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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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( १७८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कीरतिकैनजानी । सोईमहोदरवृकोदरबंधुमानी ॥ ३५ ॥
जाकेरथायपरसर्पध्वजाविराजै । श्रीसूर्यमण्डलविडंबनज्योति
साजै ॥ आखंडलीयवपुजोतनत्राणधारी । देवांतकैसोसुरलो-
कविपत्तिकारी ॥ ३६ ॥ जोहंसकेतुभुजदंडनिषङ्गधारी । सं-
ग्रामसिंधुबहुधाअवगाहकारी ॥ लीन्हीछँडाइजेहिदेवअदेव
वामा । सोईखरात्मजबलीमकराक्षनामा ॥ ३७ ॥
टी०-त्रिशूल कैसो है सुर जे देवताहैं तिनको मानौं समूल कहे पूर्णशूल कहे
मृत्युहै । “शूलोस्त्री रोगआयुधे मृत्युकेतनयोगेषु ” इतिमेदिनी ॥ ३४ ॥ कांच-
नीयरथ कहे सुवर्णको रथ ताके शृंगमें अग्रभागमें मयूरनकी मालापंगति
लगी है अर्थ मयूरध्वजी है जाकी शक्ति बरछी षण्मुख जे स्वामिकार्त्तिक हैं

सप्तदशप्रकाशः १७. ( १७९ )
गृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठतु निर्विशंकाः ॥ इहागतं मां सहितं भवद्भिर्व्रनौकसः
छिद्रमिदं विदित्वा । शून्यां पुरीं दुःप्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः ॥
विसर्जियित्वा सचिवांस्तस्ततान् गतेषु रक्षस्सु यथा नियोगे ॥'' सो गिरिजे पर्वतहैं
तिनके ग्राम कहे समूह लै लैके हरि जे वानरहैं तिनको समूह मारतहै तिन गिरि
समूहनमें रावण पद्मिनी कमलिनी पत्रमें दंतीसम विहार कौतुक करतहै अर्थ
गिरि ग्राम रावण की देहमें दंतीकी देहमें पद्मिनीपत्र सम लागत है ॥ ४०॥
मू०-सवैया ॥ देखिबिभीषणकोरनरावणशक्तिगहीकररोष
रहींहै। छूटतहीहनूमंतसोंबीचहिंपूंछलपेटिकैडारिदईहै॥ दूसरि
ब्रह्मकीशक्तिअमोघचलावतहीहाइहाइभई है। राख्योभलेशर-
णागतलक्ष्मणफूलिकैफूलिसीओढिलई है ॥ ४१॥ सुग्विनी-
छंद ॥ जोरहींलक्ष्मणैलेनलाग्योजहीं।मुष्टिछातीहनूमंतमारयो
तहीं॥ आशुहीप्राणकोनाशसोह्वैगयो। दंडद्वैतीनमेंचेतताको
भयो॥ ४२॥ मरहट्टाछंद ॥ आयोडरिप्राणनिलैधनुबाणनि-
कपिदलदियोभगाइ ॥ चढिहनूमंतपररामचन्द्रतबरावणरों-
क्योजाइ ॥ धरिएकबाणतबसूत्तछत्रध्वजकाटेमुकुटबनाइ ॥
लागेदूजो शरछूटिगयोबरुलंकगयोअकुलाइ ॥४३॥ दोधक-
छंद॥ यद्यपिहैअतिनिर्गुणताई। मानुषदेहधरेरघुराई ॥लक्ष्मण-
रामजहीं अवलोक्यो॥ नैननतेनरह्योजलरोक्यो॥४४॥राम॥
वारकलक्ष्मणमोहिं बिलोको । मोकहँप्राणचलेतजिरोको ॥
हौंसुमिरौंगुणकेतिकतेरे । सोदरपुत्रसहायकमरे ॥ ४५ ॥
टी०-फूलिकै प्रसन्न ह्वैकै ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ हनूमानसों प्राणनको डरिकै
कपि दलको भगायो जाय तहां हनूमान क्यों न गये तौ जब रावण वा ठोरसों
भागो तब लक्ष्मणको लै हनूमान रामचन्द्रके पास गये इतिकथाशेषः ॥ ४३ । '
॥ ४४ ॥ ४५ ॥
मू०-लोचनबाहुतुहींधनुमेरो । तूबलबिक्रमवारकहेरो ॥ तू-
बिनहौंपलप्राणनराखौं । सत्यकहौंकछुझूठनभाखों ॥ ४६ ॥

( १८० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोहिंरहीयतनीमनशंका । देननपाइबिभीषणलंका ॥ बोलिउ-
ठौप्रभुकोप्रणपारो । नातरुहोतहैमोमुखकारो॥४७॥विभीषण-
सुंदरीछंद ॥ मैंबिनऊंरघुनाथकरौअब । देवतजोपरिदेवनको
सब ॥ औषधिलैनिशिमैंफिरिआवहि॥केशवसोसबसाथजिआ
वहि॥४८॥सोदरसूरकोदेखतहीमुख॥रावणकेपुरवैसिगरेसुख॥
बोलसुनेहनुमंतकरच्योप्रन । कूदिगयोजहँ औषधिकोबन॥४९॥
टी०-बल कहे सैन बिक्रम पराक्रम ॥ ४६ ॥ प्रभु जो मैं हौं ताको विभी-
षणको लंकदान रूपी जो प्रण है ताको पारोकहे पूरण करौं ॥ ४७ ॥ हे रघु-
नाथ ! जो मैं बिनऊं कहे बिनती करत हौं सो तुम करो हे देव ! सब मिलिकै
परिदेवन जो बिलाप है ताको छोड़ि देहु ॥ “बिलापः परिदेवनमित्यमरः”॥४८॥
प्रथम कह्यो है कि औषधि लै कै निशिहींमें फिरि आवै ताको हेतु कहत हैं सोदर जे
लक्ष्मण हैं सूर जे सूर्य हैं तिनको मुख देखतही रावणके सिगरे सुख पुरवैं कहैं
पूरित करिहैं अर्थ सूर्योदय भये लक्ष्मण न जीहैं या प्रकारको विभीषणको बोल
सुनिकै निशिहीमें हम औषधि ल्याइ हैं हनुमंत यह प्रण करचो ॥ ४९ ॥
मू०-रागषट्पद ॥ करिआदित्यअदृष्टनष्टयमकरौंअष्टबसु ।
रुद्रनबोरिसमुद्रकरौंगंधर्बसर्वपसु ॥ बलितअबरेकुबेरबलिहि-
गहिदेउंइन्द्रअब । विद्याधरनिअबिद्यकरौंबिनसिद्धिसिद्धसब ॥
निजहोहिदासिदितिकीअदितिअनिलअनलमिटिजाइजल ।
सुनि सूर जसूरजउदतहींकरौं असुरसंसारबल ॥ ५० ॥ भुजंग-
प्रयातछंद ॥ हन्योबिघ्नकारीबलीबीरबामैं । गयोशीघ्रगामी-
गयेएकधामैं ॥ चल्योलैस बैपर्बतैकैप्रणामैं ॥ नजान्यो-
बिशल्यौषधीकौनतामैं ॥ ५१ ॥
टी०-रामचन्द्र सुग्रीवसों कहत हैं कि जो सूर्य उदयको प्राप्त होई तौ जेते
देवता हैं तिनकी सबकी आयुर्दशा करौं औ देवनके शत्रु जे असुर दैत्यहैं तिनको
बल संसारभरेमों करि देउं अर्थ तीनों लोकमें दैत्यनको राज करि देउं दिति
दैत्यनकी माता अदिति देवनकी माता ॥ ५० ॥ बामकहे कुटिल ऐसा जो

[सप्तदशप्रकाशः १७. ( १८१ )]

हनुमानके सूर्योदय पर्यंत विलंबाइवेके लिये कपट तपस्वीकोरूप धरे मगमें बैठो
कार्यको विघ्नकारी कालनेमि राक्षस है ताको मारिकै एक यामै पहरै गये कहे
बीते औषधि पास गयो विशल्यौषधी कहे विशल्यकरनी औषधी ॥ ५१ ॥
मू०-लसैंऔषधीचारुभोव्योमचारी। कहैदेखियोंदेवदेवाधि-
कारी ॥ पुरीभौमकीसीलिये शीशराजै । महामंगलार्थीहिनूमंत
गाजै ॥ ५२ ॥ लगीशक्तिरामानुजेरामसाथी । जडेह्वैगयेज्यों
गिरैहेमहाथी ॥ तिन्हेंज्याइबेकोसुनोप्रेमपाली । चल्योज्वाल
मालीहिलेकीर्तिमाली॥५३॥ किधौं प्रातहीकालजीमेंबिचार्यो
चल्योअंशु लैंअंशुमालीसँहारचो॥ किधौंजातज्वालामुखीजोर
लीन्हें । महामृत्युजामैंमिटेहोमकीन्हें ॥ ५४ ॥
टी०-वा पर्वतमें ज्वलित औषधी सोहती हैं ताको लै हनुमान व्योमचारी आकाश
मगगामी भयो देव औ देवाधिकारी गंधर्वादि अथवा देवदेव जे इन्द्र हैं तिनके
अधिकारी जे देवता हैं अर्थ औषधिनकी रक्षामों जिनदेवतनको इंद्र अधिकार
दियो है अथवा देवदेव इंद्र औ मंत्रादिमें अधिकारी जे देवता हैं ते कहत हैं कि
महामंगल कल्याणके अर्थी जे हनुमान हैं ते भौम जे मंगल हैं तिनकी पुरीहीको
लिये जात हैं अनेक मंगल सम ज्वलित औषधी वृंद है मंगल पद श्लेष हैं कल्याण
औ भौमको नाम है ॥ ५२ ॥ तिन्हें कहे तिन लक्ष्मणको ज्याइवेको औषधिनके
ज्वालाकी माली कहे समूह हैं जामें सो ज्वालमाली कहावै ऐसा जो पर्वत है
ताहीको लैकै चल्यो है अर्थ ज्वलित हैं औषधिवृंद जामें ऐसो जो औषधिपर्वत
द्रोणाचल है ताहीको लिये जात हैं अथवा ज्वालकी है माली समूह जामें ऐसी जो
विशल्यकरनी औषधि है ताहीको लै चल्यो है अथवा ज्वालमाली जे अग्नि हैं
तिनको लै चल्यो है कीर्तिमाली हनूमानको विशेषण है ॥ ५३ ॥ औ प्रातहि
कहे सूर्योदय होतही लक्ष्मणको काल कहे मृत्यु जीमें बिचारचो है सो अंशुमाली
जे सूर्य हैं तिनको संहारि कहे मारिकै सूर्यके अंशु कहे किरण अथवा प्रभाव लिये
जात हैं जामें सूर्योदय ना होइ ॥ “अंशुः प्रभाकिरणयोरिति” मेदिनी ॥५४॥
मू०-बिनापत्रह्वैयत्रपाला शफूले।रमैंकोकिलासीभ्रमैंभौरभूले ॥
सदानंदरा मैंमहानंदकोलै । हनूमंतआयेबसंतैमनोलै ॥ ५५ ॥

( १८२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोटनकछंद ॥ ठाढेभयेलक्ष्मणमूरिछिये । दूनीशुभशोभशरी
रलिये ॥ कोदंडलियेयहबातररै । लंकेशनजीवितजाइधरै ॥
॥ ५६ ॥ श्रीरामतहींउरलाइलियो । सूंघ्योशिरआशिष-
कोटिदियो ॥ कोलाहलयूथपयूथकियो ॥ लंकाहहलीदश-
कंठहियो ॥ ५७ ॥
इति श्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांलक्ष्मणमूर्च्छामोचनं
नामसप्तदशः प्रकाशः ॥ १७ ॥
टी०-यत्र जा पर्वतमें औषधीवृंद नहीं हैं विनापत्र फूले पलाशके वृक्ष
हैं या प्रकार भूले कोकिलनकी आली पंगती रमती हैं औ जामें भ्रमें कहे
घूमत हैं बसंत कैसो है कि यत्र कहे जामें विनापत्र पलाश फूलि रहेहैं औ
जामें कोकिलावली रमती हैं औ भूले कहे उन्मत्ततासों देहकी सुधि बिसराये
मौर भ्रमत हैं यामें (श्लेषोत्प्रेक्षा) है सो सदानन्द जे राम हैं तिनके महानंदके
लिये हनूमान मानो बसंत ही ल्याये हैं बसंतको देखि सबको आनंद होत है
तासों अथवा जैसे राजनके इहां आनंदार्थमाली वसंत बनाइकै लैजात हैं तैसे
मानो रामचन्द्रके महाआनंदको हनूमान बसंतको रूपही बनाइ ल्याये हैं ॥५५॥
मूरि जो औषधि है ताको छिये कहे छुये सों ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद-
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां सप्तदशः प्रकाशः ॥ १७॥
मू०-॥ दोहा ॥ अष्टादशप्रकाशमें, केशवदासकराल ।
कुम्भकर्णकोबर्णिबो, मेघनादकोकाल ॥ १ ॥ दोधकछंद ॥
रावणलक्ष्मणकोसुनिनिके । छूटिगयेसबसाधनजीके । रेसुत
मंत्रिविलंब न लावो । कुंभकरन्नहिजाइजगावो ॥ २ ॥ राक्षस
लक्ष्मणसाधनकीन्हे । दुंदुभिदीहबजाइ नवीने ॥ मत्तअमत्त
बडेअरुबारे । कुंजरपुंजजगावतहारे ॥ ३ ॥ आइजहींसुरना-

अष्टादशप्रकाशः १८. (१८३)
रिसभागीं । गावनबीनबजावनलागीं ॥ जागिउठोतबहींसुर
दोषी । क्षुद्रक्षुधाबहुभक्षणपोषी ॥ ४ ॥
टी०-कुम्भकर्णको औ मेघनादको काल कहे मृत्यु वर्णिवो ॥ १ ॥ साधन
कहे जयसिद्धिके उपाय ॥ २ ॥ साधन कहे जगाइवेको यत्न ॥ ३ ॥ यह
महादेवसे वर रह्यो हैं कि देवांगननको गान सुनि कुंभकर्ण अकालहूमें जागि है
तासों जब देवांगना आइ गावन लागीं तब जाग्यो ॥ यथा ॥ हनुमन्नाटके ॥
“निद्रां तथापि न जहाँ यदि कुंभकर्णः श्रीकंठलब्धवरकिन्नरकामिनीनाम् ॥
गंधर्वयक्षसुरासिद्धवरांगनानामाकर्ण्य गीतममृतं परमं विनिद्रः” ॥ ४ ॥
म०-नराचछंद ॥ अमत्तमत्तदंतिपंक्तिएककौरकोकरै । भु-
जापसारिआसपासमेयबोपसंहरे ॥ बिमानआसमानकेजहां
तहांभगाइयो । अमानमानसोदिवानकुंभकर्णआइयो ॥ ५ ॥
रावण ॥ समुद्रसेतुबांधिकैमनुष्यदोइआइयो ॥ लियेकुचालि
वानरालिकंकअंकलाइयो ॥ मिल्योबिभीषणौनमोहितोहिंनें-
कहूडरेउ । प्रहस्तआदिदैअनेकमंत्रिमित्रसंहरेउ ॥ ६ ॥ करो
सोकाजआशुआजचित्तमैं जोभावई । असुरूयहोइजीवजीव
शुक्रसुख्यपावई ॥ समेतिरामलक्ष्मणैसोबानरालिभक्षिये ।
सकोसमंत्रिमित्रपुत्रधामग्रामरक्षिये ॥ ७ ॥
टी०-मान (गर्व) दिवान (सभा) ॥ ५॥ बानरालिको लंकके अंक कहे
गोदमें लायो है अर्थ लंकके मध्यमें प्राप्त कियो है अथवा जो पुरी काहू कबहूं न
घेरचौ ताको घेरिकै अंक कहे कलंक लायो है यामें रामचंद्रके बलको वर्णन है
निंदा नहीं हैं तासों सरस्वती उक्तार्था नहीं कियो ॥ ६ ॥ ऐसो काज करौ जासों
देवतनको विघ्न हो जीव जे बृहस्पति हैं ते असुरूय होइ औ हमारो जय होइ
शुक्र सुख पावैं सरस्वती उक्तार्था राम लक्ष्मण समेत या बानरालिको भक्षिये
कहे भक्षण करि सकियत है अर्थ नहीं भक्षण करि सकियत काहेते अनेक नर
वानर हम भक्षण करे हैं इनको सेतुबंधनादि कर्म देखिकै हमारो जीव अति डरो
है ताते कोष कहे खजाना सहित मंत्र्यादिकनको रक्षिये कहे रक्षण करि सकित
है अर्थ नहीं रक्षण करि सकियत अर्थ ये हमको सबको मारि ग्रामादि लेन
चाहत हैं ॥ ७ ॥

( १८४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-कुंभकर्ण-मनोरमाछंद ॥ सुनियेकुलभूषणदेवविद्वेष-
ण । बहुआजिविराजिनकेतुमपूषण ॥ भवभूपजेचारिपदार-
थसाधत । तिनकोकबहूंनहिं बाधकबाधत ॥ ८ ॥ पंकजबा-
टिकाछंद ॥ धर्मकरतअतिअर्थबढावत । संततिहितरतिको-
विदगावत । संततिउपजतहीनिशिबासर । साधततनमनमुक्ति
महीधर ॥ ९ ॥
टी०-बहुतै जे हैं आजि कहे समरनके बिराजी कहे शोभनहार अर्थ
अनेक समरकर्ता तिनके मध्यमें तुम पूषण पाठ है तहाँ अर्थ कि बहुत जे
आजिविराजी संग्रामकर्त्ता हैं तिनके तम पूषण कहे तमको मूषण सम हौ अर्थ सूर्य
तमको नाश करत है तैसे तुम संग्रामकर्त्ता जे शत्रु भट हैं तिन्हें नाश करत हो
चारि पदार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, ॥ ८ ॥ चारों पदार्थनके साधिबेको समय
कहत हैं कि महीधर जे राजा हैं ते सन्तत कहे निरंतर धर्महू करत हैं औ संतति
अर्थ द्रव्यहूको बढावत हैं अथवा धर्मको करत अर्थ बढावत हैं अर्थ सतरीतिसों
अर्थ बढावत हैं औ संततहित हैं रतीस्त्री भोग अर्थ काम साधन जिनको ऐसे
कोविद गावत हैं अर्थ ये तीन्यों एकही समयमों साध्य हैं औ जब संतति कहे
पुत्र उत्पन्न भयो तब निशि औ बासर तन औ मन करिकै मुक्तिको साधन
करत हैं आजतक तुम अर्थ, धर्म, कामको साधन कीन्हों अब तुम्हारो पुत्र
समर्थ है ताको सब राजभार सौंपि सीताको रामचंद्रको दैकै हेतु करि मुक्ति
साधन करौ इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ राजाअरुयुवराजजग, प्रोहितमंत्रीमित्र ।
कामीकुटिलनसेइये, कृंपणकृतघ्नअमित्र ॥१०॥ घनाक्षरी ॥
कामीबामीझूठक्रोधीकोंढ़ीकुलद्वेषीखलुकातरकृतघ्नीमित्रदोष-
द्विजद्रोहीये । कुपुरुषकिंपुरुषकाहलीकलहीक्रूरकुटिलकुमंत्री-
कुलहीनकेशौठोहिये ॥पापीलोभीशठअंधबावरोबधिरगूंगाबौ-
नाअविवेकीहठीछलीनिरमोहिये।सूमसर्वभक्षीदैववादीजोकुबा-
दीजड़अपयशीएसोभूमिभूपतिनसोहिये ॥ ११ ॥

अष्टादशप्रकाशः १८. ( १८५ )
टी०-ये पाँचों गजादि इन दूषण सहित होहिं तौ सेवनके योग्य नहीं योग
नहीं होत, अथवा यथाक्रममोंजानो राजा कामी काहेते उचितानुचित विचार बिना
सुन्दरी देखि प्रजाजनकी स्त्रिनको गहि मंगावतहैं तासों देश उजार होतहै औ
युवराज कुटिल काहेते मंत्र्यादिकनमां विरोध राज्यविध्वंस करतहैं औ मोहित
कृपण कहे दरिद्र काहेते विवाहादि समयमों द्रव्य लोभ वश वेदविहित घटचादि
विताइ अमंगल करत हैं अथवा शत्रुओं कछु द्रव्य पाइ मरणादिके लये राशि
नाम बतावत हैं औ मंत्री कृतघ्नी काहेते स्वामीको कृत विसारि शत्रुओं मिलि
राज्य छोडावैं औ मित्र अमित्र कहे हृदयमों भलो ना चाहै काहेते कछू गूढ
मंत्र कहै सो शत्रु पास पहुँचावै ये पाँचौं इन पाँचहुन दोष सहित सेवन योग
नहीं होत यासों या जनायो कि तुम राजा हौ तुम्हें ऐसो काम साधन ना
चाहिये जासों ईश्वर जे रामचंद्र हैं तिनकी स्त्रीको हरि ल्यायो हौ ॥ १० ॥
वामी (वाममार्गी) कुपुरुष कहे पुरुषार्थ रहित किंपुरुष कहे कुछुहै पुरुषकी
आकृति जिनकी काहला (रोगी) दैववादी कहे जे भाग भरोसे रहत हैं याहूमें
या जनायो कि तुमको ऐसो कामसाधन ना चाहिये ॥ ११ ॥
मू०-निशिपालिकाछंद ॥ बानरनजानुसुरजानुशुभगाथ-
हैं ॥ मानुषनजानुरघुनाथजगनाथहैं । जानकिहिदेहुकारि
नेहुकुलदेहुसो ॥ आजुरणसाजपुनिगाजुहँसिमेहुसो ॥ १२ ॥
रावण-दोहा ॥ कुंभकरणकरियुद्धकै,सोइरहौघरजाइ।वेगिबि-
भीषणज्योंमिल्यो,गहौशत्रुकेपाइ ॥१३॥ मंदोदरी-दो०॥ इंद्र-
जीतअतिकायसुनि, नरांतकसुखदाइ । भयनसोंप्रभुझुकतहैं,-
क्यों नकहौसमुझाय ॥ १४ ॥ मंदोदरी-चंचलाछंद ॥ देव- :
कुंभकर्णकेसमानजानियेनआन। इन्द्रचंद्रबिष्णुरुद्रब्रह्मकोहरे
उगुमान ॥ राजकाजकोकहैजोमानियेसोप्रेमपालि। कचलीन-
कोचलेनकालकीकुचालिचालि ॥ १५ ॥
टी०-कुल औ देहसों नेह करिकै जानकीको देहु यह कहि या जनायो कि
ना देहौ तौ रामचंद्र तुम्हारे कुलके सहित तुम्हारो नाश करि हैं ॥ १२ ॥ कारि
कहे करौ ॥ १३ ॥ झुकत कहे रिस करत है भयनसों बहुवचन कहि या जनायो

( १८६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

कि एक भाई बिभीषण समुझावन लाग्यौ ताको लात मारचो अब वैसेही कुंभ
कर्णसों रिस करत हैं ॥ १४ ॥ देव रावणको संबोधन है जो बात कुंभकर्ण
कहत है सो राजाके काजके हितको कहत.है ताहि प्रेमको पालिकै कहे हित
करिकै मानिये अर्थ सीताको दै कै रामचंद्रसों हित करौ काहेते काल जो
समय है ताकी जो कुचालि कहे प्रतिकूलता है तामें चालि कहे चाल युद्धा-
दि उत्कृष्ट कर्म रहित विचार युक्त निजहितसाधक कार्य कृत्यकै पूर्व नहीं चल्यो
को अब नाहीं चलत अर्थ जे पूर्व भये हैं तिन चल्यो है अब जे होत जात हैं
ते चलत हैं जब आपनो समय टेढो होत है तबशत्रु मिलनादि कार्य करिबो
संधिबो अनुचित नहीं है इति भावार्थः ॥ अथवा कालकी जो कुचालिं है ताकी
जो चलि कहे चालु है अर्थ जब आपनो काल प्रतिकूल भयो ता समयमों जो
कार्यसाधक उचित चाल है ॥ १५ ॥
मू०-विष्णुभाजिभाजिजातछोड़िदेवताअशेष । जामदग्न्य
देखिदेखिकैनकीननारिवेष ॥ ईशरामतेबचेबचेकबानरेशबा-
लि । कैंचलीनकोचलैनकालकीकुचालिचालि ॥ १६॥ बि-
जयाछंद । रामहिंचोरिनदीन्हींसियाजितकेदुखतोतपलीलि-
लियोहै । रामहिंमारनदीहोंसहोदररामहिंआवनजानदियोहै
॥ देहधरचौतुमहींलगिआजुलोंरामहिंकेपियज्यायेंजियोहै ॥
दूरिकर्योद्विजताद्विजदेवहरेहीहरेआततायीकियोहै ॥ १७ ॥
टी०-कालकी कुचालिमें चालु कै चली है सोकहत हैं देवदानवनके युद्धमें
देवतनके सहायको विष्णु जात हैं परन्तु जब जानत हैं कि दैत्यनको समय
सहायक है हमको कुटिल है हम इनसों ना जीति हैं तब यशकी सुधि भुलाइ
आपने प्राणनकी रक्षाके लिये भागि जात हैं या प्रकार कयोवारकी कथा पुराण-
नमें प्रसिद्ध है यासों या जनायो कि विष्णुसों बली कोऊ नहीं है तेऊ समय
बिचारि गौं साधि जात हैं औ जामदग्नि जे परशुराम हैं तिनको देखिकै कै क्षत्री
नारिको वेष नहीं धरचो यासों या जनायो कि जब परशुरामको समय रह्यो तब
बडे बडे क्षत्री समय विचारि नारिको वेष धरि जीव बचायो औ तेई परशुराम
ताही क्षत्रीवंशमें उत्पन्न जे रामचन्द्र हैं तिनको समय बली बिचारि आपनो
धनुषबाण दै हेतु करचो तासों हेईश ! रामचन्द्रको समय बली है सो सीताको

दैके हेतुरूपी जो बचिवेको उपाय है तासों बचो काहेते बालि बली रहे तिन
बचिबेको उपाय न कियो ते न बचे मारेही गये चौथो तुमकों अर्थ पाछेके
छंदमें कह्यो है ॥ १६ ॥ आवन जान दियो अर्थ युद्धमंडलमें आवन दियो फेरि
युद्ध मंडलसों फिरि जानदियो स्त्रीहर्तादिक छह आततायी कहावत हैं यथा
भागवते ॥ "अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः॥ क्षेत्रदारापहश्चैव षडेते आतता-
यिनः"॥ आततायी ब्राह्मणहू होइ ताके वधसों ब्रह्मदोष नहीं है तासों ॥ १७ ॥
मू०-दोहा ॥ संधिकरोविग्रहकरो सीताकोतोदेह । गनौ न
पियदेहिनमें, पतिव्रताकीदेह ॥ १८ ॥ रावण-विजयाछंद ॥
हौंसतुछांडिमिलौँमृगलोचनिक्योंक्षमिहैंअपराधनये ॥ नारि
हरीसुतबांध्योतिहारेहौंकालिहिसोदरसाँगिहये । बामनमांग्यो
त्रि पैगधरादक्षिणाबलिचौदहलोकदये ॥ रंचकबैरहुतोहरिवंच
कबांधिपतालतऊपठये ॥ १९ ॥ दोहा ॥ देवरकुम्भकरन्नसों
हरिअरिसोंसुतजाइ । रावणसोंप्रभुकौनको,मंदोदरीडेराइ २०
टी०-पतिव्रता जे स्त्री हैं तिनकी देह स्वरूप देहिनमें न गनौँ ॥ १८ ॥ अप-
राधन ये कह्यो तासों बलिको प्राचीन बैर जानों अर्थ हिरण्यकशिपुके रंचक बैर
सों बलिको बांधि पाताल पठायो ॥ १९ ॥ २० ॥
मू०-चामरछन्द ॥ कम्भकर्णरावणैंप्रदक्षिणाहिंदैचल्यो ।
हाइहाइह्वैरह्योआकाशआशुहीहल्यो । मध्यक्षुद्रघंटिकाकिरीट
संगशोभनो । लक्षपक्षसोकलिन्द्रेइन्द्रकोचढ्योमनौँ ॥ २१ ॥
नाराचछंद ॥ उडैँदिशादिशाकपीशकोरिकोरिश्वासहीँ। चपैँच-
पेटपेटबाहुजानुजंघसोतहीँ।। लियेहैंऔरऐँचिएँचिबीरबाहुबात-
हीँ। भषेतेअन्तरिक्षरिक्षलक्षलक्षजातहीँ॥२२॥कुम्भकर्ण-भुजं-
गप्रयातछन्द ॥ नहौँताडुकाहौँसुबाहैनमानों । नहौंशंभुकोदंड
सांचीबखानों ॥ नहौँतालमालीखरैजाहिमारो । नहौंदूषणौसि-
न्धुसूथोनिहारो ॥२३॥सुरीआसुरीसुन्दरीभोगकर्णै । महाका-

( १८८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

लकोकालहौंकुम्भकर्णौ।सुनौरामसंग्रामकोतोहिंबोलौं। बढ़यो
गर्वलंकाहिआयेसोखोलौं ॥ २४ ॥
टी०-लक्ष विधिको जो पक्ष कहे विरोध है तासों अर्थ बड़े विरोधसों
अथवा लक्ष विधिको जो पक्ष कहे बलहै तासों अर्थ बड़े बलसों इहां लक्ष
शब्द अधिकार्थमें है । "पक्षो मासार्थके पार्श्वगृहे साध्य विरोधयोः॥ केशादेःपरतो
वृंदे बले सखिसहाययोः" इतिमेदिनी ॥ २१ ॥ जे लक्षण ऋक्ष भयसों अन्तरि-
क्षको जात हैं तिन्हें बाहँके वात वायुसों खैंचिकै भषे खाइ डारचो ॥ २२ ॥
द्वै छन्दको अन्वय एक है खरै कहे खर राक्षसै सूधो निहारो अर्थ कपिनको
मूधो समझिकै मारन वेधन करचो सरस्वती उक्तार्थः ॥ मेरी ओर इनसम
शत्रु दृष्टिसों ना निहारो सूधो कहे कृपा दृष्टिसों निहारो अथवा मोंको सूधो कहे
शत्रुभावरहित आपनो दास निहारो सरस्वती उक्तार्थः ॥ लंकामें आयेते जो
तुम्हारे गर्व बढ़्यो है ताहि खोलौं कहे प्रसिद्ध करौं आशय कि जब मोको
मारिहौ तब तुम्हारो बलादिको जो गर्व है सो सब प्राणिनमें
प्रसिद्ध है है ॥ २३ ॥ २४ ॥
मू०-उब्योकेशरीकेशरीजोरछायो । बलीबालिकोपूतलैनी-
लधायो ॥ हनूमन्तसुग्रीवसाभसभागे । डसैडांससेअंगमातंग
लागे ॥ २५ ॥ दशग्रीवकोबंधुसुग्रीवपायो । चल्योलंकमेलैभ-
लेअंकलायो। हनूमन्तलातैंहत्योदेहभूल्यो। छुट्योकर्णनाशा-
हिलैइन्द्रफूल्यो॥ २६॥ सँभारचोधरीएकद्वैमेंमरालै। फिरचो
रामहींसामुहैंसोगदालै ॥ हनूमन्तजूपूंछसोंलाइलीन्हों। नजा-
न्योंकबैसेसिंधुमेंडारिदीन्हों ॥ २७ ॥
टी०-केशरी नामा वानर केशरी कहे सिंहके जोरसों छायो उठ्यो अथ
सिंह सम गर्जिकै शीघ्र चल्यो ॥ २५ ॥ इन्द्रसम सुग्रीव फूल्यो सुखी
भयो ॥ २६ ॥ २७ ॥
मू०-जहींकालकेकेतुसोंताललीनो । करयोरामजूहस्तपा-
दादिहीनो ॥ चल्योलोटतैंधाइबकैंधाचाली।उड़्योमुंडलैबाण
ज्योंमुंडमाली ॥ २८ ॥ तहींस्वर्गकेदुंदुभीदीहबाजैं । करयो

पुष्पकीवृष्टि जैदेवगाजैं ॥ दशग्रीवशोकग्रस्त्योलोकहारी । भयो
लंकहीमध्यआतंकभारी॥२९॥ दोहा ॥ तबहींगयोनिकुंभिला,
होमहेतइन्द्रजीत ॥ कह्योतहांरघुनाथसों, मतोबिभीषणमीत-
॥ ३० ॥ चंचरीछंद ॥ जोरिअंजुलिकोबिभीषणरामसोंविन-
तीकरी । इंद्रजीतनिकुंभिलागयोहोमकोरिसजीभरी॥ सिद्धहो
मनहोइजौलगिईशतौलगिमारिये। सिद्धहोहिप्रसिद्धहैयहसर्व-
था हम हारिये ॥ ३१॥ दोहा॥ सोई बाहिहितैकिनर,वानरऋक्षजो
कोइ ॥ बारहवर्षक्षुधातृषा, निद्राजितेहोइ ॥ ३२ ॥ चंचरीछं
द॥ रामचन्द्रविदाकरयोतबवेगिलक्ष्मणवीरको। त्योंबिभीषण
जामवंतहिंसंगअंगदधीरको ॥ नील लैनलकेशरीहनुमंतअंतक
ज्योचले । वेगिजाइनिकुंभिलाथलयज्ञके सिगरेदले ॥ ३३ ॥
टी०-तालवृक्षादिपदतें आयुधै

(१९०) रामचन्द्रिका-सटीक ।

भसोदरमेरे । कहिकौनकौनसुमिरौंगुणतेरे ॥ ३७ ॥ दोहा ॥
नींदभूखअरुप्यासको,जौनसाधतेबीर। सीतहिक्योंहमपावते,
सुनुलक्ष्मणरणधीर ॥ ३८ ॥
इतिश्रीमत्सकलो कलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रच-
न्द्रिकायामिन्द्रजिद्विरिचितायामिन्द्रजिद्वधवर्णनं
नामाष्टादशः प्रकाशः ॥ १८ ॥
टी०-लक्ष्मणसों कैसे जाय भिरयो भय जो डरहै साही कहे हृदयसों हरयो कहे
दूरि भयो है जाके ऐसो जो गर्बादि करिके अंध कहे आंधरो अंधक नाम दैत्य है
सो जैसे भव जे महादेव हैं तिनसों युद्धमें जुरयो है अर्थ जैसे महादेवसों निर्भय
अंधक लरचो तैसे लक्ष्मणसों इन्द्रजीत लरतभयो ॥ ३४ ॥ एक एक कहे एक-
को परस्पर अनेक शर मारत हैं अर्थ लक्ष्मणको मारत हैं ते शर दुहूनके अंगनमें
मंदरमें जलबुंदसम परत हैं अर्थ अतिबलीनतासों कछू पीडा नहीं करत उद्धरचो
काढचो ॥ ३५ ॥ साथकी कहे जो अर्चाकी विधि संगमें लै आये रहें कहूं
शुभगाथकी पाठ है तौ शुभगाथ कहे लक्ष्मण ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
इतिश्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकी जानिप्रसादायजनजानकी प्रसाद-
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायामष्टादशः प्रकाशः ॥ १८ ॥
मू०-॥ दोहा ॥ उनईसयेंप्रकाशमें, रावणदुःखनिधान ॥
जूझैगोमकराक्षपुनि, हैहैदूतबिधान ॥ १ ॥ रावणजैहैगूढथल,
रावरलुटैबिशाल ॥ मंदोदरीकढोरिबो, अरुरावणकोकाल॥२॥
मोतनकछंद ॥ देख्योशिरअंजुलिमैंजबहीं । हाहाकरिभूमिप-
रचोतबहीं ॥ आयेसुतसोदरमंत्रि तबै । मंदोदरित्योंतियआई
सबै ॥ ३ ॥ कोलाहलमंदिरमांझभयो । मानौं प्रभुकोउडिमा-
णगयो ॥ रौवैदशकंठबिलापक रै। कोऊनकहूंतनधीरधरै ॥४॥
रावण-दंडक ॥ आजुआदित्यजलपवनपावकप्रबलचंदआ-
नंदमयतापजगकोहरौं । गानकिन्नरकरहुनृत्यगंधर्वकुलयक्ष
बिधिलक्षउरयक्षकद्मधरौं ॥ ब्रह्मरुद्रादिदेवेवत्रैलोककेराजको

यहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी प्रतिलिपि (transcription) दी गई है:

एकोनविंशप्रकाशः १९. (१९१)
जायअभिषेकइन्द्रहिकरौं । आजुसियरामदैलंककुलदूषणहिं
यज्ञकोजायसर्बज्ञविप्रनवरौं ॥ ५ ॥ महोदर-तोटक ॥ प्रभुशो-
कतजौतनधीरधरौ । सकशत्रुबधोसोविचारकरौ ॥ कुलमेंअब
जीवतजोरहिहैं । सबशोकसमुद्रहिसोबहिहैं ॥ ६ ॥
टी०-दुःखको निदान कहे बडो दुःख ॥ १ ॥ रावरे खिनके रहिबेको घर,
कठोरिबो कहे केशादि पकरि निर्दय खेंचिबो ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ इंद्रजीतके मरे
रावण बडे दुःखसों संयुक्त है ऐसे बिलाप वचन कहत भयो कि जो इन्द्रजीत
मस्यो तो मोंहूं मरतही हौं तासों मेरे डरसों जे बातें जन नाहीं करत रहे ते सब भयको
छोडिकै आपने आपने भाये काज करौ कपूर औ अगरु औ कस्तूरी औ कंकोल
मिलाइ यक्षकर्दम होत है सो यक्षनको अति प्रिय है अंगनमें लेप करत हैं ॥ “कर्पूरा
गुरुकस्तूरीकंकोलैर्यक्षकद्‌मः” ॥ औ सीता राम मिलिकै कुलदूषण (विभीषण)
को लंका दैकै सर्वज्ञ ब्राह्मणनको यज्ञको निवारो कहे अवकाश देहिं ॥ ५ ॥
अतिदुखमें धैर्यके बचन कहिबेको उचित है तासों महोदर, मंदोदरी धीर धराइ-
बेके बचन कहति हैं जा उपायसों शत्रु बधो सक कहे सकें अर्थ शत्रु मास्यो जाय सो
विचार करौ सबंके मरेको जो शोक है ताके समुद्रमें बह्यो करि है ॥ ६ ॥
मू०-मंदोदरी-चौपाई ॥ सोदरजुझ्योसुतहितकारी । को
गहिहैलंकागढभारी ॥ सीताहिँदैकैरपुहिँसँहारौ । मोहतिहैवि-
क्रमबलभारौ ॥ ७ ॥ रावण ॥ तुमअबसीतहिदेहुनदेहू । बिन
सुतबंधुघरौंनाहिँदेहू ॥ यहितनजोतजिलाजहिरेहौं । वनबसि
जाइसबैदुखसैहौं ॥ ८ ॥ मकराक्ष-भुजंगप्रयातछंद ॥ कहाँ
कुंभकर्णौंकहाइन्द्रजीतै । करैसोइबौवैकरैयुद्धभीतै ॥ सुजौलौं
जिऔंहौंसदादासतैरो । सियाकोसकैदैलुनौँमंत्रमेरो ॥ ९ ॥
टी०-यह जो तुम्हारो भारी लंकागढ है ताहि कौन गहि है कहे लै सकि
है अर्थ लंकागढ शत्रुके लेवे लायक नहीं है विक्रम कहे यत्न बलकहे शक्तिको
मोहति है कहे मूर्च्छित करति है अर्थ तुम्हारो यत्न औ बल निष्फल होतहै सो
याहीके दुःख प्रभावसों ॥ ७ ॥ ८ ॥ भीत युद्ध कहि या जनायो कि बाण बेद्-
नादि भय सों अंतर्धान है युद्ध करि हैं सरस्वती उक्तार्थः ॥ वै आपने बलसों
सबको मारि सीताको लै हैं इति व्यंग्यार्थः ॥ ९ ॥

( १९२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मू०-महाराजलंकासदाराजकीजै । करौंयुद्धमेरीविदावेगि
कीजै ॥ हतौंरामस्योवंधुसुग्रीवमारौं । अयोध्याहिलैराजधानी-
सुधारौं ॥ १० ॥ बिभीषण-बसंततिलकाछंद ॥ कोदंडहाथ
रघुनाथसँभारिलीजै । भागेसबैसमरयूथपदृष्टिदीजै ॥ बेटाब-
लिष्ठखरकोमकराक्षआयो । संहारकालजनुकालकरालधायो ॥
॥ ११ ॥ सुग्रीवअंगदवलीहनुमंतरोंक्यो । रोंक्योरह्योनरघु-
बीरजहींबिलोक्यो ॥ मारचोबिभीषणगदाउरजोरठेली । का-
लीसमानभुजलक्ष्मणकंठमेली ॥ १२ ॥ गाढ़ेगहेप्रबलअंगनि-
अंगभारे । काटेकटैनबहुभांतिनकाटिहारे ॥ ब्रह्मादयोवरहि
अस्त्रनशस्त्रनलागै । लैहीचल्यौसमरसिंहहिजोरजागै ॥१३॥
गाढ़ांधकारदिविभूतललीलिलिन्हो । ग्रस्तास्तमानहुंशशीकहँ
राहुकीन्हो ॥ हाहादिशब्दसबलोगजहींपुकारे॥बाढेअशेषअँ-
गराक्षसकेबिदारे ॥ श्रीरामचन्द्रपगलागतचित्तहर्षे । देवाधि-
देवमिलिसिद्धनपुष्पवर्षे ॥ १४ ॥
टी०-सरस्वती उक्तार्थः ॥ काकूक्तिसों कहत हैं कि हे महाराज ! अब
लंकामें तुम सदा राज किया करौ महाराज पद कहि या जनायो कि मंत्रको
त्याग करि प्रभुतासों अपने मनहीं की बात करचो औ जैसे कुंभकर्णादिकनकी
सबकी बिदा कियो है तैसे मेरीहू बिदा करौ हौं युद्ध करौं जाइ औ तुम्हारी
आज्ञा के सदृश जैसे कुंभकर्णादिकन बंधु सहित राम औ सुग्रीवको मारि राज-
धानी अयोध्यामें सुधारचो है तैसे हौंहूं बंधु सहित राम औ सुग्रीवको मारिकै
राजधानी अयोध्यामें सुधारौं जैसे सब मरिगये हैं तैसे हौंहूं मरौं जाइ इति
व्यंग्यार्थः ॥ १० ॥ ११ ॥ विभीषण गदा मारचो ताको उरके जोरसों ठेलिकै
लक्ष्मणके कंठमें कालसर्पके समान भुजा मेलत भया ॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-दोहा ॥ जूझतहीमकराक्षके, रावणअतिदुखपाइ । स-
त्त्वरश्रीरघुनाथपै, दियोवसीठपठाइ ॥ १५॥ सुंदरीछंद ॥ दूत-
हिदेखतहीरघुनायक । तापहँबोलिउठेसुखदायक ॥ रावणके

एकोनविंशप्रकाशः १९. ( १९३ )
कुशलीसूतसादर । कारजकौनकरैअपनेघर ॥ १६ ॥ दूत-वि
जयछन्द ॥ पूजिउठेजबहींशिवकोतबहींविधिशुक्रबृहस्पति
आये । कैविनतीमिसकश्यपकेतिनदेवअदेवसबैबकसाये ॥
होमकीरीतिनईसिखईकछुमंत्रदियोश्रुतिलागिसिखाये । हौँइ-
तकोपठयोउनकोउतलैप्रभुमंदिरमांझसिधाये ॥ १७ ॥
टी०-कि शशीको दिवि आकाशते भूतलमें पाइकै अर्थ स्थानच्युत (अवल)
जानिकै स्वाभाविक शत्रुतासों गाढो कहे बहुत जो अंधकार है ताने लीलिलियो
है औ कि राहूने ग्रस्तास्त कीन्हो है शशीसम लक्ष्मण है अंधकार औ राहुसम
मकराक्ष है जब मकराक्षको शस्त्रास्त्रसों मरण ना जान्यो तब हाथनसों कसिकै
गाढे जो गहे रहै ताही समय शीघ्रतासों लक्ष्मणजी वाढ कहे स्थूलकाय हैं कै
राक्षसके अशेष संपूर्ण अंग विदारै कहे विदीर्ण कीन्हे अर्थ फारि डारे ऐसी शीघ्र
तासों लक्ष्मणजू आपने अंगस्थूल किये कि मकराक्ष जो हस्तग्रहण करे रहे सो
हस्तग्रहण ना छूटन पायो तासौं वक्षस्थल फाटि गयो अधिदेव गन्धर्वादि औ
आदि देव पाठ होइ तौ ब्रह्मादि जानौ यह छन्द छै चरणको है ॥१५॥१६॥
सत्वर कहे शीघ्र बसीठ ( दूत ) पूछौ कि रावण कौन कारज करत हैं ताको
जवाब रावणके प्रभावको देखावत चतुरतासों दियो जब रावण देव औ अदेव
सबके नाश करिबेके लिये शिव जे महादेव हैं तिनको पूजन करिकै उठे हैं कि
ताही क्षण अति डर मानिकै विधि ( ब्रह्मा ) औ शुक्र औ बृहस्पति ये तीनों
आइकै कश्यपके व्याजसों विनती करिकै देव औ अदेव सब बकसाये कहे
मांगि लीन्हें अर्थ ब्रह्मादिकन आइ यह कह्यो कि कश्यप यह विनती कर्यो है
कि देव औ अदेवनको हमको वकसीस देव अर्थ इनको नाश ना करौ इहां
अदेव पदते जे देवतनते अतिरिक्त प्राणी हैं दैत्य मनुष्यादि ते सब जानौ यासों
या जनायो कि जब रावण शिवकी पूजा करत है तब संहार करिबेकी
शक्ति प्राप्ति होति है औ देव अदेवनको बकसाइकै कछू नई होमकी रीति सिखा-
यो औ श्रुति (कान) में लागिकै कछू मंत्र दीन्हों याके आगे मोहिं या ओर पठायो
औ ब्रह्मादिकनको लैके प्रभु जो रावण है सो मंदिरको गया कहिबेको हेतु या
जामें रामचन्द्र जानैं कि हमप्रति कोपसों रावण सब देव औ अदेवको नाश
करिबेको चाह्यो तिनको बकसाइ ब्रह्मादिकन कछु हमारि ही हानि हेत होम औ
मंत्र सिखायो है ॥ १७ ॥
१३

( १९४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
मू०-दूत-संदेश ॥ सूर्पणखाजोबिरूपकरीतुमतातकियोह-
महूंदुखभारो। बारिधिबंधनकीन्होंहुतोतुममोसुतबंधनकीन्होंति
हारो॥होइजोहोनीसोहोइहीरहैनमिटैजियकोटिबिचारबिचारो।
दैभृगुनंदनकोपरशारघुनंदनसीतहिलैपगुधारो ॥ १८ ॥ दोहा ॥
प्रतिउत्तरदूतहिदियो, यहकहिश्रीरघुनाथ ॥ कहियोरावणहो
हिं जब, मंदोदरिकेसाथ ॥ १९ ॥ रावण-संयुताछंद ॥ कहिधौं
बिलंबकहाभयो । रघुनाथपैजबतूगयो ॥ कहिभांतितूअवलो-
कियो । कहुतोहिंउत्तरकादियो ॥ २० ॥
टी०-सीताको हरिकै तुमको दुख दीन्हों अथवा सीताहीको भारी दुख
दीन्हों परशुराम तौ धनुषबाण दियो है इहां रावण परशा माग्यो तहां या जान्यो
कि रावण सुन्यौ है कि रामचंद्र परशुरामको हथियार छोरि लीन्हों है औ
परशुरामको मुख्य हथियार परशाही है तासों परशा जान्यों ॥ १८ ॥ रामचंद्र
मंदोदरीकी बुद्धिकी स्तुति बिभीषणसों सुन्यौ है तालिये मंदोदरीके साथ
कह्यो है अर्थ जो मंदोदरी इन बचननको सुनि है तो समय बिचारि ग्लानि दै
रावणको लरिबेको पठाइ है अथवा जा मंदोदरी सहित रावण दुख पावै अथवा
कुंभकर्णादिके मरेसों रावण भीत है संधिके लिये दूत पठायो है ऐसा न होइ
कि आपही शरणमों चलि आवै जो हमको शरणागत रक्षकत्वधर्म प्रतिपालन
करि रावणको रक्षतही बनै तालिये जो मंदोदरी इन बचनको सुनि है तौ समय
बिचारि ग्लानि दै लरिबेहीके लिये पठाइ है संधिके लिये ना पठाइ है ॥१९॥२०॥
मू०-दूत-दंडक ॥ भूतलकेइंद्रभूमिबैठेहुतेरामचंद्रमारिच क-
नकमृगछालहिबिछायेजू । कुंभहरकुंभकर्णनाशाहरगोदशीश
चरणअकंपअक्षअरिरलायेजू । देवांतकनारांतकत्यौंमुसक्या
तबिभीषणबैनतनकानरूषबायेजू । मेघनादमकराक्षमहोदर-
प्राण हरबाणत्यौंबिलोकतपुरमसुखपायेजू ॥ २१ ॥ रामसंदे-
शबिजयछंद ॥ भूमिदईभुवदेवनकोभृगुनंदनभूपनसोंबरलैकै ।
वामन स्वर्गदियोमघवैसोबलीबलिबांधिपतालपैठैकै । संधि-

यहाँ दिए गए पृष्ठ का शुद्ध और पूर्ण देवनागरी लिप्यंतरण (लाइन-दर-लाइन) है:

एकोनविंशप्रकाशः १९. (१९५)
कीबातनको प्रतिउत्तरआपुनहींकहिये हितकै कै। दीन्हीं है
लंकबिभीषणको अबदेहिंकहांतुमकोयहदै कै ॥ २२ ॥ मंदो-
दरी-मालिनीछंद ॥ तबसबकहिहारेरामकोदूतआयो । अब-
समुझिपरीजोपुत्रभैया जुझायो ॥ दशमुखमुखरंजीजैरामसोंहों
लरोंयों ॥ हरिहरसबहारेदेबिदुर्गालरीज्यों ॥ २३ ॥
टी०-रावण पूंछेउ कि केहिभांति तू रामचंद्रको देख्यो है ताको उत्तर यामें
दियो है कुंभहर औ कुंभकर्ण नाशहार सुग्रीव अकंप औ अक्षके अरि (हनुमान
शत्रु हैं सत्रहें प्रकाशमें कह्यो है कि ॥ जिते अकंपादि बलिष्ठ भारे संग्राममें
अंगद वीर मारे ॥ यामें विरोध होत है तासों या जनायो दूसरो अकंप रह्यो
ताको हनुमान मारयो है यथा वाल्मीकीये "स चतुर्दशभिर्वाणैर्निशितैर्देहदारणैः।
निर्बिभेद महावीरो हनुमंतमकंपनः । ततोवृक्षसमुत्पाट्य कृत्वा वेगमनुत्तमम् ।
शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकंपनम् । यथा पद्मपुराणे ॥ जघान हनुमा-
न्यूयो चतुर्थेहन्यकंपनम् ।" औ देवांतक औ नरांतकके अंतक [अंगद] औ मेघ
नाद औ मकराक्ष महोदरके प्राणहार (लक्ष्मण) यह अति निर्भय समय स्वरूप
जानौ ॥२१॥ बर कहे बलसों या प्रकार अवतार धरि धरि हम तीनों लोक बांटि
दियो अब तुमको यह जो परशा है ताको दै कै कहा कौन स्थान देहिं जामें
तुम रहौ परशुरामकी कथा कहि या जनायो कि जिन सहस्रार्जुन तुम्हें बांधि
राख्यो तिनको हम क्षणमें मारचो बामनकी कथा कहि या जनायो कि जिन
बलिकी दामिन पालसों तुम्हें गहि कै निकारि दीन्हों तिनको बांधिकै हम
पाताल पठायो तैसे तुमहूंको मारि बिभीषणको लंका देहैं ॥ २२ ॥ शुम्भ
निशुम्भादिके युद्धमें हरिहरादि सब हारि गये हैं तब दुर्गा लरिकै मार्यो है
यह कथा मार्कंडेयपुराणमें प्रसिद्ध है ॥ २३ ॥
मू०-रावण ॥ छलक रिपठयोतोपावतो जोकुठारै ॥ रघुपति
बपुराकोधावतोसिंधुपारै ॥ हतिसुरपतिभर्ताविष्णुमायावि-
लासी । सुनहिसुमुखितोकोल्यावतो लक्षिदासी ॥ २४ ॥
चामरछंद ॥ प्रौढरूढिकोसमूँढगूढगेहमेंगयो। शुक्रमंत्रशोधि
शोधिहोमकोजहींभयो ॥ वायुपुत्रबालिपुत्रजामवंतधाइयो ।

लंकमेंनिशंकअंकलंकनाथपाइयो ॥ २५ ॥ मत्तदंतिपंक्तिबा-
जिराजिछोरिकैदई । भांतिभांतिपक्षिगनिभाजिभाजिकैगई ॥
आसनेबिछावनेबितानतानतूरियो। यत्रतत्रछत्रचारुचौरंचारु-
चूरियो ॥ भुजंगप्रयातछन्द ॥ भगीदेखिकैशांकिलंकेशबाला ।
दुरीदौरिमंदोदरीचित्रशाला ॥ तहांदौरिगोबालिकोपूतफूल्यो ।
सबैचित्रकीपुत्रिकादेखिभूल्यो ॥ २६ ॥
टी०-सिंधुके पौरै धावतो कहे भागि जातो सुरपति ( इंद्र ) तिनके भर्त्ता
रक्षक औ मायाके विलासी जे विष्णु हैं तिनको हति कहे मारिकै तोकों लक्षि
जो लक्ष्मी हैं ताको दासी ल्यावतो यासों या जनायो कि रामचंद्र जो करत हैं
सो सब परशाहीके बलसों करत हैं यामें रामचंद्रकी शक्ति कछु नहीं है ।
॥ २४ ॥ प्रौढ जो धृष्टता है ताकी रूढ़ि कहे परिपक्वता ताको समूह कहे समूह
अर्थ अति धृष्ट ऐसा जो रावण है सो यज्ञ करिबेको गूढगेहमों जात भयो
मंदोदरीकी ऐसी कटु बातें सुनि कछू लाज न कियो तासों अतिधृष्ट कह्यो ॥
"समूढःपुंजिते भुग्ने इति मेदिनी" ॥ सो शुक्रके मंत्रको शोधि कहे शुद्धोच्चार
करिकै होमके अर्थ जब उद्यत भयो तब निशंक कहे शंकाते रहित है अंक
( हृदय ) जिनको ऐसे जे वायुपुत्रादि हैं ते धावत भये तब लंकनाथके जे अंक
कहे राजचिह्न हैं छत्र चामरादि तिन्हें पायो कहे देख्यो तब जान्यो कि याही
मंदिरमें रावण है है तालिये या प्रकारको उपद्रव करचो सो आगे कहत हैं।
॥ २५ ॥ तान ( डोरी ) ॥ २६ ॥
मू०-गहैदौरिजाकोतजैताकिताको । तजैजादिशाकोभ-
जैबामताको ॥ भलीकैनिहारीसबैचित्रसारी । लहैसुंदरीको
दरीकोबिहारी ॥ २७ ॥ तजैदृष्टिकोचित्रकी सृष्टिधन्या। हँसी-
एकताकोतहींदेवकन्या ॥ तहींहासहीदेवकन्यादिखाई । गही
शंकिकैलंकरानीबताई ॥ २८ ॥
टी०-फूल्यो कहे आनन्दित जा पुतरीको अंगद दौरिकै गहत है ताको
पुतरी जानि तजत है औ अंगद जा दिशाको तजत हैं ता दिशाको बाम कहे
मंदोदरी भजति है अथवा जा दिशाको अर्थ जा दिशाकी पुतरिनको अंगद गहत

एकोनविंशप्रकाशः १९. ( १९७ )

हैं ता दिशामैं अंगदको ताकिकै देखिकै ता दिशाको तजै कहे छोड़ति है अर्थ
ता दिशाकी पुतरिनको छोड़ति है औ जा दिशाको अंगद तजत हैं ता दिशाको
मंदोदरी भजै कहे प्राप्त होतिहै अथवा भागतिहै दरी [ कन्दरा ] ॥ २७ ॥ धन्या
कहे अति निपुण जो चित्रकी सृष्टि है दृष्टिको तजै कहे त्याग कराति है अर्थ मंदो-
दरी पास दृष्टि नहीं जान देति मंदोदरीको नहीं देखन देति इति अथवा धन्या
जो चित्रकी सृष्टिहै तामैं मंदोदरीकी दृष्टिको तजै कहे त्याग करतिहै अर्थ अपने
पास नहीं आवन देति यह मंदोदरीहै ये तौ ज्ञानदृष्टिमें नहीं होत इति भावार्थः॥
या प्रकार कौतुक देखिकै अंगदको एक देवकन्या हँसत भई सो हांसीसों देवकन्या
अंगदको देखाइ कहे देखि परी तब ताहीको मंदोदरी जानि अंगद गही तब
शंकिकै ताने लंकरानि जो मंदोदरी है ताको बतायो कहूं तहीं शंकिकै पाठहै ॥२८॥
मू०-सुआनीगहेकेशलंकेशरानी। तमश्रीमनोंसूरशोभानि-
शानी ॥ गहेबाहैंऐंचेचहुंओर ताको । मनो हंसलीन्हेमृणाली
लताको ॥ २९ ॥ छुटींकंठमाला लुरैंहारटूटे । खसैंफूलफूले
लसैं केशछूटे ॥ फटींकंचुकींकिंकिणीचारुछुटी । पुरीकाम-
कीसीमनोरुद्रलूटी ॥ ३० ॥ बिनाकंचुकीस्वच्छबक्षोजराजैं ।
किधौंसांचहूश्रीफलैशोभसाजैं ॥ किधौंस्वर्णकेकुंभलावण्य
पूरे । वशीकर्णकेचूर्ण संपूर्ण पूरे ॥ ३१ ॥ मनोइष्टदेवैंसदाइष्ट-
हीके । किधौंगुच्छद्वैकामसंजीवनीके ॥ किधौंचित्तचौगान
केमूलसोहैं। हियेहेमकेहाल गोलाबिमोहैं ॥ ३२ ॥ सुनी लंक
रानीनकीदीनबानी । तहींछांडिदीन्होमहामौनमानी ॥ उब्यो
सोगदालैयदालंकवासी । गयेभागिकैसर्बशाखाबिलासी ॥
॥ ३३॥ मंदोदरी-दोहा ॥ सीतहिदीन्होदुखवृथा, सांचोदेखो
आजु ॥ करैजोजैसीत्यौंलहै, कहारंककहँराजु ॥ ३४ ॥
टी०-सूर्यकी शोभानसों सानी मानों तमश्री [ अन्धकारकीश्री ] शोभा है
तमश्रीसम वार हैं सूरशोभासम सिंदूर है इहां सिंदूर नहीं कह्यो सो उपमानते
उपमेयको ग्रहण कियो अथवा सूरशोभासम अंगद हैं मृणाली लतासम बाहु हैं