रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २३५ )
टी०--दरी-( कंदरा ) में आशीविष ( सर्प ) सम अनेक प्रजा पीडनादि दोष
जामें वास करत हैं इत्यर्थः औ अनेक जे विद्यादिगुणरूपी सत्पुरुष हैं तिनके
कारण कहे अर्थ छरी कहे ताडन दंड है जैसे राजद्वारमें ताडन दंड देखि
सत्पुरुष नहीं आवत तैसे राज्यश्री युक्त पुरुषके पास विद्यादि गुण नहीं आवत
तासों सत्पुरुष लोभवश दंडपात हंसहि भूप द्वारादि स्थलमें जातहीहैं कुपुरुष
कह्यो राज्यसुखालस्यसों राजा गुणनको अभ्यास नहीं करत इति भावार्थः कल
कहे अविग्नतासों चित्तइति हंसनको मेघावलीसम राजनके कलको राज्यश्री दूरि
करति है इत्यर्थः अनेक शत्रु भयादि युक्त राजनको चित्र सदा रहत हैं इति
भावार्थः शत्रुसैन्यभेदादि अनेक कपटयुक्त राजा होत हैं इति भावार्थः
॥ ३३ ॥ बाम कहे कुटिल जो काम ( कंदर्प ) रूपी करि, ( हाथी ) है
ताको सुवेष कहे हरित कोमल कदली (केरा) है अर्थ गजनको कदली सम
कामको बलकर्ता है अथवा सुखद है राजा अति कामी होत हैं इति भावार्थः ।
कदली भक्षणसों गजनको बल औ सुख होतहै यह प्रसिद्ध है औ धीर औ
धर्मरूपी द्विजराज ( चंद्रमा ) को राहुरेखसम पीडाकर्ती है इत्यर्थः राजा बंधु-
मंत्रीआदिमें भेद भय मानि सदा अधीर रहते हैं औ आलस्यवश दानादि धर्म
विधिपूर्वक नहीं करत इति भावार्थः ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
मू०महामंत्रहूहोतनबोध । डसीकालअहिकरिजनुक्रोध ॥
पानबिलासउदितआतुरी । परदारागमनैचातुरी ॥ ३६ ॥ मृ-
गया यहै शूरताबढी । बंदीमुखनिचापसोंपढी ॥ जोकेहूंचित-
वैयहदया । बातकहैतौबड़ीएमया ॥ ३७॥ दर्शनदीबोईअ-
तिदान । हँसि बोलैतौबड़सनमान ॥ जोकेहूसोंअपनोकहै ।
सपनेकीसीपदवी लहै ॥ ३८॥ दोहा ॥ जोईअतिहितकीकहै,
सोईपरमअमित्र । सुखबक्ताईजानिये, संततमंत्रीमित्र ॥३९॥
टी०-मंत्रिन करि दीन्हे जे महा कहे बडेबडे मंत्र हैं तिनहुसों जाको बोध
ज्ञान नहीं होत सो मानों काल अहि कहे कालसर्प करिकै डसी कहे काटी गई है
अर्थ मानों क्रोध करि कालसर्प काट्यो है जा प्राणीको कालसर्प काटत है
ताहूको झारिवेके जे महामंत्र हैं तिनसों बोध ( ज्ञान ) नहीं होत अर्थ मूर्च्छा नहीं
जागति पान कहे मद्यपानको जो विलास है ताहीमें उदित कहे प्रगट है आतुरी