सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

( १८४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-कुंभकर्ण-मनोरमाछंद ॥ सुनियेकुलभूषणदेवविद्वेष-
ण । बहुआजिविराजिनकेतुमपूषण ॥ भवभूपजेचारिपदार-
थसाधत । तिनकोकबहूंनहिं बाधकबाधत ॥ ८ ॥ पंकजबा-
टिकाछंद ॥ धर्मकरतअतिअर्थबढावत । संततिहितरतिको-
विदगावत । संततिउपजतहीनिशिबासर । साधततनमनमुक्ति
महीधर ॥ ९ ॥
टी०-बहुतै जे हैं आजि कहे समरनके बिराजी कहे शोभनहार अर्थ
अनेक समरकर्ता तिनके मध्यमें तुम पूषण पाठ है तहाँ अर्थ कि बहुत जे
आजिविराजी संग्रामकर्त्ता हैं तिनके तम पूषण कहे तमको मूषण सम हौ अर्थ सूर्य
तमको नाश करत है तैसे तुम संग्रामकर्त्ता जे शत्रु भट हैं तिन्हें नाश करत हो
चारि पदार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, ॥ ८ ॥ चारों पदार्थनके साधिबेको समय
कहत हैं कि महीधर जे राजा हैं ते सन्तत कहे निरंतर धर्महू करत हैं औ संतति
अर्थ द्रव्यहूको बढावत हैं अथवा धर्मको करत अर्थ बढावत हैं अर्थ सतरीतिसों
अर्थ बढावत हैं औ संततहित हैं रतीस्त्री भोग अर्थ काम साधन जिनको ऐसे
कोविद गावत हैं अर्थ ये तीन्यों एकही समयमों साध्य हैं औ जब संतति कहे
पुत्र उत्पन्न भयो तब निशि औ बासर तन औ मन करिकै मुक्तिको साधन
करत हैं आजतक तुम अर्थ, धर्म, कामको साधन कीन्हों अब तुम्हारो पुत्र
समर्थ है ताको सब राजभार सौंपि सीताको रामचंद्रको दैकै हेतु करि मुक्ति
साधन करौ इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ राजाअरुयुवराजजग, प्रोहितमंत्रीमित्र ।
कामीकुटिलनसेइये, कृंपणकृतघ्नअमित्र ॥१०॥ घनाक्षरी ॥
कामीबामीझूठक्रोधीकोंढ़ीकुलद्वेषीखलुकातरकृतघ्नीमित्रदोष-
द्विजद्रोहीये । कुपुरुषकिंपुरुषकाहलीकलहीक्रूरकुटिलकुमंत्री-
कुलहीनकेशौठोहिये ॥पापीलोभीशठअंधबावरोबधिरगूंगाबौ-
नाअविवेकीहठीछलीनिरमोहिये।सूमसर्वभक्षीदैववादीजोकुबा-
दीजड़अपयशीएसोभूमिभूपतिनसोहिये ॥ ११ ॥