रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जारति है जैसे चितामें जीवको दुचिताई जारतिहै इत्यर्थः औ अहि कहे सर्पसम
जो कोप मरे प्राणीको जारियत है तैसे चित्तरूपी चितामें है सो दीह कहे बहुत
अर्थनकी विधि जीवके त्वचाचर्मकी चवाई कहे चबातहै अर्थ काटतहै अथवा
त्वचासम अहिकोप चबातहै अर्थ सर्पत्वचामें काटत है तब जीवको परम पीडा
होति है औ कोप तौ जीवहीको काटत है ताको पीडा तौ अकथनीय है औ जब
काम अथवा अभिलाषरूपी जो समुद्र है ताके तरंगके झकोरनमें झूलौ इत उत
आयो गयो तब हेमहाप्रभु ! जीव जो है सो भूल्यो अर्थ अपनपा को भुलान्यो
महाप्रभु ऋषिनको संबोधन है चिता ( दाह ) सर्प दंश समुद्र तरंगके झकोरनमें
सबको विकलतासों आपनपाकी सुधि भूलि जात है ॥ ६ ॥ यौवन जोरमें
और कहा होत है सो कहत हैं धूमसम जो नीलनिचोल कहे श्याम वस्त्र है तामें
सोहति है इहां केवल धूमकी समताके लिये नीलनिचोल कह्यौ अग्नि दाहभयसों
परनारी लोकभयसों छुई नहीं जाति देखतही मनको दुवौ मोहत हैं परनारी
मोहति कहे बश करति है अग्नि मोहिति कहे भयसों अथवा तेजसों मूर्छित
करतिहै सो पापरूपी यौवन है तामें चारि कहे गामी अर्थ जैसे अग्नि
वनमें बिहरति है तैसे पर नारी पापहीमें बिहरति है ऐसी परनारी रूपी
जो पावकशिखा है सो नरको जारति है परस्त्रीको देखि जीव विकल होत है
इत्यर्थः ॥ ७ ॥
मू०-बंकहियेनप्रभासरसीसी । कर्दमकामकछूपरसीसी ॥
कामिनिकामकीडोरिग्रसीसी । मीनमनुष्यनकोबनसीसी ॥८॥
टी०-मनुष्यनके जै हिय हैं तिनकी जो प्रभा ( शोभा ) है सोई बंक कहे
कुटिल अर्थ घाट रहित अथवा गहिर सरसी कहे तडागसी है अर्थ हृदय तडाग
सम है औ काम अभिलाषरूपी जो कर्दम ( कीच ) है तासों कछू कहे कछुअर्थ
थोरीहू परसी कहे युक्त है यासों या जनायो कि अधिक कामयुक्तकी कथा है
ता सरसी कामिनि कहे स्त्रीरूपी जो काम ( कंदर्प ) शिकारीकी डोरी है सो ग्रसी
है कहे लगी है ते स्त्री मीनरूपी जे मनुष्य हैं इहां मनुष्य पदते मनुष्यनके जीव
जानौं तिनको कहे तिनके बसकरिबेकी बनसीसी है जैसे तडागमें कीच बीच
बसे मीननको बंसी बश करति है तैसे हृदयरूपी तडागमें कामरूपी कीचमें बसे
जे जीव हैं तिनकी बंसी डोरीसम हृदयमों ग्रसी जो कामिनी स्त्री है सो बश
करति है इत्यर्थः अथवा बंक ( कुटिल ) जे हृदय कहे मन हैं तिनकरिकै प्रभा