रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशप्रकाशः १८. ( १८५ )
टी०-ये पाँचों गजादि इन दूषण सहित होहिं तौ सेवनके योग्य नहीं योग
नहीं होत, अथवा यथाक्रममोंजानो राजा कामी काहेते उचितानुचित विचार बिना
सुन्दरी देखि प्रजाजनकी स्त्रिनको गहि मंगावतहैं तासों देश उजार होतहै औ
युवराज कुटिल काहेते मंत्र्यादिकनमां विरोध राज्यविध्वंस करतहैं औ मोहित
कृपण कहे दरिद्र काहेते विवाहादि समयमों द्रव्य लोभ वश वेदविहित घटचादि
विताइ अमंगल करत हैं अथवा शत्रुओं कछु द्रव्य पाइ मरणादिके लये राशि
नाम बतावत हैं औ मंत्री कृतघ्नी काहेते स्वामीको कृत विसारि शत्रुओं मिलि
राज्य छोडावैं औ मित्र अमित्र कहे हृदयमों भलो ना चाहै काहेते कछू गूढ
मंत्र कहै सो शत्रु पास पहुँचावै ये पाँचौं इन पाँचहुन दोष सहित सेवन योग
नहीं होत यासों या जनायो कि तुम राजा हौ तुम्हें ऐसो काम साधन ना
चाहिये जासों ईश्वर जे रामचंद्र हैं तिनकी स्त्रीको हरि ल्यायो हौ ॥ १० ॥
वामी (वाममार्गी) कुपुरुष कहे पुरुषार्थ रहित किंपुरुष कहे कुछुहै पुरुषकी
आकृति जिनकी काहला (रोगी) दैववादी कहे जे भाग भरोसे रहत हैं याहूमें
या जनायो कि तुमको ऐसो कामसाधन ना चाहिये ॥ ११ ॥
मू०-निशिपालिकाछंद ॥ बानरनजानुसुरजानुशुभगाथ-
हैं ॥ मानुषनजानुरघुनाथजगनाथहैं । जानकिहिदेहुकारि
नेहुकुलदेहुसो ॥ आजुरणसाजपुनिगाजुहँसिमेहुसो ॥ १२ ॥
रावण-दोहा ॥ कुंभकरणकरियुद्धकै,सोइरहौघरजाइ।वेगिबि-
भीषणज्योंमिल्यो,गहौशत्रुकेपाइ ॥१३॥ मंदोदरी-दो०॥ इंद्र-
जीतअतिकायसुनि, नरांतकसुखदाइ । भयनसोंप्रभुझुकतहैं,-
क्यों नकहौसमुझाय ॥ १४ ॥ मंदोदरी-चंचलाछंद ॥ देव- :
कुंभकर्णकेसमानजानियेनआन। इन्द्रचंद्रबिष्णुरुद्रब्रह्मकोहरे
उगुमान ॥ राजकाजकोकहैजोमानियेसोप्रेमपालि। कचलीन-
कोचलेनकालकीकुचालिचालि ॥ १५ ॥
टी०-कुल औ देहसों नेह करिकै जानकीको देहु यह कहि या जनायो कि
ना देहौ तौ रामचंद्र तुम्हारे कुलके सहित तुम्हारो नाश करि हैं ॥ १२ ॥ कारि
कहे करौ ॥ १३ ॥ झुकत कहे रिस करत है भयनसों बहुवचन कहि या जनायो