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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 269 में से

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पृष्ठ 199

एकोनविंशप्रकाशः १९. ( १९३ )
कुशलीसूतसादर । कारजकौनकरैअपनेघर ॥ १६ ॥ दूत-वि
जयछन्द ॥ पूजिउठेजबहींशिवकोतबहींविधिशुक्रबृहस्पति
आये । कैविनतीमिसकश्यपकेतिनदेवअदेवसबैबकसाये ॥
होमकीरीतिनईसिखईकछुमंत्रदियोश्रुतिलागिसिखाये । हौँइ-
तकोपठयोउनकोउतलैप्रभुमंदिरमांझसिधाये ॥ १७ ॥
टी०-कि शशीको दिवि आकाशते भूतलमें पाइकै अर्थ स्थानच्युत (अवल)
जानिकै स्वाभाविक शत्रुतासों गाढो कहे बहुत जो अंधकार है ताने लीलिलियो
है औ कि राहूने ग्रस्तास्त कीन्हो है शशीसम लक्ष्मण है अंधकार औ राहुसम
मकराक्ष है जब मकराक्षको शस्त्रास्त्रसों मरण ना जान्यो तब हाथनसों कसिकै
गाढे जो गहे रहै ताही समय शीघ्रतासों लक्ष्मणजी वाढ कहे स्थूलकाय हैं कै
राक्षसके अशेष संपूर्ण अंग विदारै कहे विदीर्ण कीन्हे अर्थ फारि डारे ऐसी शीघ्र
तासों लक्ष्मणजू आपने अंगस्थूल किये कि मकराक्ष जो हस्तग्रहण करे रहे सो
हस्तग्रहण ना छूटन पायो तासौं वक्षस्थल फाटि गयो अधिदेव गन्धर्वादि औ
आदि देव पाठ होइ तौ ब्रह्मादि जानौ यह छन्द छै चरणको है ॥१५॥१६॥
सत्वर कहे शीघ्र बसीठ ( दूत ) पूछौ कि रावण कौन कारज करत हैं ताको
जवाब रावणके प्रभावको देखावत चतुरतासों दियो जब रावण देव औ अदेव
सबके नाश करिबेके लिये शिव जे महादेव हैं तिनको पूजन करिकै उठे हैं कि
ताही क्षण अति डर मानिकै विधि ( ब्रह्मा ) औ शुक्र औ बृहस्पति ये तीनों
आइकै कश्यपके व्याजसों विनती करिकै देव औ अदेव सब बकसाये कहे
मांगि लीन्हें अर्थ ब्रह्मादिकन आइ यह कह्यो कि कश्यप यह विनती कर्यो है
कि देव औ अदेवनको हमको वकसीस देव अर्थ इनको नाश ना करौ इहां
अदेव पदते जे देवतनते अतिरिक्त प्राणी हैं दैत्य मनुष्यादि ते सब जानौ यासों
या जनायो कि जब रावण शिवकी पूजा करत है तब संहार करिबेकी
शक्ति प्राप्ति होति है औ देव अदेवनको बकसाइकै कछू नई होमकी रीति सिखा-
यो औ श्रुति (कान) में लागिकै कछू मंत्र दीन्हों याके आगे मोहिं या ओर पठायो
औ ब्रह्मादिकनको लैके प्रभु जो रावण है सो मंदिरको गया कहिबेको हेतु या
जामें रामचन्द्र जानैं कि हमप्रति कोपसों रावण सब देव औ अदेवको नाश
करिबेको चाह्यो तिनको बकसाइ ब्रह्मादिकन कछु हमारि ही हानि हेत होम औ
मंत्र सिखायो है ॥ १७ ॥
१३