रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete, line-by-line transcription of the page into Devanagari text, following the original layout and spelling:
( १७८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कीरतिकैनजानी । सोईमहोदरवृकोदरबंधुमानी ॥ ३५ ॥
जाकेरथायपरसर्पध्वजाविराजै । श्रीसूर्यमण्डलविडंबनज्योति
साजै ॥ आखंडलीयवपुजोतनत्राणधारी । देवांतकैसोसुरलो-
कविपत्तिकारी ॥ ३६ ॥ जोहंसकेतुभुजदंडनिषङ्गधारी । सं-
ग्रामसिंधुबहुधाअवगाहकारी ॥ लीन्हीछँडाइजेहिदेवअदेव
वामा । सोईखरात्मजबलीमकराक्षनामा ॥ ३७ ॥
टी०-त्रिशूल कैसो है सुर जे देवताहैं तिनको मानौं समूल कहे पूर्णशूल कहे
मृत्युहै । “शूलोस्त्री रोगआयुधे मृत्युकेतनयोगेषु ” इतिमेदिनी ॥ ३४ ॥ कांच-
नीयरथ कहे सुवर्णको रथ ताके शृंगमें अग्रभागमें मयूरनकी मालापंगति
लगी है अर्थ मयूरध्वजी है जाकी शक्ति बरछी षण्मुख जे स्वामिकार्त्तिक हैं