रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशप्रकाशः १७. ( १७९ )
गृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठतु निर्विशंकाः ॥ इहागतं मां सहितं भवद्भिर्व्रनौकसः
छिद्रमिदं विदित्वा । शून्यां पुरीं दुःप्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः ॥
विसर्जियित्वा सचिवांस्तस्ततान् गतेषु रक्षस्सु यथा नियोगे ॥'' सो गिरिजे पर्वतहैं
तिनके ग्राम कहे समूह लै लैके हरि जे वानरहैं तिनको समूह मारतहै तिन गिरि
समूहनमें रावण पद्मिनी कमलिनी पत्रमें दंतीसम विहार कौतुक करतहै अर्थ
गिरि ग्राम रावण की देहमें दंतीकी देहमें पद्मिनीपत्र सम लागत है ॥ ४०॥
मू०-सवैया ॥ देखिबिभीषणकोरनरावणशक्तिगहीकररोष
रहींहै। छूटतहीहनूमंतसोंबीचहिंपूंछलपेटिकैडारिदईहै॥ दूसरि
ब्रह्मकीशक्तिअमोघचलावतहीहाइहाइभई है। राख्योभलेशर-
णागतलक्ष्मणफूलिकैफूलिसीओढिलई है ॥ ४१॥ सुग्विनी-
छंद ॥ जोरहींलक्ष्मणैलेनलाग्योजहीं।मुष्टिछातीहनूमंतमारयो
तहीं॥ आशुहीप्राणकोनाशसोह्वैगयो। दंडद्वैतीनमेंचेतताको
भयो॥ ४२॥ मरहट्टाछंद ॥ आयोडरिप्राणनिलैधनुबाणनि-
कपिदलदियोभगाइ ॥ चढिहनूमंतपररामचन्द्रतबरावणरों-
क्योजाइ ॥ धरिएकबाणतबसूत्तछत्रध्वजकाटेमुकुटबनाइ ॥
लागेदूजो शरछूटिगयोबरुलंकगयोअकुलाइ ॥४३॥ दोधक-
छंद॥ यद्यपिहैअतिनिर्गुणताई। मानुषदेहधरेरघुराई ॥लक्ष्मण-
रामजहीं अवलोक्यो॥ नैननतेनरह्योजलरोक्यो॥४४॥राम॥
वारकलक्ष्मणमोहिं बिलोको । मोकहँप्राणचलेतजिरोको ॥
हौंसुमिरौंगुणकेतिकतेरे । सोदरपुत्रसहायकमरे ॥ ४५ ॥
टी०-फूलिकै प्रसन्न ह्वैकै ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ हनूमानसों प्राणनको डरिकै
कपि दलको भगायो जाय तहां हनूमान क्यों न गये तौ जब रावण वा ठोरसों
भागो तब लक्ष्मणको लै हनूमान रामचन्द्रके पास गये इतिकथाशेषः ॥ ४३ । '
॥ ४४ ॥ ४५ ॥
मू०-लोचनबाहुतुहींधनुमेरो । तूबलबिक्रमवारकहेरो ॥ तू-
बिनहौंपलप्राणनराखौं । सत्यकहौंकछुझूठनभाखों ॥ ४६ ॥