रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशप्रकाशः १९. ( १९७ )
हैं ता दिशामैं अंगदको ताकिकै देखिकै ता दिशाको तजै कहे छोड़ति है अर्थ
ता दिशाकी पुतरिनको छोड़ति है औ जा दिशाको अंगद तजत हैं ता दिशाको
मंदोदरी भजै कहे प्राप्त होतिहै अथवा भागतिहै दरी [ कन्दरा ] ॥ २७ ॥ धन्या
कहे अति निपुण जो चित्रकी सृष्टि है दृष्टिको तजै कहे त्याग कराति है अर्थ मंदो-
दरी पास दृष्टि नहीं जान देति मंदोदरीको नहीं देखन देति इति अथवा धन्या
जो चित्रकी सृष्टिहै तामैं मंदोदरीकी दृष्टिको तजै कहे त्याग करतिहै अर्थ अपने
पास नहीं आवन देति यह मंदोदरीहै ये तौ ज्ञानदृष्टिमें नहीं होत इति भावार्थः॥
या प्रकार कौतुक देखिकै अंगदको एक देवकन्या हँसत भई सो हांसीसों देवकन्या
अंगदको देखाइ कहे देखि परी तब ताहीको मंदोदरी जानि अंगद गही तब
शंकिकै ताने लंकरानि जो मंदोदरी है ताको बतायो कहूं तहीं शंकिकै पाठहै ॥२८॥
मू०-सुआनीगहेकेशलंकेशरानी। तमश्रीमनोंसूरशोभानि-
शानी ॥ गहेबाहैंऐंचेचहुंओर ताको । मनो हंसलीन्हेमृणाली
लताको ॥ २९ ॥ छुटींकंठमाला लुरैंहारटूटे । खसैंफूलफूले
लसैं केशछूटे ॥ फटींकंचुकींकिंकिणीचारुछुटी । पुरीकाम-
कीसीमनोरुद्रलूटी ॥ ३० ॥ बिनाकंचुकीस्वच्छबक्षोजराजैं ।
किधौंसांचहूश्रीफलैशोभसाजैं ॥ किधौंस्वर्णकेकुंभलावण्य
पूरे । वशीकर्णकेचूर्ण संपूर्ण पूरे ॥ ३१ ॥ मनोइष्टदेवैंसदाइष्ट-
हीके । किधौंगुच्छद्वैकामसंजीवनीके ॥ किधौंचित्तचौगान
केमूलसोहैं। हियेहेमकेहाल गोलाबिमोहैं ॥ ३२ ॥ सुनी लंक
रानीनकीदीनबानी । तहींछांडिदीन्होमहामौनमानी ॥ उब्यो
सोगदालैयदालंकवासी । गयेभागिकैसर्बशाखाबिलासी ॥
॥ ३३॥ मंदोदरी-दोहा ॥ सीतहिदीन्होदुखवृथा, सांचोदेखो
आजु ॥ करैजोजैसीत्यौंलहै, कहारंककहँराजु ॥ ३४ ॥
टी०-सूर्यकी शोभानसों सानी मानों तमश्री [ अन्धकारकीश्री ] शोभा है
तमश्रीसम वार हैं सूरशोभासम सिंदूर है इहां सिंदूर नहीं कह्यो सो उपमानते
उपमेयको ग्रहण कियो अथवा सूरशोभासम अंगद हैं मृणाली लतासम बाहु हैं