनुष्यनके जै हिय हैं तिनकी जो प्रभा ( शोभा ) है सोई बंक कहे
कुटिल अर्थ घाट रहित अथवा गहिर सरसी कहे तडागसी है अर्थ हृदय तडाग
सम है औ काम अभिलाषरूपी जो कर्दम ( कीच ) है तासों कछू कहे कछुअर्थ
थोरीहू परसी कहे युक्त है यासों या जनायो कि अधिक कामयुक्तकी कथा है
ता सरसी कामिनि कहे स्त्रीरूपी जो काम ( कंदर्प ) शिकारीकी डोरी है सो ग्रसी
है कहे लगी है ते स्त्री मीनरूपी जे मनुष्य हैं इहां मनुष्य पदते मनुष्यनके जीव
जानौं तिनको कहे तिनके बसकरिबेकी बनसीसी है जैसे तडागमें कीच बीच
बसे मीननको बंसी बश करति है तैसे हृदयरूपी तडागमें कामरूपी कीचमें बसे
जे जीव हैं तिनकी बंसी डोरीसम हृदयमों ग्रसी जो कामिनी स्त्री है सो बश
करति है इत्यर्थः अथवा बंक ( कुटिल ) जे हृदय कहे मन हैं तिनकरिकै प्रभा
चतुर्विंशप्रकाशः २४. (२३९)
(शोभा) सरसी कहे बढ़ी है जाके अर्थ जैसे बंसी कुटिल लोहकंटकसों युक्त
रहति है तैसे कुटिल हृदय करिकै युक्त स्त्री है औ काम कहे अभिलाष रूपी जो
कर्दम कर्दम कहे पिशानका गंधादि युक्त कीच है सान्यौ पिसान तासों कछू
परसी कहे युक्त है अर्थ जैसे कुटिल कंटक गंधादि युक्त साने पिसानसों युक्त
होत है तैसे स्त्रीनके मन अभिलाषसों युक्त हैं औ कामिनी जो स्त्री हैं सोई
काम (कंदर्प) शिकारीकी डोरीहै सो ग्रसी है कहे लगी है सो मीनसम मनुष्य-
नको बंसीसम है अर्थ जैसे सागरमें बंसीके पिसानको गंध पाइ मीन बंसीके
बश होतहै तैसे संसारसागरमें स्त्रीनके मनके अभिलाषको गंधपाइ अर्थ स्त्रीनकी
अभिलाष समुझि मनुष्य बश होत है ॥ ८॥
मू०-बिजयछंद ॥ खैंचतलोभदशौंदिशिकोमहिमोहमहाइ-
तपासिकैडारे । ऊंचेतेगर्वगिरावतक्रोध
( २४० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
निबेधवकौतो। वाइलगाइबिबेकनकोंबहुशोधककोकहिबाधक
जोतो। औरकोकेशवलूटतोजन्मअनेकनकेतपसानकोयोतो।
तौममलोकसबैजगजातो जो कामबड़ोबटपारनहोतो ॥ ११ ॥
टी०-यामें यौवनकृत दुःख कहत हैं वेद पुराणनको प्रथम तौ सुनत नहीं
औ सुनत है तौ समुझत नहीं औ समुझत है तौ त्रसत कहे डरत नहीं और वेद
वचनही को निंदाकरि हँसत है वानरसम विलसत कहि या जनायो कि पशुसम
बुद्धि है जाति है ॥ १० ॥ यामें काम व्यौहारकृत पीडा कहत है साधक
प्राणायामादि एतो कहे जहाज पचीसयें प्रकाशमें यकतालिसयें दोहामें रामचन्द्र
कह्यो है मोहि न हतो जानाईबे सबहीं जान्यों आज यासों या जानौं रामचन्द्र
ईश्वरत्वको छपाये रहे हैं औ यामें ममलोक सबै जग जातो या उक्तिसों
ईश्वरत्व प्रगट होत है तहां कविकों भ्रम जानव अथवा तौ ममलोक कहे ममता-
विशिष्ट जे लोक मर्त्य लोकादि हैं तिनसों सबै जग कहे सब जगतके जीव अपने
स्थानको ब्रह्मपदको इतिशेषः जातो प्राप्त होतो ॥ ११ ॥
मू०-मकरंदबिजयाछंद ॥ कँपैबरबानीडगैउरडीठितुचा-
तिकुचैसकुचैमतिबेली। नवैनवग्रीवथकैगतिकेशवबालकते-
सँगहीसँगखेली ॥ लियेसबआधिनव्याधिनसंगजराजबआ-
वैजराकीसहेली । भगैसबदेहदशाजियसाथरहैदुरिदौरिदुरा-
शाअकेली ॥ १२ ॥
टी०-यामें वृद्धताको व्यवहार कहत हैं पुत्रादिके कटुवचनादिसों जनित जो
आधि कहे मानसी व्यथा औ व्याधि शरीर व्यथा (ज्वरादि) तिनके संगमें
लिये ज्वरा जो मृत्यु है ताकी सहेली सखी जो जरा (वृद्धता) है सो जबदेहमें
आवति है तब ताके डरसों बाणी काँपै लागति है अर्थ मुखसों व्यक्त वचन नहीं
कढत औ डीठि डगै कहे डगमगाति है औ त्वचा कहे चर्म अति कुचै कहे बहुत
सिकुरि जाति है औ मति (बुद्धि) रूपी जो बेली (लता) है सो सकुचै कहे
संकोचको प्राप्त होति है अर्थ बुद्धि हीन होति जाति है औ नव कहे नवीन
प्रकारसों ग्रीवा नवै कहे नत होति है नवपद् यासों कह्यौ कि और जो कोऊ
काहूको नवत है अर्थ प्रणाम करत है सो नयोई नहीं रहत ग्रीवा जबसों नवति है
तबसों नईही रहति है उठति ही नहीं अथवा भयसों अनित्यको छोडि नत होति है
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४१ )
औ जो जीवके संगही संगमें बालकहीसे खेली है सो गति गमन जीवकी,
सहाय छांडि जराके भयसों थकि रहाति है औ देहकी जो दशा कहे शुभदशा
है सुंदरतादि सो सब भागति है जियके साथमें दुरिकै केवल दुराशा कहे दुष्ट
आशा रहिजाति है वृद्धतामें इनकी सबको सुभावहीसों यह होति है तामें जराके
भयको तर्क है तासों असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा है यह वस्तु हमको इते दिनमें मिलि
है ऐसी जो बुद्धि है सो दुराशा कहावति है ॥ १२ ॥
मू०-बिलोकिशिरोरुहश्वेतसमेततनोरुहकेसबकोगुणगायो।
उठेकधौँआयुकेऔधिकेअंकुरशूलकीशुष्कसमूलनशायो ॥
जरैं किधौँकेशवव्याधिनकीकिधौंआधिकेआखरअंतनपायो ।
जराशरपंजरजीवजरेउकिजराजरकंबरसोंपहिरायो ॥ १३ ॥
मनोहरबिजयाछंद ॥ दिनहींदिनबाढतजाइहियेजरिजाइस-
मूलसोऔषधिखैहै । किधौँयाहिकेसाथअनाथज्यों केशव
आवतजातसदादुखसैहै ॥ जगजाकीतूज्योतिजगैजडजीवन-
पायेतुतापहँजाननपैहै । सुनिबालदशागईज्वानीगईजरि-
जैहैजराउदुराशानजैहै ॥ १४ ॥
टी०-यामें प्रसंगवश वृद्धताको वर्णन है तनोरुह कहे तनके रोम तिन सहित
शिरोरुह ( शिरके बारनको ) श्वेत विलोकिकै या प्रकारसों गुण गायो है कि
आयुर्बलकी अवधि ( मर्यादा ) जो आईहै ताके अंकुर उठे हैं औ कि शूलनामा
आयुध विशेष है शूलहू लगे शुष्क समूल कहे पूर्ण नाशको प्राप्त होत है वृद्धता-
हूमैं तासों जानो औ कि अनेक जे व्याधी शरीरव्यथा हैं तिनकी तिनकी
अनेक जरैं हैं औ कि अनेक आधी जे मानसी व्यथा लिखी हैं तिनके आखर
( अक्षर ) हैं जिनको अंत नहीं पाइयत अर्थ बात हैं वृद्धतामें अनेक आधि,
व्याधि होती हैं इतिभावार्थः औ कि जरा जो बुढाई है ताने शर ( बाण ) तिनके
पंजरमें जीवको जरयो कहे डारचो है औ कि जराजर कहे जरवाफी कंबर सो
जीवको पहिरायो है ॥ १३ ॥ यामें जीवप्रति काहूको उपदेश है सो उपदेश कहि
रामचन्द्र दुराशाकृत पोडा देखावत हैं जाकी कहे जा ब्रह्मकी ॥ १४ ॥
१६
( २४२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ जहांभामिनीभोगतहँ, बिनभामिनिकहँभो-
ग ॥ भामिनिछूटेजगछुटै, जगछूटेसुखयोग ॥ १५ ॥ जोई
जोईजोकरै, अहंकारकेसाथ ॥ स्नानदानतपहोमजप, निष्फ-
लजानौनाथ ॥ १६ ॥ तोटकछंद ॥-जियमांझअहंपदजोद-
मिये । जिनहींजिनहींगुणश्रीरमिये ॥ तिनहींतिनहींलखिलो-
भडसै । पटतंतुनिउंदुरज्यौंतरसै ॥ १७ ॥
टी०-यामें स्त्री व्यवहार कृत पीड़ा कहत हैं तहां भामिनी ( स्त्री ) है तहांई
दुःखरूपी संसारभोग हैं सो भामिनी जब छूटै जब संसार छूटै तब सुखको
योग है अर्थ दुःखमय संसारको बंधन दुराशादि सम स्त्रीहू है ॥ १५ ॥
यामें अहंकारको व्यवहार कहत हैं अहंकारके साथ जो करिये सो निष्फल
होत है॥ १६ ॥ ताही अहंकारको जो काहू प्रकारसों दमिये (दूरिये) तो
जिन जिन मिथ्याभावनादि गुणसों श्री जो द्रव्य है तासों रमिये अर्थ
द्रव्यको प्राप्त हूजियत है तिन गुणनको देखिकै लोभ जो है सो जीवको डसत
है ( काटत है ) अर्थ काहूको अनुत्तमकर्मसों पावत देखि लोभ जीवको प्रे रत
है कि यहै कर्म करौ जामें द्रव्य लाभ होइ अहंकारहीन प्राणी योग्यायोग्यको
विचार नहीं करत जा प्रकार द्रव्य मिलै सोई ऊंच नीच कर्म करत है इति
भावार्थः लोभ कैसे डसत है जैसे पट (वस्त्र) के तंतु कहे सूत्रनको उंदुर कहे
मूषक तरसै कहे काटत है आशय कि जैसे मूषक पटतंतुनको वृथा काटत है
कछु ताको काम नहीं है तैसे लोभ वृथा जीवको सतावत है ॥ १७ ॥
मू०-बिजयछंद ॥ दानसयाननिकेकलपद्रुमटूटतज्यौँऋण
ईशकेमांगे । सूखतसागरसेसुखकेशवज्यौंदुखश्रीहरिकेअनुरा-
गे ॥ पुण्यबिलातपहारनसेपलज्यौँअघराघवकी निशिजागे ।
ज्यौंद्विजदोषतेसंततिनाशितित्योंगुणभाजतलोभकेआगे ॥ १८॥
टी०-सो लोभ कैसो है ताको ब्यवहार कहत हैं जैसे ईश ( महादेव ) हैं
तिनके मांगेते ऋण टूटि जात है अर्थ जब महादेव एते द्रव्य देते हैं जामें केतेऊ
बड़ो ऋण होइ सो दूरि होतहै तैसे ता लोभके आगे दान औ सयाननके डे
चतुरावशप्रकाशः २४. (२४३)
कल्पद्रुमहैं ते टूटि जातहैं अर्थ लोभसों दानको अभिलाष नशि जातहै औ उचिता-
नुचितकारिबेमें जो सयानप (चातुरी) है सो नहीं रहति औ जैसे श्रीहरि जे
विष्णुहैं तिनके अनुरागसों भक्ति कियेसों सो सागरसो संसारदुःख सूखत
है तैसे ता लोभके आगे जो जीवके सागरसे सुख सूखि जात हैं अर्थ
लोभवश इत उत प्राणी धायो धायो फिरत है धन, पुत्र, कलत्रादिको सुख नहीं
करन पावत औ जैसे राघवकी निशि कहे राघव संबंधी व्रत दिन रामनौमी
आदिकी निशिमें पलहू भरि जागते अघ (पाप) बिलात हैं तैसे लोभके आगे
पहारसे बड़े बड़े पुण्य बिलात हैं अर्थ लोभसों ऐसे ब्रह्मद्रव्यहरणादि पातक
प्राणी करत हैं जासों केतेऊ बड़े पुण्य होईं तौ नशि जात हैं यामें केशवको
रामोक्तिमें अपनी उक्तिको भ्रम है औ जैसे ब्रह्मदोषते संतति जो वंश है सो
नशि जात है तैसे लोभके आगे अनेकगुण भागत हैं अर्थ अनेकगुणको त्याग
( २४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
विड़ेंगे कहे भागि जात है तैसे अघ वाघनको देखि धर्मादि भागतहैं पापके संयोगते
जीवके हितसाधक जे दान दयादि हैं ते सब नशि जात हैं इतिभावार्थः ॥ १९ ॥
मू०-दोहा ॥ आंखिनआछतआंधरो, जीवकरैबहुभांति ॥
धीरनवीरजबिनकरै, तृष्णाकृष्णाराति ॥ २० ॥ तृष्णाकृष्णा
षट्पदी, हृदयकमलमेंबास ॥ मत्तदंतिगलगंडयुग, नर्क-
अनर्कविलास ॥ २१ ॥
टी०-तानि छंदनमों तृष्णाको व्यवहार कहत हैं तृष्णारूपी जो कृष्णाराति
कहे कृष्णपक्षकी राति है सो आंखिन अक्षत कहे रहने पर जीवको आँधरो
करति है अर्थ तृष्णायुक्त प्राणीको आंखिनसों आपनो अपमानादि नहीं देखि-
परत औ कृष्णा रातिहूमों अंधकारमें घटपटादि वस्तु आँखिनसों नहीं देखि परत
औ धीरनको धैर्य्य बिना कारदेति है अर्थ कहूं कछु पाइबो होइ तौ तृष्णायुक्त
प्राणी कैसोऊ धीर होइ तौ धीरता छोड़ि धावतहै औ रातिमें अंधकारमें चौरादि
भयसों बड़े धीरउ धैर्य्य बिन है जात हैं ॥ २०॥ कृष्णा कहे श्याम जो तृष्णा-
रूपी षट्पदी (भ्रमरी) है ताको हृदयरूपी कमलमें वासहै ता तृष्णाको नर्क
औ अनर्क कहे स्वर्गकी विलास दुवौ मत्तदंतीके गल कहे गलत अर्थ मदसों
चुवत दुवौ गंडस्थल हैं अर्थ जैसे भ्रमरी कमलमें वसति है औ गजनके गंड-
स्थलन प्रति धायो करतिहै तैसे तृष्णा नरक भोग स्वर्गभोग प्रति धायो करति
है सो उपाउ जीवको नहीं करन देति जासों जीव मुक्त होइ ॥ २१ ॥
मू०-विजयछंद ॥ कौनगनेयहि लोकतरीनबिलोकिबिलो-
किजहाजनबोरै । लाजविशाललता लपटीतनधीर जसत्यतमा
लनितोरै ॥ वंचकताअपमानअयानअलाभभुजंगभयानक-
कृष्णा ॥ पाटुबडो कहूंघाडुनकेशव क्योंतरिजाइतरंगि-
नितृष्णा ॥ २२ ॥
टी०-फेरि कैसी है तृष्णा सो कहत हैं कि ऐसी तृष्णारूपी जो तरंगिणी
नदी है सो कौनी तरहसे जीवसों तरि कहे उतरि जाइ कैसी है तृष्णा नदी
कि यही लोक कहे मृत्युलोककी जे तरी कहे नौका हैं तिन्हें कौन गनै
अर्थ तिनको तो बोरिही देति है ॥ “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः इत्यमरः ॥”
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४५ )
इहां तरी पदने मनुष्यदेह जानो अर्थ मनुष्य देहको प्राप्त ह्वै के तो जीव तृष्णाको
पार पावतही नहीं है मनुष्यदेहमें तृष्णा कैसेहू नहीं मिटति इत्यर्थः ॥ बिलोकि
विलोकि कहे ढूंढि ढूंढि जहाजको बोरति है यहां जहाज पदने देवशरीर जानो
अर्थ देवताहू तृष्णाको पार नहीं पावत अथवा लोकनदी पदते लोकव्यवहार युक्त
मनुष्य देह जानो औ जहाज पदते संसारको त्यागकिये जे योगीजन हैं तिनके
शरीर जानो अर्थ योगीजन तृष्णाको पार नहीं पावने संसारविशिष्ट प्राणिनकी
कहा गिनती है औ लाजरूपी जो विशाल लता है सो लपटी हैं तनमें जिनके
ऐसे धैर्य्य औ सत्यरूपी तमाल वृक्ष हैं तिन्हें अति वेगसों तीरै कहे उखारि
डारति है नदीहू कूलके वृक्ष उखारि डारति है इहां तमालपद उपलक्षण है
तासों वृक्षमात्र जानो अर्थ तृष्णासों लाज औ सत्य प्राणीको दूर ह्वै जात है औ
वंचकता कहे छल औ अपमान औ अयान ( अज्ञानता ) औ अलम्भ कहे या-
चितवस्तुकी अप्राप्तिरूपी जे भुजंग ( सर्प ) हैं तिन करिकै अति भयानक है
नदीहूमैं सर्प रहतहैं अर्थ वंचकतादि जे चारों हैं तिनसों युक्त सदा तृष्णा रहति
है औ कृष्णा कहे श्यामरूपाहै औ जाको पाटु बडो है अन्त नहीं पाइयत औ
दुहूँ कूलमें कहूं घाट नहीं है जहां विश्रामहू पावै ॥ २२ ॥
मू०-पैरतपापपयोनिधिमैंमनमूढ़मनोजजहाजचढ़ोई। पेल-
तऊनतजैजड़जीवजऊबड़वानलक्रोधदढ़ोई ॥ झूठतरंगिनिमैं
उरझैसुइतेपरलोभप्रबाहबढ़ोई ॥ बूड़तहैतेहितेउबरैकहिकेशव
काहेनपाठपढोई ॥ २३ ॥
टी०-यामें जीवप्रति काहूकी शिक्षा है सो प्रसंग पाइ रामचन्द्र कहत हैं हे
मन ! मूढ ! जड ! जीव ! तू मनोज-( कन्दर्प ) रूपी जो जहाज है तामें चढ्यो
पापरूपी पयोनिधि समुद्रमें पैरत है अर्थ कामवश परस्त्री गमनादि पाप करत
फिरत है तहां अनेक अपमानादिते उत्पन्न जो क्रोधरूपी वडवानल है तामें जऊ
कहे यद्यपि दढोई कहे जरिहू गयो है तऊ कहे ताहूपर मनोज जहाजमें चढि
कामसमुद्रमें परिवो यह जो खेल है ताको तू नहीं तजतो एतेहूपर लोभ रूप
प्रवाह बढ्यो है जामें ऐसी जो झूठरूपी तरंगिणी नदी पापसमुद्रमें मिली है तामें
उरझत है अडिजात है अर्थ लोभवश अनेक झुठाई करत फिरत सो या प्रकार है या
समुद्रमें तुम बूडत हौ सो जासों उबरै कहे निकरै सो केशव यह जो पाठ है
ताको आजुतक काहे न पढ्यौ अर्थ भगवानको ना कहे न जप्यो अबहूं भगवा-
नको नाम जपिवो तोंको उचित है इति भावार्थः ॥ केशव पदके कहिबेको
आशय यह कि “के जले शेते इति केशवः” अर्थ वे समुद्रके जलहीमें सोयो
करत हैं तासों समुद्रसों उबारिबो उनको सहज है और नामके जपदूसों या समु-
द्रसों ना कढि है इतिभावार्थः ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ जोकेहूसुखभावना, काहूकोजगहोति ॥ काल
आखुपटतंतुज्यों, तबहींकाढतज्योति ॥ २४ ॥ ब्रह्मविष्णु-
शिवआदिदै, जेतनेदृश्यशरीर ॥ नाशहेतुधावतसबै, ज्योंबड-
वानलनीर ॥ २५ ॥
टी०-यामें समयके व्यवहार कहत हैं जो केहु कहे कौनेहू प्रकारसों सुख-
भावना कहे मोक्षकी वासना जगमें काहू प्राणीके होति है तो काल कहे समय-
रूपी जो आखु ( मूषक ) है सो
चतुर्विंशप्रकाशः २४. ( २४७ )
औभिक्षुकभूतकहैअमिजासहजैसो । हौंणूकहौंअपनोघरतैस्य-
हिताघरसों अपनोधर कैसो ॥ २७ ॥
टी०-हे मुनिनागर ! या संसारमें दोषमयी कहे दूषण (अपवाद) इति तत्
स्वरूप जो दवारि डाढा है अथवा दोषमयी कहे दूषणाधिक्यरूपी जो दवारि है
सो अति लगी है अति कहि या जनायो कि सब संसारभरमें लगी है ऐसो
स्थान या संसारमें कोऊ नहीं है कि जहां प्राणीको दोष न लगै अथवा जहां
कोहूको दोष न लगावै अर्थ या संसारमें वृथा सब सबको दोष लगावत है
अथवा दोष कहे परस्पर विरोधमयी जो दवारि लगी है ताको देखतही तासों
हमारी मति जरि गई है दवारिके छुयेसों जरियत हैं याके देखतही जरी कहे
अति तेज जनायो ता मतिमें या संसारमें राज्यादि भोगकी आश कहे इच्छा न
गूढ कहे अंतरमें है न उजागर कहे प्रसिद्ध है जैसे सागर-(समुद्र) में रज धूरि
गूढ उजागर नहीं है जा स्थानमें जो जीव दवारिमें जरत है ता स्थानमें ताके
भोगकी इच्छा नहीं होति यह रीतिही है ॥ २६ ॥ जैसे ये सब अपनी अपनो
घर कहत हैं तैसे ता घरसो कहे ताही घरको होहूं अपनो कहौं सो घर अपनो
कैसो कहे कौनविधि है या संसारमें कछु काहूको नहीं है वृथा ममत्व है इति
भावार्थः ॥ २७ ॥
मू०-सुन्दरीछन्द ॥ जैसहिहौंअबतैसहिहौजग । आपद-
सम्पदकेनचलौँमग ॥ एकहिदेहतियागबिनासुनि । हौँनकछू
अभिलाषकहौँमुनि ॥ २८ ॥ जोकछुजीवउधारणकोमत ।
जानतहौ तौ कहौ तनुहैरत ॥ यों कहिमौनगहीजगनायक ।
केशवदासमनोबचकायक ॥ २९ ॥ चामरछन्द ॥ साधुसा-
धुकैसभाअशेषहर्षहर्षियो । दीहदेवलोकतेप्रसूनवृष्टिवर्षियो ॥
देखिदेखिराजलोकमोहियोमहाप्रभा । आइयोतहाँतुरन्तदेव-
कीसबैसभा ॥ ३० ॥
टी०-राज्यादि जे आपद् विपत्ति औ संपद् संपत्तिके मग यह हैं तिनमें हौं न
चलिहौं हे मुनि ! एक देह त्याग बिना और कछू अभिलाष नहीं करतो अर्थ
( २४८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
केवल देह त्याग करिवेहीकी इच्छा है ॥ २८ ॥ रत कहे अनुरक्त ॥ २९ ॥
देवकी सबै सभा आइयो कहे आवत भई सो राजलोक कहे राजभवनकी प्रभा
देखि मोहियो कहे मोहित भई ॥ ३० ॥
मू०- विश्वामित्र ॥ व्यासपुत्रकेसमानशुद्धबुद्धिजानिये । ई-
शकोअशेषतत्त्वतत्त्वसोबखानिये ॥ इष्टहौबशिष्ठशिष्टनित्यव-
स्तुशोधिये । देवदेवरामदेवकोप्रबोधबोधिये ॥ ३१ ॥
टी०-विश्वामित्र वशिष्ठसों कहत हैं कि हम तुमको व्यासपुत्र जे शुकाचार्य्य हैं
तिनके समान शुद्ध बुद्धि कहे ज्ञानयुक्त है बुद्धि जिनकी ऐसे जानियत हैं
अर्थ अतिज्ञानी हौ और ईश जे ईश्वर हैं तिनको जो अशेष कहे संपूर्ण तत्त्व कहे
स्वरूप है ताको तत्त्व कहे सिद्धांत सो अर्थ निश्चयात्मक बखानि एक हेतु कहत
हैं ॥ “तत्त्वस्वरूपेपरमात्मनीतिमेदिनी ॥” हे शिष्ट कहे श्रेष्ठ ! वशिष्ठ ! तुम इष्ट
कहे रघुवंशके गुरु हौ और नित्य जो वस्तु है ताको शोधिये कहे ढूंढो करत हौ
सो सब विधिसों तुमको उचित है तासों देवके देव जे राम देव हैं तिनको प्रबोध
जो ज्ञान है तासों बोधिये कहे बोध करौ अर्थ जीवोद्धारको मत रामचंद्र पूछत
हैं सो कहौ ॥ ३१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचंद्रिकायामिन्द्रजिद्विर-
चितायांजगन्निन्दावर्णनं नाम चतुर्विंशतितमः प्रकाशः ॥ २४ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसादनिर्मिताया
रामभक्तिप्रकाशिकायां चतुर्विंशतितमः प्रकाशः ॥ २४ ॥
मू०-दोहा ॥ कथापचीसप्रकाशमें, ऋषिबशिष्ठसुखपाइ ॥
जीवउधारणरीतिसब, रामहिंकह्योसुनाइ ॥१॥ बशिष्ठ-पद्ध-
टिकाछन्द ॥ तुमआदिमध्यअवसानएक । अरुजीवजन्म समु-
झौअनेक ॥ तुम्हींजोरचीरचनाबिचारि । त्यहिकौनभांतिस-
मुझौमुरारि ॥ २ ॥ सबजातिबूझियतमोहिंराम । सुनियेजोक-
हौंजगब्रह्मनाम ॥ तिनकेअशेषप्रतिबिम्बजाल । त्यइजीवजा
पञ्चविंशप्रकाशः २५. ( २४९ )
निजगमेंकृपाल ॥३॥ निशिपालिकाछन्द ॥ लोभमदमोहब-
शकामजबहींभयो । भूलिगयेरूपनिजबेधितिनसोंगयो ॥ रा-
म ॥ बूझियतबातयहकैनविधिउद्धरै ॥ बशिष्ट ॥ वेदविधिशो-
धिबुधयत्नबहुधाकरै ॥४॥ राम-दोहा ॥ जितलैजैहैबासना,
तिततितहैहैलीन ॥ यत्नकहौकैसेकरे, जीवबापुरोदीन ॥ ५ ॥
बशिष्ट-दोधकछन्द ॥ जीवनकीयुगभांतिदुराशा ॥ होतिशुभा-
शुभरूपप्रकाशा । यत्ननसोंशुभपन्थलगावै । तौअपनोत-
हींपदपावै ॥ ६ ॥
टी०- १ जीवनके जे अनेक जन्म हैं तिनको समुझौं कहे जानत हौ अथवा
अनेक जे जीव हैं तिनके जन्मको अर्थ जा प्रकारसों जीवनकी उत्पत्ति है ताको
समुझौ कहे मोसों बूझत हौ ॥ २ ॥ सब वस्तु जानिहूकै जो हमसों बूझियत कहे
पूंछतहौ तौ सुनौं हम कहियत हैं जगमें जो ब्रह्मनाम कह्यो है अर्थ जिनको
ब्रह्मनाम है तिनके जे प्रतिबिंब जा प्रतिबिंब समूह हैं तेई जीव हैं यह मत प्रति-
बिंबवादिनको वेदांतमें प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥ अपनो जो रूप ब्रह्म है ताको भूलि-
गये तिनसों लोभादिसों ॥ ४ ॥ वासना (दुराशा) ॥ ५ ॥ शुभ दुराशा जो
ईश्वर पूजनादिकी आशा है ताके पंथमें जीवको अथवा मनको लगावै तो
अपनो जो पद (स्थान) है ब्रह्मस्थान ताको पावै अर्थ शुभवासनाको ग्रहण
करै ताके बाद ताहू वासनाको त्याग करि ब्रह्मपदको प्राप्त होय ॥ ६ ॥
मू०-हौंमनतेनिधिपुत्रउपायो। जीवउधारणमंत्रबतायो ॥
हैपरिपूर्णज्योतिंतिहारी । जाइकहीनसुनीननिहारी ॥ ७॥
दोहा ॥ ताकीइच्छातेभये, नारायणमतिनिष्ठ ॥ तिनतेचतु-
राननभये, तिनतेजगतप्रतिष्ठ ॥ ८ ॥ दोधकछंद ॥ जीवस-
बैअवलोकिदुखारे । आपनचित्तप्रयोगबिचारे ॥ मोहिंसुनाये
तुम्हेंतेसुनाऊं । जीवउधारणगीतगुनाऊं ॥ ९ ॥ दोहा-मुक्ति
पुरीदरबारके, चारिचतुरप्रतिहार । साधुनकोसतसंगसम,
( २५० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अरुसंतोषविचार ॥१०॥ यहजगचक्राब्यूहकिय, कज्जलक-
लितअगाधु ॥ तामैंपैठिजोनीकसै, अकलंकितसोसाधु॥११॥
टी०-ज्योति ( ब्रह्मज्योति ) ॥ ७॥ ८ ॥ तिन चतुरानन जगत्के जीवन-
को संसारमें दुखार देखिकै अपने चित्तमें तिन जीवनके उद्धारको प्रयोग कहे
यत्न बिचारचौ सो सब हमको सुनायो है सो तुमको सुनाईयतहै ॥ ९ ॥ १०॥
यामें साधुको लक्षण कहत हैं जैसे कज्जल कलित चक्रव्यूहमें शपथार्थ पैठिकै
अकलंकित कहे कज्जल चिह्न रहित निकसे सो साधु कहे दोषरहित होत है तैसे
कज्जल सम दोषयुक्त जो संसार है तामें पैठि अकलंकित कहे अदोष निकसै सो
प्राणी साधु है ॥ ११ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देखतहूंएककालछियेहूं । बातकहैसुनै
भोगकियेहूं ॥ सोवतजागतनेकनक्षोभै । सोसमतासबहीमहँ
शोभै ॥ १२ ॥ जोअभिलाषनकाहुकोआवै । आयेगयेसुख
दुःख नपावै । लैपरमानँदसौंमनलावै । सोसबमांझसंतोषक-
हाव ॥ १३ ॥ आयोकहाँअबहौंकहिकोहौं । ज्योंअपनोपद्-
पाऊं सोठोहौं ॥ बंधुअबंधुहियेमहँजानैं । ताकहँलोगबिचार-
बखानैं ॥ १४ ॥
टी०-यामें समताको लक्षण कहत हैं संसारको जो' स्रक् चंदन वनितादि
विषयभोग है ताको देखत हूं औ छुयेहूं औ ताहीकी बात कहै औ सुनै औ भो-
गहू करै परंतु सोवत वा जागते नेकहू तामें क्षोभै नहीं अर्थ लीन न होय औ
सबहीमें कहे अग्नि जलादिमें समता शोभै सोई समता है ॥ १२ ॥ यामें संतोष-
को लक्षण कहतहैं जो काहू वस्तुको अभिलाष जीमें न आवै औ काहू वस्तुके
आयेसों प्राप्त भयेसों सुख न पावै औ गयेसों दुःख न पावै औ मनको लैके परमा-
नंद जो ब्रह्महै तामें लगावै सोई सबमांझ कहे चारोंके मध्यमें संतोष कहावत है॥
॥ १३ ॥ यामें विचारको लक्षण कहत हैं मैं कौन हौं औ कहां आयो हौं अब
जा उपायसों अपने पद-( स्थान ) को पाऊँ सोउ ठोहौं कहे ढूंढौं या प्रकारसों
विचार करै औ बंधु कहे हित शम दमादि अबंधु कहे अहित काम क्रोधादिको
हियेमें जानै सोई बिचार है ॥ १४ ॥
पंचविंशप्रकाशः २५. (२५१)
मू०-चारिमैंएकहुजोअपनावै । तौतुमपैप्रभुआवनपावै ॥
राम ॥ ज्योतिनिरीहनिरंजनमानी। तामहैंक्योंऋषिइच्छबखा-
नी ॥ १५ ॥ वशिष्ठ-दोहा ॥ सकलशक्तिअनुमानिये, अद्भुत
ज्योतिप्रकाश ॥ जातेजगकोहोतहै, उत्पतिस्थितिअरुनाश॥
॥ १६ ॥ श्रीराम-दोधकछंद ॥ जीवबँधेसबआपनिमाया ॥
कीन्हेंकुकर्ममनोवचकाया ॥ जीवनचित्तप्रबोधनआनो ।
जीवनमुक्तकेभेदबखानो ॥ १७ ॥
टी०-जैसे चोपदारको अपनाइकै राजाके पास सब जात हैं तैसे इन चारिमैं
एकहूको अपनावै तौ तुमपै जान पावै फेरि राम ऋषिसों पूंछचों कि ज्योतिको
तौ निरीह कहे इच्छा रहित और निरंजन कहे रागरहित मान्यौ औ कह्यो कि
“ताकी इच्छाते भये, नारायण मतिनिष्ठ” तौ ज्योतिमें इच्छा क्यों कही सो
कहौ ॥ १५ ॥ वशिष्ठ कह्यो कि अद्भुत जो ज्योतिको प्रकाश है तामें इच्छादि
कहैं तौ नहीं परंतु इच्छादिकनकी सबकी शक्ति अनुमानियतहै जा शक्तिसों
संसारकी उत्पत्ति स्थिति नाश होत है ॥ १६ ॥ जीव जे हैं ते अपनीमायामें
बँधे मनसा वाचा कर्मणा कुकर्म (कुत्सितकर्म) कीन्हे हैं तिन जीवनको जो
प्रबोधन कहे ज्ञान तुम कह्यो सो हम चित्तमें आन्यो अर्थ भ्यास जान्यो इति अब
जीवनमुक्तके भेद कहौ ॥ १७ ॥
मू०-वशिष्ठ ॥ बाहेरहूंअतिशुद्धहियेहू । जाहिनलागतकर्म
कियेहू ॥ बाहेरमूढसोअंतसयानो। ताकहँजीवनमुक्तबखानो॥
॥ १८ ॥ दोहा ॥ आपुनसोअवलोकिये, सबहीयुक्तायुक्त ॥
अहंभावमिटिजाहिजो,कौंनबद्धकोमुक्त ॥ १९ ॥ श्रीराम-दो-
धक ॥ सोसिगरेगुणहोतसोजानो । स्थावरजीवनमुक्तबखा-
नो ॥ वशिष्ठ ॥ जानिसबैगुणदोषनछँडै । जीवनमुक्तनकेपद-
मंडै ॥२०॥ राम-दोहा ॥ साधुकहावतकरतहैं, जगमेंसबव्यौ-
हार ॥ तिनकोमीचुनछैंसकै, कहिप्रभुकौनविचार ॥ २१ ॥
टी०-यामें जीवन्मुक्तको लक्षण कहते हैं बाहर कहे तनमें औ हियहूमैं
कहे मनहूमैं शुद्ध होय औ पाप पुण्य कर्म करै सो लागै नहीं औ बाहर मूढ़
(२५२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अज्ञान रहे अर्थ बावरं सन रहे औ अंतमें सयानो रहे ताहीको जीवन्मुक्त
कहियत है॥ १८॥ युक्त कहे योग्य मनुष्यादि अयुक्त कहे अयोग्य सूकरादि
तिनको आपुनसो कहे आपने सम अवलोकिये (देखिये) अर्थ अपने सम
सबको जानिये औ अहंभाव मिटि जाय तौ कौन बद्ध है कौन मुक्त है अर्थ
सबही मुक्त हैं ॥१९॥ योग्यके गुण अयोग्यके दोष जानिकै त्याग करै ॥२०॥
रामचन्द्र कहत हैं कि ज्ञानसों जीवनकी मुक्ति कह्यो सो जान्यो अब यह कहौ
कि जे प्राणी साधु कहावत हैं औ जगमें स्त्री पुत्रादिके सब व्यौहार करत हैं
तिनको मीचु नहीं छुई सकति अर्थ तिनकी मृत्यु नहीं होति है ताको विचार
हे प्रभु ! हे वशिष्ठ ! कहौ ॥ २१ ॥
मू०-वशिष्ठ-पद्धटिकाछन्द ॥ जगजिनकोमनतवचरणली-
न । तनतिनकोमृत्युनकरतिक्षीन ॥ तेहिक्षणहींक्षणदुखक्षीण
होत । जियकरतअमितआनँदउदोत ॥ २२ ॥ जोचाहैजीवन
अतिअनंत । सोसाधैप्रणायामयंत्र ॥ शुभरेचकपूरकनामजा-
नि । अरुकुम्भकादिसुखदानिमानि ॥ २३ ॥ जोक्रमक्रमसाधै
साधुधीर । सोतुमहिंमिलै याहीशरीर ॥ राम ॥ जगतुमते नाहिं
सर्वज्ञआन । अबकहौदेवपूजाविधान ॥ २४ ॥
टी०-हे राम ! जिन प्राणिनको मन तुम्होर चरणमें लीन है ते साधु जगमें
सब व्यवहारहू करत हैं ताहूपर तिनके तनको मृत्यु क्षीण नहीं करि सकति औ
तिहि प्राणीके क्षणमें संसाररूपी दुःख क्षीण होत हैं औ मुक्तिरूपी जो अमित
आनन्द है सो उदोत ( प्रकाश ) करत है ॥ २२ ॥ अंगुष्ठ ते तृतीय अंगुलीको
नाम अनामिका है तासों नासाको बाम रंध्र अंगुष्ठसों रोंकि बाम रंध्रसों वायुको
छोडिये सो पूरक प्राणायाम है; औ दक्षिण रंध्र अंगुष्ठसों औ बामरंध्र
अंगुष्ठसों औ बामरंध्र अनामिकासों साथही रोंकि वायुको हृदयमें स्थापन करिये
सो कुम्भक है औ यथा वायुपुराणे।“प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचकः पूरकस्तथा ॥
कुम्भको रेचकस्तत्र नासारंध्राच्च दक्षिणात् ॥ निरुध्य वामरंध्रञ्चानामिकया
विसर्जनम् ॥ निरुध्य दक्षिणं रंध्रं वामरंध्राच्च पूरणम् ॥ तथैवानामिकांगुल्या
पूर्ण तु तदुच्यते ॥ रेचकात्पूरणात्पश्चाद्द्वैपुटन्नाशयस्तथा । सन्निरुध्य हृदि-
स्थाप्य वायुं तिष्ठत्स कुम्भकः" ॥ २३ ॥ २४ ॥
मू०-वशिष्ट-तारकछंद ॥ हमएकसयमनिकसेतपसाको ।
तवजाइभजेहिमवंतरसाको ॥ बहुभांतिकरचोतपक्योंकहि
आवै । शितकण्ठप्रसन्नभयेजगगावै ॥ २५ ॥ दंडक ॥ ऊजरे
उदारउरबासुकीबिराजमान हारकेसमानआनउपमानटोहिये।
शोभिजैजटानबीचगंगाजूकेजलबुंदकुंदकीसीकलीकेशोदासम-
नमोहिये।नखकीसीरेखाचंद्रचन्दनसीचारुरजअंजन शृंगारहू-
गरलरुचिरोहिये। सबसुखसिद्धि शिवासौंहैशिवजूकेसाथजाव-
कसोपावकलिलारलाग्योसोहिये ॥ २६ ॥
टी०-रसा (पृथ्वी) जग गावै अर्थ जिनको जगत्के प्राणी गान करत
हैं ॥ २५ ॥ उजरे औ उदार कहे बडे उरमें हार मालाके समान वासुकी नाम
सर्प विराजमानहै और उपमाको नहीं टोहिये कहे ढूंढियत अर्थ और उपमाके
सदृश नहीं हैं तासों खोज नहीं करियत रज कहे विभूति अंजन जां शृंगार है
ताकी रुचि गरल जो विष है ता करिके रोहिये कहे धारण करियत है अर्थ लगि-
गयो पार्वतीके नेत्रांजन सम गरल शोभित है सब सुखकी सिद्धि शिवा जो
पार्वतीजी हैं ते संगमें शोभती हैं औ जावक कहे महाउर सम लिलारमें लाग्यो
पावक (अग्नि) शोभित है ऐसे सदा सुरत चिह्नयुक्त प्रसन्न है हमारे समीप
आये इतिशेषः ॥ २६ ॥
मू०-महादेव-तारकछन्द ॥ बरमाँगिकछूऋषिराजसयाने ।
बहुभांतिचलेतपपंथपयाने ॥ वशिष्ट ॥ पुजवोपरमेश्वरमोमन
इच्छा । सिखवोप्रभुदेवप्रपूजनशिक्षा ॥ २७ ॥ शिव-दोहा ॥
रामरमापतिदेवनहिं, रंगनरूपनभेव ॥ देवकहतऋषिकौनको,
सिखऊंजाकीसेव ॥ २८ ॥ वशिष्ट-तोमरछंद ॥ हमकहाजान-
हिंअज्ञ । तुमसर्वदासर्वज्ञ ॥ अबदेवदेहुंबताइ । पूजाकहोस-
मुझाइ ॥ २९ ॥ शिव ॥ सतचित्तप्रकाशप्रभेव । तेहिबेद-
मान तदेव ॥ तेहिपूजिऋषिरुचिमंडि । सबप्राकृतनकोछांडि