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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 269 में से

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पृष्ठ 246

( २४० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

निबेधवकौतो। वाइलगाइबिबेकनकोंबहुशोधककोकहिबाधक
जोतो। औरकोकेशवलूटतोजन्मअनेकनकेतपसानकोयोतो।
तौममलोकसबैजगजातो जो कामबड़ोबटपारनहोतो ॥ ११ ॥
टी०-यामें यौवनकृत दुःख कहत हैं वेद पुराणनको प्रथम तौ सुनत नहीं
औ सुनत है तौ समुझत नहीं औ समुझत है तौ त्रसत कहे डरत नहीं और वेद
वचनही को निंदाकरि हँसत है वानरसम विलसत कहि या जनायो कि पशुसम
बुद्धि है जाति है ॥ १० ॥ यामें काम व्यौहारकृत पीडा कहत है साधक
प्राणायामादि एतो कहे जहाज पचीसयें प्रकाशमें यकतालिसयें दोहामें रामचन्द्र
कह्यो है मोहि न हतो जानाईबे सबहीं जान्यों आज यासों या जानौं रामचन्द्र
ईश्वरत्वको छपाये रहे हैं औ यामें ममलोक सबै जग जातो या उक्तिसों
ईश्वरत्व प्रगट होत है तहां कविकों भ्रम जानव अथवा तौ ममलोक कहे ममता-
विशिष्ट जे लोक मर्त्य लोकादि हैं तिनसों सबै जग कहे सब जगतके जीव अपने
स्थानको ब्रह्मपदको इतिशेषः जातो प्राप्त होतो ॥ ११ ॥
मू०-मकरंदबिजयाछंद ॥ कँपैबरबानीडगैउरडीठितुचा-
तिकुचैसकुचैमतिबेली। नवैनवग्रीवथकैगतिकेशवबालकते-
सँगहीसँगखेली ॥ लियेसबआधिनव्याधिनसंगजराजबआ-
वैजराकीसहेली । भगैसबदेहदशाजियसाथरहैदुरिदौरिदुरा-
शाअकेली ॥ १२ ॥
टी०-यामें वृद्धताको व्यवहार कहत हैं पुत्रादिके कटुवचनादिसों जनित जो
आधि कहे मानसी व्यथा औ व्याधि शरीर व्यथा (ज्वरादि) तिनके संगमें
लिये ज्वरा जो मृत्यु है ताकी सहेली सखी जो जरा (वृद्धता) है सो जबदेहमें
आवति है तब ताके डरसों बाणी काँपै लागति है अर्थ मुखसों व्यक्त वचन नहीं
कढत औ डीठि डगै कहे डगमगाति है औ त्वचा कहे चर्म अति कुचै कहे बहुत
सिकुरि जाति है औ मति (बुद्धि) रूपी जो बेली (लता) है सो सकुचै कहे
संकोचको प्राप्त होति है अर्थ बुद्धि हीन होति जाति है औ नव कहे नवीन
प्रकारसों ग्रीवा नवै कहे नत होति है नवपद् यासों कह्यौ कि और जो कोऊ
काहूको नवत है अर्थ प्रणाम करत है सो नयोई नहीं रहत ग्रीवा जबसों नवति है
तबसों नईही रहति है उठति ही नहीं अथवा भयसों अनित्यको छोडि नत होति है