रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशप्रकाशः २४. (२३९)
(शोभा) सरसी कहे बढ़ी है जाके अर्थ जैसे बंसी कुटिल लोहकंटकसों युक्त
रहति है तैसे कुटिल हृदय करिकै युक्त स्त्री है औ काम कहे अभिलाष रूपी जो
कर्दम कर्दम कहे पिशानका गंधादि युक्त कीच है सान्यौ पिसान तासों कछू
परसी कहे युक्त है अर्थ जैसे कुटिल कंटक गंधादि युक्त साने पिसानसों युक्त
होत है तैसे स्त्रीनके मन अभिलाषसों युक्त हैं औ कामिनी जो स्त्री हैं सोई
काम (कंदर्प) शिकारीकी डोरीहै सो ग्रसी है कहे लगी है सो मीनसम मनुष्य-
नको बंसीसम है अर्थ जैसे सागरमें बंसीके पिसानको गंध पाइ मीन बंसीके
बश होतहै तैसे संसारसागरमें स्त्रीनके मनके अभिलाषको गंधपाइ अर्थ स्त्रीनकी
अभिलाष समुझि मनुष्य बश होत है ॥ ८॥
मू०-बिजयछंद ॥ खैंचतलोभदशौंदिशिकोमहिमोहमहाइ-
तपासिकैडारे । ऊंचेतेगर्वगिरावतक्रोध