रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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एकोनविंशप्रकाशः १९. (१९१)
जायअभिषेकइन्द्रहिकरौं । आजुसियरामदैलंककुलदूषणहिं
यज्ञकोजायसर्बज्ञविप्रनवरौं ॥ ५ ॥ महोदर-तोटक ॥ प्रभुशो-
कतजौतनधीरधरौ । सकशत्रुबधोसोविचारकरौ ॥ कुलमेंअब
जीवतजोरहिहैं । सबशोकसमुद्रहिसोबहिहैं ॥ ६ ॥
टी०-दुःखको निदान कहे बडो दुःख ॥ १ ॥ रावरे खिनके रहिबेको घर,
कठोरिबो कहे केशादि पकरि निर्दय खेंचिबो ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ इंद्रजीतके मरे
रावण बडे दुःखसों संयुक्त है ऐसे बिलाप वचन कहत भयो कि जो इन्द्रजीत
मस्यो तो मोंहूं मरतही हौं तासों मेरे डरसों जे बातें जन नाहीं करत रहे ते सब भयको
छोडिकै आपने आपने भाये काज करौ कपूर औ अगरु औ कस्तूरी औ कंकोल
मिलाइ यक्षकर्दम होत है सो यक्षनको अति प्रिय है अंगनमें लेप करत हैं ॥ “कर्पूरा
गुरुकस्तूरीकंकोलैर्यक्षकद्मः” ॥ औ सीता राम मिलिकै कुलदूषण (विभीषण)
को लंका दैकै सर्वज्ञ ब्राह्मणनको यज्ञको निवारो कहे अवकाश देहिं ॥ ५ ॥
अतिदुखमें धैर्यके बचन कहिबेको उचित है तासों महोदर, मंदोदरी धीर धराइ-
बेके बचन कहति हैं जा उपायसों शत्रु बधो सक कहे सकें अर्थ शत्रु मास्यो जाय सो
विचार करौ सबंके मरेको जो शोक है ताके समुद्रमें बह्यो करि है ॥ ६ ॥
मू०-मंदोदरी-चौपाई ॥ सोदरजुझ्योसुतहितकारी । को
गहिहैलंकागढभारी ॥ सीताहिँदैकैरपुहिँसँहारौ । मोहतिहैवि-
क्रमबलभारौ ॥ ७ ॥ रावण ॥ तुमअबसीतहिदेहुनदेहू । बिन
सुतबंधुघरौंनाहिँदेहू ॥ यहितनजोतजिलाजहिरेहौं । वनबसि
जाइसबैदुखसैहौं ॥ ८ ॥ मकराक्ष-भुजंगप्रयातछंद ॥ कहाँ
कुंभकर्णौंकहाइन्द्रजीतै । करैसोइबौवैकरैयुद्धभीतै ॥ सुजौलौं
जिऔंहौंसदादासतैरो । सियाकोसकैदैलुनौँमंत्रमेरो ॥ ९ ॥
टी०-यह जो तुम्हारो भारी लंकागढ है ताहि कौन गहि है कहे लै सकि
है अर्थ लंकागढ शत्रुके लेवे लायक नहीं है विक्रम कहे यत्न बलकहे शक्तिको
मोहति है कहे मूर्च्छित करति है अर्थ तुम्हारो यत्न औ बल निष्फल होतहै सो
याहीके दुःख प्रभावसों ॥ ७ ॥ ८ ॥ भीत युद्ध कहि या जनायो कि बाण बेद्-
नादि भय सों अंतर्धान है युद्ध करि हैं सरस्वती उक्तार्थः ॥ वै आपने बलसों
सबको मारि सीताको लै हैं इति व्यंग्यार्थः ॥ ९ ॥