सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240

( २३४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
मू०-यद्यपिहोइशुद्धमतिसत्तु । फिरैपिशाचीज्यौंउनमत्तु ॥
गुनवंतनिआलिंगतिनहीं । अपवित्रनिज्योंछांडतितहीं॥२९॥
शूरनिनाशतिज्योंअहिदेखि । कंटकज्योंबहुसाधुनलेखि ॥
सुधासोदरायद्यपिआप । सबहीतेअतिकटकप्रताप ॥ ३० ॥
यद्यपिपुरुषोत्तमकीनारि । तदपिसकलखलजनअनुहारि ॥
हित कारिनकीअतिद्वेषिनी । अहितलोगकोअन्वैषिनी
॥ ३१॥ मनमृगकोसुबधिककीगीति । विषयबेलिकीबारि-
दरीति ॥ मदपिशाचिकाकीसीअली । मोहनींदकीशय्या-
भली ॥ ३२ ॥
टी०-सत्तु ( प्राणी ) अथ राजासों राज्यश्री युक्त द्वै पिशाचाक्रांत पुरुष-
सम उन्मत्त फिरत हैं गुणवंतन कहे विद्यादि अनेक गुणको अपवित्र सम त्याग
करति है इत्यर्थः ॥ "पंडिते निर्द्धनत्वमित्युक्तं माधवानलनाटके” ॥ २९ ॥
नाशति कहे छोडति है शूर औ साधुनको राज्यश्री नहीं प्राप्त होति अथवा शूर
औ साधुनको संग्रह राजा नहीं करते इत्यर्थः सुधा जो अमृत है ताकी सोदरा
( बहिन ) ॥ ३० ॥ पुरुषोत्तम (विष्णु) द्वेषिणी कहे शत्रु है अन्वेषिणी कहे
ढूंढनहारी है ॥ ३१ ॥ बधिकसम मनरूपी मृगको बांधि लेति है कहे काबू करि
लेति है इत्यर्थः ॥ औ बारिद कहे मेघसम विषयरूपी बेलिको हरित करति है
इत्यर्थः मद्रूपी जो पिशाचिका (प्रेतिन) है ताकी अली कहे सखी है अर्थ
सहायक है पठावनहारी इति मोह कहे अज्ञानरूपी जो नींद है ताकी शय्या
जैसे शय्यामें नींद बढति है तैसे राज्यमें मोह बढ़त है इत्यर्थः ॥ ३२ ॥
मू०-आशीबिषदोषनकीदरी । गुणसतपुरुषनकारणछरी ॥
कलहंसनकीमेघावली । कपटनृत्यकारीकीथली ॥ ३३ ॥
दोहा ॥ बामकामकरिकीकिधौं, कोमलकदलिसुवेष । धीरधर्म-
द्विजराजको, मनोराहुकीरेष ॥ ३४ ॥ चौपाई ॥ मुखरोगी
ज्योंमौनेरहै । बात बलायएकद्वैकहै ॥ बंधुबर्गपहिचानैनहीं ।
मानोसन्निपातहैगही ॥ ३५ ॥