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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 269 में से

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पृष्ठ 188

( १८२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोटनकछंद ॥ ठाढेभयेलक्ष्मणमूरिछिये । दूनीशुभशोभशरी
रलिये ॥ कोदंडलियेयहबातररै । लंकेशनजीवितजाइधरै ॥
॥ ५६ ॥ श्रीरामतहींउरलाइलियो । सूंघ्योशिरआशिष-
कोटिदियो ॥ कोलाहलयूथपयूथकियो ॥ लंकाहहलीदश-
कंठहियो ॥ ५७ ॥
इति श्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांलक्ष्मणमूर्च्छामोचनं
नामसप्तदशः प्रकाशः ॥ १७ ॥
टी०-यत्र जा पर्वतमें औषधीवृंद नहीं हैं विनापत्र फूले पलाशके वृक्ष
हैं या प्रकार भूले कोकिलनकी आली पंगती रमती हैं औ जामें भ्रमें कहे
घूमत हैं बसंत कैसो है कि यत्र कहे जामें विनापत्र पलाश फूलि रहेहैं औ
जामें कोकिलावली रमती हैं औ भूले कहे उन्मत्ततासों देहकी सुधि बिसराये
मौर भ्रमत हैं यामें (श्लेषोत्प्रेक्षा) है सो सदानन्द जे राम हैं तिनके महानंदके
लिये हनूमान मानो बसंत ही ल्याये हैं बसंतको देखि सबको आनंद होत है
तासों अथवा जैसे राजनके इहां आनंदार्थमाली वसंत बनाइकै लैजात हैं तैसे
मानो रामचन्द्रके महाआनंदको हनूमान बसंतको रूपही बनाइ ल्याये हैं ॥५५॥
मूरि जो औषधि है ताको छिये कहे छुये सों ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद-
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां सप्तदशः प्रकाशः ॥ १७॥
मू०-॥ दोहा ॥ अष्टादशप्रकाशमें, केशवदासकराल ।
कुम्भकर्णकोबर्णिबो, मेघनादकोकाल ॥ १ ॥ दोधकछंद ॥
रावणलक्ष्मणकोसुनिनिके । छूटिगयेसबसाधनजीके । रेसुत
मंत्रिविलंब न लावो । कुंभकरन्नहिजाइजगावो ॥ २ ॥ राक्षस
लक्ष्मणसाधनकीन्हे । दुंदुभिदीहबजाइ नवीने ॥ मत्तअमत्त
बडेअरुबारे । कुंजरपुंजजगावतहारे ॥ ३ ॥ आइजहींसुरना-